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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

( २२ ) सतसई-सटीक ।
नहिं अन्हाय नहिं जायघर, चित चहुँट्यो तकितीर
परशिफुरहरी लेफिरति, विहँसति धसतिननीर ५३
नतो स्नान करतीहै न घरजाती है प्यारेको तकनेसे तीरपरही
मन लगाहै, जलको छूतेही फुरहरीले पीछेको हँसकर हटती
है पानीमें नहीं घुसती पर्यायोक्ति चहुँट्यो-चुभगया ॥ ५३ ॥
चितईललचौहैं चखनि, डटि घूँघट पटमांहि ।
छलसोंचलीछुवायके, क्षणक छबीली छांहि ५४॥
लाजभरे नेत्रोंसे देखा घूँघट के पटमें डटकर प्यारीने फिर
छलसे क्षणेक अपनी छबीली छाँह छुआके चली. आशय
यह कि प्रीतमकी छाँहसे छांह छुआके चली इसमें यह दि-
खाया कि मैं तुम्हारे साथ छांहके समानहूं स्वभावोक्ति ॥५४॥
लाजगहो बेकाजकत, घेररहे घर जाहिं ।
गोरस चाहतफिरतहो, गोरस चाहत नाहिं॥५५॥
हे कृष्ण! तनकतो लाज गहो बिना काज हमें क्यों घेर
रहे हो, हम अपने घरजाँय तुम बातोंके रसको अथवा इन्द्रि-
योंके रसके चाहते फिरोहो गोरस दूध दही नहीं चाहतेहो
यमकालंकार [दोहा-पृथक २ हों अर्थ जहँ, पदहों एक
समान। सो यमकालंकार है, कविजन करत बखान ]॥५५॥

मध्य भाग: दोहा १५१ से ३५० (नायिका-भेद एवं शृंगार-चित्रण)

प्रथमशतक १. ( २३ )
सबही तनु समुहाति क्षण, चलति सबनिदै पीठ।
वाही तनु ठहराति यह, किवलनु मालौं दीठ ५६
क्षणमात्र सबहीकी ओर देखती है और क्षणमें
सबहीकी ओर पीठ दे चलतीहै, परन्तु यह किवलनुमासी
दृष्टि उन्हीं (कृष्ण) की ओर ठहरतीहै, किवलनुमा सदा
पश्चिमहीकी ओर रहताहै पूर्णोपमा, दृष्टि उपमेय किवलनुमा
उपमान, लौं वाचक, समुहातिधर्म है ॥ ५६ ॥
खरी भीरहू भेदिकै, कितहूं है इत आय।
फिरै दीठ जुरि दीठसों, सबकी दीठ बचाय॥५७
प्यारीकी दृष्टि कितहूं होय बहुतसी भीड़को भेदकर भी
इधर आती है और सबकी दृष्टि बचाकर स्वामीकी दृष्टिसे
प्रियाकी दृष्टि मिलकर फिरती है विभावनालंकार ॥ ५७ ॥
कहतनटतरीझतखिजत,मिलतखिलतलजियात।
भरे भौनमें करतहैं, नैननिमें सबवात ॥५८
कहते हैं, नाहीं करते हैं, प्रसन्न होते, खीजते, मिलने,
खिलते और लजातेहैं, भरे घरमें सब बातें नेत्रों मेंही करते हे,
आशय यह कि, प्यारेने चलनेका संकेत किया प्यारीने नाहीं
कही, इस भावसे प्यारे रीझे, तब प्यारी खीजी, फिर मिल-
कर नायक प्रसन्न हुए, प्यारी लजाई पूर्वार्द्धमें कारकदीपक

( २४ ) सतसई-सटीक ।
अलंकार [दोहा-जहां कहूं इक वाक्यमें, भाव अनेक दिखाहिं।
कारक दीपक कहतहैं, कविजन ताहि सराहिं ] उत्तरार्द्धमें
विभावना है ॥ ५८ ॥
दीठ बरत बांधी अटनि, चढि आवत न डरात।
इत उतते चित दुहुँनके, नटलों आवतजात ५९॥
दोनों ने अटारीपरसे दृष्टिकी रस्सी बांधी है, उसपर बरा-
बर चढ़ते आते हैं डरते नहीं इधर उधरसे ( उनरस्सोंपर )
दोनोंके मन नटके समान आते जाते हैं, रूपकालंकार पूर्णो-
पमालंकार है ॥ ५९ ॥
संजनयनि मज्जन किये, बैठी व्यौरति बार ।
कच अँगुरिन बिचदीठदे,चितवति नंदकुमार६०
कमललोचनि स्नानकर बैठकर बार व्योरने ( सुलझाने )
लगी, परन्तु बालोंमें अंगुलियोंके लगानेमें जो छिद्र
होते हैं उन छिद्रोंमें दृष्टि लगाकर कृष्णको देख रही है
पर्यायोक्ति ॥ ६० ॥
जुरे दुहुँनके दृग झमकि, रुके न झीने चीर ।
हलकी फौज हरोल ज्यों,परति गोलपर भीर६१
दोनोंके नेत्र झमककर जुरे झीने वस्त्रमें रुके नहीं, जैसे
सेनाकी हलकी हरावलके समान गोलपर भीर पड़ती है.

प्रथमशतक १. ( २५ )
हरौल सेनाका अग्रभाग प्यारीके नेत्र राजाकी सेना, चूँटपट
हरौल, और प्रियके नेत्र दक्षिणी कटक दृष्टान्तालंकार ॥ ६१॥
पहुँचति डटि रण सुभटलों, रोंकि सके सब नाहिं
लाखनहूकी भीरमें, आँखि वहीं चलिजाहिं ॥ ६२ ॥
रणके शूरमाके समान वहीं डटके पहुँचती है, सबभी नहीं
रोकसकते। लाखोंकीभी भीरमें आंखें वहीं चलकर जाती हैं,
विशेषोक्ति विभावना पूर्णोपमा ॥ ६२ ॥
ऐंचतिसी चितवन चितै, भई ओट अरसाय ।
फिर उझकनको मृगनयनि, दृगनि लगनियां लाय ॥
खैंचतीसी दृष्टिसे देखकर फिर अलसाकर ओटमें हुई मृग-
नयनी मेरे नेत्रोंमें लगनियां लगाकर फिर देखनेके निमित्त
अथवा हे सखी ! मृगनयनी मैं फिर उसके झाँकनेके निमित्त
अपने नेत्रोंमें लगन लगा रहाहूं कि वह मुझे प्यार करती
है फिर उझकेगी. अनुमानालंकार, जहां किसी बातसे कुछ
मनमें होनहार विचारी जाय वह अनुमान है ॥ ६३ ॥
दूरौ खरे समीपको, मानलेत मन मोद ।
होत दुहुँनके दृग नहीं, बंतरस हँसी विनोद ॥ ६४ ॥
यद्यपि वे दोनों दूर खड़े हैं, परन्तु समीपका मनमें आनंद

( २६ ) सतसई-सटीक ।
मानतेहैं, दोनोंके नेत्रोंमेंही बातोंका रस और हँसीका आनंद
होताहै प्रथम विभावनालंकार ॥ ६४ ॥
यदपि चवायनि चोकनी, चलति चहूँ दिशसैन ।
तदपि न छाँडत दुहुँनके, हँसी रसीले नैन ॥६५॥
यद्यपि चबाव करनेमें चिकनी चुटपटी चतुरहैं, यद्यपि
चारों ओर उँगुली उठा उठाकर, लोगोंकी सैन चलती है,
तौभी दोनोंके रसीले नेत्र हँसी नहीं छोड़ते तीसरी विभा-
वना ॥ ६५ ॥
सटपटातसी शशिमुखी, मुख घूँघटपट ढांकि ।
पावक झरसी झमकिकै, गई झरोखे झांकि ॥६६॥
चन्द्रमुखी सटपटातीसी घूँघटके पटसे मुख ढककर अग्नि
की झरसी झमककै झरोखेमें झांककर गई पूर्णोपमा॥ ६६ ॥
कबकी ध्यान लगी लखौं, यह घर लगिहै काहि ।
डरियतभृंगी कीटलों, जिन वहई ह्वैजाहि ॥६७॥
हे सखी! मैं इसे कबकी ध्यान लगाये देखरही हूं यह इस-
का घर कौन संभालेगा. मुझे डरहै कि, भृंगी कीटके समान
ध्यान करते करते कहीं जिसका ध्यान करती है वही न हो-
जाय भृंगी कीडा जिसे पकड़ताहै क्षणमें उसे अपना स्वरूप
बनालेताहै स्मृति अलंकार ॥ ६७ ॥

प्रथमशतक १. ( २७ )
रही अचलसी ह्वै मनो, लिखी चित्रकी आहि ।
तजे लाज डर लोकको, कहो विलोकति काहि ६८
वह ऐसी अचलसी होरहींहैं, मानो चित्रकी लिखीहो,
लोककी लाज और लोकका भय छोड़कर कहो किसको
देखतीहो, उत्प्रेक्षालंकार ॥ ६८ ॥
पल न चलै जकिसीरही, थकिसीरही उसाँस ।
अबही तन रितयो कहा,मन पठयोकिहिं पास६९
हे प्यारी! तुम्हारी पलक नहीं चलती, जड़सी होरही हो,
तथा उसाँस थकसा रहाहै; क्या अबही किसीके पास अपना
मन भेजकर तनु रीता किया है स्मृतिछेकानुप्रास ॥ ६९ ॥
नाम सुनतही ह्वै गयो, तनु औरै मन और ।
दबै नहीं चित चढरह्यो, अबै चढाये त्योर॥७०॥
प्यारी उनका नाम सुनतेही तुम्हारा तन और मन और
और होगया, त्यौरीके चढ़ायेसे जो चित्तपर चढ़रहाहै सो दबता
नहीं भेदकांति और छेकानुप्रास अलंकार ॥ ७० ॥
पूछे क्यों रूखी परति, सगबग रही सनेह ।
मनमोहन छवि पर कटी, कहै कट्यानी देह ७१
मेरे पूछनेसे क्यों रूखी होती है तूतो सनेहमें सगबग हो

( २८ ) सतसई-सटीक ।
रही है, तू मनमोहनकी छविपर रीझ रहीहै, सो तेरे शरीरके
रोमांच कहे देते हैं, काव्यलिंग ॥ ७१ ॥
प्रेम अडोल डुलै नहीं, मुखबोलै अनखाय ।
चितउनकी मूरतिबसी, चितवनि माहिंलखाय ७२
हे सखी तुम्हारा प्रेम अडोलहै डुलतानहीं, और मुखसे
अनखाकर बोलतीहो, मनमें तुम्हारे प्यारेकी मूर्ति बसी है,
सो नेत्रोंमें दीखतीहै,अथवा प्रेम निश्चलही है मुखसे अनखा-
कर बोलनेसे डुलेगा नहीं, उनकी मूर्ति तेरे मनमें बसी है,
यह चितवनहीमें दिखाई देताहैं, अथवा प्रेम डोलहै सो हमने
जाना कारण कि, डुलता है, भाव यह कि मूर्ति नहीं डुलती
इससे तेरा चित्त उनमें दृष्टि आताहै और मुखसे बोलनेमें अनख
है इससे विदितहै कि, हृदयमें नहीं अनुमानअलंकार॥७२॥
ऊँची चितै सराहियत, गिरह कबूतर लेत ।
दृगझलकित मुलकितवदन,तनु पुलकितकहिदेत।
ऊँचे देखकर सराहा जाता है, कबूतर गिरह लेताहै किस
कारण नेत्र झलकते मुख मुलकता और शरीर पुलकित
होताहै, नायकका कबूतर देखकर प्यारीके मनमें उसका
स्वरूप आनेसे सात्विक भाव हुआ हेतुअलंकार ॥ ७३ ॥
यह मैं तोहीमें लखी, भक्ति अपूरव बाल ।
लहि प्रसाद मालाजुभौ, तनु कदम्बकी माल७४॥

प्रथमशतक १. ( २३ )
हे प्यारी! यह मैने तुझीमें अपूर्व भक्ति देखी कि,प्रीतमकें
गलेकी प्रसादमाला पाकर तेरा शरीर कदम्बकी मालासां
हुआ रोमांच सात्विकहुआ हेतुअलंकार ॥ ७४ ॥
कोटियतन कीजे तऊ, नागरिनेह दुरैन ।
कहेदेत चित चीकनो, नई रुखाई नैन ॥ ७५ ॥
हे नागरि चतुरी चाहे कोटि उपाय करो, परन्तु प्रेम नहीं
छिपता, स्नेहभरा मन और नेत्रोंकी नई रुखाई यह दोनों
इसबातको कहेदेते हैं, पंचमविभावना विरुद्धसे काज होना
रुखाईसे चिकनाई प्रगट है ॥ ७५ ॥
और सबै हरषी फिरैं, गावति भरी उछाह ।
तूही बहू विलखी फिरै, क्यों देवरके व्याह ॥७६॥
और सब प्रसन्नहुई फिरती हैं, उछाहभरी गाती हैं, हे
बहू ! देवरके व्याहमें तू क्यों दुःखी हुई फिरती है उल्हासा-
लंकार ॥ ७६ ॥
नैन लगे तेहि लगनिमों, छुटे न छूटैं प्रान ।
काम न आवत एकहू, तेरेसों कि सयान ॥ ७७॥
मेरे नेत्र उन प्रीतमसे लगेहैं जो प्राण जानेमें न छूटेंगे
तेरेसों सयानोंसे एकभी सयान मेरे काम नहीं आता, अत्युक्ता-
लंकार [ दोहा-अतिशय अर्थ प्रकाश जहँ, सो अत्युक्ति
कहाय । प्राणगये छुटिहै नहीं, नैना यों समुझाय ॥ ]॥७७॥

( ३० ) सतसई-सटीक ।
तू मतमानै मुक्तई, किये कपटवत कोटि ।
जो गुनहीतो राखिये, आँखनि माहिं अगोटि ७८
लोगोंके कपटसे कोटिवातें करनेपरभी तू अपने चाहतेसे
वियोग मतमानै जो नायक तुम्हारा अपराधी है तौ आंखोंमें
नजर बंद कररख. तात्पर्य यह है कि, प्रीतमको मानका
रूप भला लगता है सो जानकै रुठावैहै । गुणही अपराधी
सम्भावना अथवा करोड़ कपट वल करनेपरभी अच्छेकी
मतमानै जो हृदयमें गुणहै तो नेत्रोंमें भर रख । अर्थात् तू
गुणी है तो छिपा तौ सही ॥ ७८ ॥
धन यह द्वैज जहां लख्यो, तजो दृगनि दुखद्वंद।
तुव भागनि पूरव उयो, अहो अपूरव चंद ॥७९॥
धन्य यह दोयजहै जहां देखागयाहै और नेत्रोंने दुःखद्वंद
त्याग दिया अहो कृष्ण यह अपूर्व चंद्रमा तुम्हारे भाग्यसेभी
पूर्वमें उदय हुआहै प्यारीका मुख जो चन्द्रवत कहाहै वही
अपूर्व है पूर्णचंद्र पूर्वमें उदय होताहै सो दोयजके दिनही उस-
पूर्ण चंद्रमुखीका पूर्वमें दर्शन है यही अपूर्वता है पर्या-
योक्ति ॥ ७९ ॥
एरी यह तेरी दई, क्योंहू प्रकृति नजाय।
नेहभरे हिय राखिये, तू रूखिये लखाय॥८०

प्रथमशतक १. ( ३१ )
हे नारायण ! अरी यह तेरी प्रकृति ( स्वभाव ) किसी
प्रकार नहीं जाती, हृदयमें स्नेह(प्रीतिरूप तेल) भर रक्खा है
तथापि तू रूखीही दीखती है, अतद्गुणालंकार [ दोहा-
जहँ गुणकी संगति नहीं, कहत अतद्गुण ताय । हियमें नेह
भरो तऊ, रूखी बाल लखाय ] ॥ ८० ॥
औरै गति औरै वचन, भयो वदन रंग और ।
द्योसेक तैं पियचितचढ़ी, कहैं चढ़ौं हैं त्यौर॥८१॥
ओरही प्रकारकी चाल, औरही प्रकारकी वाक्यरचना,
औरही प्रकारका मुखका रंग होगया, दो एक दिनसे पियाके
चित्तपर चढ़ी है, यह तेरी चढ़ी त्यौरी कहे देती हैं, भेदकां-
तिशयोक्ति ॥ ८१ ॥
रही फेर मुँह हेरि इत, हित समुहैं चित नारि ।
दीठ परत उठि पीठकी, पुलकें कहत पुकारि ८२
हे नारि ! इधरको देखकर तू मुँह फेररही है, परन्तु तेरा
चित्त प्रेमके सन्मुख हे, प्यारेकी दृष्टिके पड़नेही तेरी पीठपर
जो रोमांच होगये हैं, वह इसबातको पुकारके कहते हैं अनु-
मान ॥ ८२ ॥
वे ठाढे उमडात उत, जल न बुझैवड़वागि ।
जाहीसों लागो हियो, ताहीके उरलागि ॥८३॥

( ३२ ) सतसई-सटीक ।
प्यारेको देख प्रिया सखीसे लिपटी उसपर कहते हैं वे उधर
खडे हुए उमडते हैं उधर बड़वाग्नि (समुद्रकी आग) जलसे नहीं
बुझती जिससे तेरा मन लगा है उसीके हृदयसे लग तौ यह तेरी
कामाग्नि बुझेगी. स्वभावोक्ति ॥ ८३ ॥
लाज गर्व आरस उमँग, भरे नैन मुसकात ।
राति रमी रति देति कहि, औरै प्रभा प्रभात॥८४॥
लाज, गर्व और आलस्य उमंगसे भरीहुई तेरी आँखें मुस-
काती हैं, यह प्रभातसमयकी औरही प्रभा (कान्ति) कहे
देती है रातके रमनेकी छिपी हुई रति क्रीड़ा, भेदकांति
शयोक्ति ॥ ८४ ॥
नटन शीश साबित भई, लुटी सुखनकी मोट ।
चुपकरिये चारीकरति, सारी परी सरोट ॥ ८५ ॥
हे सखी ! अब तू मुकरै मत, वह बातकी तैने सुखकी मोट
लूटी है तेरे शिर साबित है; यह सारीकी पड़ी सबबटैंहीं चुपकी
चुपकी तेरी चुगली खाती हैं काव्यलिंग ॥ ८५ ॥
मोसों मिलवति चातुरी, तू नाह मानति भेद ।
कहेदेत यह प्रगटही, प्रगट्यो पूस प्रस्वेद ॥८६॥
मुझसे चतुराई मिलाती है और अपनी बातोंमेंसे भेद दूर

प्रथमशतक १. ( ३३ )
नहीं करती पूसके महीनेमें निकला हुआ यह पसीनाही
इस बातको प्रगट कियेदेता है । प्रथमविभावना ॥ ८६ ॥
सही रँगीले रतिजगे, जगी पगी सुखचैन ।
अलसोंहैं सौहैं किये, कहैं हँसोहे नैन ॥ ८७ ॥
यह सत्य है कि, रँगीले रात तेरे संग जागे और सुखचैन
में पग कर तूभी जगी, आलसभरी हँसौही तेरी आँखें मुझसे
सौगंध करके कहेदेती हैं । एकके जागनेसे दोनोंका जागना
होताही है फिर दोनोंका पृथक् कहनेका कारण यह कि, प्रीतम
रँगभरेका जागना सहज समझा परन्तु तेरे जागनेसे उसका
रतिपूर्वक जागना जाना । अनुमान ॥ ८७ ॥
औरै ओप कनीन कन, गनी धनी शिरताज ।
मनी धनीके नेहकी, बनी छनी पटलाज ॥८८॥
तेरी आँखोंके कनीनकाओंके तारेकी औरही चमकहै इस
कारण मैंने तुझे ( धनी ) बहुतोंकी शिरताज ( गनी ) गिनी
अर्थात् जाना तू पियाके प्रेमकी मणि बनीहै तू लाजमें छिपाती
है सो यह लाजरूपी पटमें छन निकली है अर्थात् जैसे निर्मल
मणिकी कांति वस्त्रमें छनकर निकलती है तैसे छिपानेसे तेरा
नेह नहीं छिप सकता । भेदकांति० ॥ ८८ ॥
यह वसंत नखरी गरम, अरी न शीतल वात ।
६

( ३४ ) सतसई-सटीक ।
कह क्यों प्रगटे देखियत, पुलकि पसीजे गात ८९
अरी यह वसन्तरुतुहै, इसमें न बहुत गरम और न बहुत
ठंढी पवनहै, परन्तु यह तो कह कि, तेरे अंगमें पसीजे हुए
रोमांच क्यों दीखते हैं, । प्रथम विभावना ॥ ८९ ॥
मेरे बूझे बात त, कत बहरावति बाल ।
जगजानी विपरीतरति, लखिबिंदुलीपियभाल ९०
हे बाले ! मेरे बूझनेसे क्यों बात बहराती है, प्रीतमके माथे
पर बिन्दी देखकर तेरी विपरीत रति सबने जानली । अनु-
मान ॥ ९० ॥
सुदुतिदुराईदुरतिनहिं, प्रगटकरतिरतिरूप ।
छुटे पीकऔरै उठी, लालीओठअनूप॥९१॥
हे सुदुति ! सुन्दर दांतवाली तेरी अच्छी शोभा छिपाई
नहीं छिपती, कामकेलिका रूप प्रगट करती है, पीक छूटके
होठमें और भी नई लाली खुली कि, जिसकी उपमा नहीं
है, पीक छूटनेका कारण यह कि, सब रंग प्रीतमके अधरोंने
लेलियाहै, और उसके दुरानेका कारण यह कि, यह स्त्री पर-
कीयाहै, इसकारण स्वामी आनकर पूछे कि, पान कहां खाया
तब उत्तर न बनेगा । भेदकांतिशयोक्ति ॥ ९१ ॥
रँगीसुरतिरँग पियहिये, लगी जगी सबराति ।

प्रथमशतक १. ( ३५ )
पैंडपैंडपरठकिकै, ऐंडभरी ऐंडाति ॥ ९२ ॥
कामकेलिमें रँगकर पियाकी छातीसे लग यह सारी रात
जागीहै, इससे पग पग पर खडी होकर गर्वभरी ऐंडाती है
स्वभावोक्ति ॥ ९२ ॥
तरवन कनक कपोल दुति, बिचही बीच बिकान।
लाल लाल चमकतिचुनी, चौकाचिह्न समान ९३
जड़ाऊ सोनेकी बनी ढेरीका सोना कपोलकी कांतिहीमें
मिलगया लाल लाल चुन्नी दाँतके चौकेके समान चमकती है
पूर्णोपमा ॥ ९३ ॥
पटको ढिग कत ढापियत, शोभित सुभग सुभेष ।
हदरदछदछबि देखियत,सदरदछदकीरेष॥९४॥
इसे घूंघटपटके निकट क्यों ढकतीहो, यह तो सुन्दररस
स्वरूपसे शोभा देती है तुरतके दांतोंके घावकी लकीर हद
भर होठोंकी शोभामें दिखाई देती है । विभावना और
वृत्यनुप्रास ॥ ९४ ॥
कहि पठई मनभावती, पिय आवनकी बात ।
फूली आँगनमें फिरै, आँगन आँग समात॥९५॥
जिस समय प्यारेने प्यारीके मनकी चाही अपन आवनकी

( ३६ ) सतसई-सटीक ।
बात कहकर भेजी उससे प्रसन्नहो आँगनमें फिरने लगी श-
रीरमें शरीर नहीं समाता । लोकोक्ति ॥ ९५ ॥
फिरिफिरिविलखीहैलखति, फिरिफिरिलेतिउसास।
साईंसिरकचसेतलौं, बीत्यो चुनत कपास ॥ ९६ ॥
बारबार अनमनीहो देखती है, और बार २ ऊँची सांस
लेती है, स्वामीके शिरके श्वेतबालोंके समान बीतीहुई क-
पास चुनती है, अनुशयना अपने क्रीडाके स्थान कपासके
खेत नष्ट होनेपर शोच करतीहै, अथवा कपासके खेतमें सं-
केत स्थान था उसके नष्ट होनेसे दुःख हुआ। पूर्णोपमा दृष्टा-
न्तालंकार ॥ ९६ ॥
सनसूख्योबीत्योबनों, ऊखौ लई उखारि ।
अरीहरीअरहरअजौं, धर धर हर हिय नारि॥९७॥
सन सूखगई कपासका बन बीत गया, गन्ने उखाड़ लिये
हे आली! अभी अरहर हरीहै, मनमें धीरज रख, आशय यह
कि, तू इन वस्तुओंके निबट जानेसे अभी शोच मतकरै यह
अरहरका खेत अभी अच्छा संकेत स्थानहै, वीप्सा छेकानु-
प्रास “हरी २ वीप्सा” ॥ ९७ ॥
सतर भौंह रूखे वचन, करति कठिन मन नीठि।
कहाकरौं हैजाति हरि, होरि हँसोही दीठि ॥९८॥

प्रथमशतक १. ( ३७ )
सखीने प्यारीसे मान करनेको कहा तब उसने कहा आली
टेढी भौंहें कर रूखे वचन कहतीहूं और नीठ-( कठिनाई )
कर कड़ा मन भी करा पंरतु क्या करूं कृष्णके देखतेही
मेरी दृष्टि हँसौही होजाती है । तृतीय विभावना ॥ ९८ ॥
तूहुं कहति हौं आपहू, समझति बहुत सयान ।
लखिमोहन जो मनरहै, तो मनराखोंमान॥९९॥
तू भी कहती है और आपभी मैं बहुत चतुराई समझूँ हूं
परन्तु मोहनको देखकर जो मन मेरे पास रहे; तो मनमें मा-
नराखसकूं आशय यह कि, उन्हें देखतेही मन हाथसे निकल
जाय है फिर मान कहांसे होय । विशेषोक्ति सम्भावना॥९९॥
दहैं निगोडे नैन यह, गहैं न चेत अचेत ।
हौंकसिकै रिसकोकरौं;यहनिरखेहँसिदेत ॥१००॥
हे सखी ! यह मेरी निगोड़ी आँखें जरें ऐसी अचेत हैं कि,
चेत पकड़तीही नहीं मैं हठकर मानको करतीहूं परन्तु यह
कृष्णको देखतेही हँसदेते हैं । विभावना । हँसनेसे रिसनहीं
रहती ॥ १०० ॥
इति कविवर बिहारीलालकी सतसईमें पंडित ज्वालाप्रसादमिश्रकृत
भावप्रकाशिकाटीकासहित प्रथमशतक पूर्ण हुआ ॥ १ ॥

( ३८ ) सतसई-सटीक ।
मोहिं लजावत निलज यह, हुलसि मिलैं सबगात।
भानु उदयकी ओसलों, माननजान्योजात १०१
यह निर्लज्ज नेत्र मुझे लजाते हैं और आप प्रसन्न हो प्यारे
के सब शरीरसे मिले हैं जैसे सूर्य उदयहोनेपर ओस गई नहीं
जानी जाती । इसीप्रकार उनके दर्शनसे मान गया हुआ नहीं
जानाजाता । पूर्णोपमा ॥ १०१ ॥
खिचे मान अपराधते, चलिगे बढे अचैन ।
जुरत दीठितजिरिसखिसी, हँसेदुँहुनके नैन १०२
हे सखी ! पहले तो प्यारीके मानसे प्यारेके अपराध करने
के कारण नेत्ररुके, पीछे परस्पर न देखनेके( अचैन ) दुःखसे
चलायमान होगये, हे सखी! दृष्टिके जुरतेही रिसत्याग दोनोंके
नेत्र हँसपडे । प्रहर्ष अलंकार [ दोहा-काज सफल जहँ यत्न
बिन, कहत प्रहर्षणताहि । यत्नबिना प्यारी मनी, है प्रसन्न
चितचाहि ] ॥ १०२ ॥
रात दिवस हौंसै रहैं, मान न टिक ठहराय ।
जेतो अवगुण ढूँढिये, गुणौ हाथपरिजाय॥ १०३॥
हे सखी ! हमें रात दिन इसी बातकी हौंस रहै है कि, प्यारे
से मान कराकर देखें परन्तु मान ठीक नहीं ठहरता प्यारेका

द्वितीयशतक २. ( ३९ )
जितना अवगुण ढूँढती हूं उतना गुणही हाथमें पड़जाताहै ।
विशेषोक्ति ॥ १०३ ॥
जौलौं लखों न कुलकथा, तौलौं ठिक ठहराय ।
देखे आवत देखबो, क्योंहूं रह्यो न जाय ॥ १०४ ॥
हे सखी ! जबतक घनश्यामको नहीं देखती तवहींतक
कुलकानकी कथा ठीक ठहरती है, उन्हें देखनेसे तो मनमें
देखनाहीं आताहै किसी प्रकारभी रहा नहीं जाता । संभा-
वना ॥ १०४ ॥
कपट सतर भौंहैं करी, मुख सतरौहैं वैन ।
सहजहँसौ हैं जानकर, सौ हैं करति न नैन ॥ १०५॥
हे सखी! हमारे कहनेसे प्यारीने मान किया सो तुम देखो
कपटसे टेढी भौंहैं करी मुखसे क्रोधभरी बातें कहीं परन्तु
स्वभावसे हँसनेवाली जानकर प्यारेके सन्मुख अपनी आँ-
खोंको नहीं करती । छेकानुप्रासयमकालंकार ॥ १०५ ॥
नहिंनचायचितवतिदृगनि, नहिं बोलति मुसकाय।
ज्यों २ रुखरुखोकरति, त्यों २ चितचिकनाय १०६
आँखोंको नचाकर नहीं देखती, मुसकाकर नहीं बोलती,
ज्यों २ रुखरुखोकरतीहै त्यों २ चित्त चिकनाहोता जाता है।
विभावना ॥ १०६ ॥

( ४० ) सतसई-सटीक ।
तोहीको छुट मानगो, देखतही ब्रजराज ।
रही घरिकलों मानसी,मानकियेकी लाज १०७॥
श्रीकृष्णके देखतेही तेरे मनका मान तो छुटके गया,
परन्तु मानकियेकी लाजसे एकघडीतक तो तू मानको माने
रही घडी एक मानकी सीमा न शोभा स्थित रही । कर-
माल ॥ १०७ ॥
कियोजु चिबुक उठाय करि,कंपत कर भरतार ।
टेढीयहटेढीफिरति,टेढेतिलक लिलार ॥ १०८॥
ठोढी उठाकर जो कंपितहाथसे भर्त्ताने प्रियाके माथेपर
तिलक किया, तो स माथेके टेढे तिलकसे यह टेढी हुई
फिरतीहै कि, मुझसे अधिक कोई न्दर नहीं,प्यारीको देख
जो सात्त्विकभाव आ इससे हाथ कांपनेसे टेढातिलक हुआ।
पंचम विभावना ॥ १०८ ॥
तुम सौतिन देखत दई, अपने हियते लाल ।
फिरतिसबनमें डहडही,उहै मरगजीमाल॥१०९॥
सखी वचन हे प्यारे ! सौतोंके देखते जो तुमने अपने हृदय
की माला उसे दी तबसे वह उस मुरझाई हुई मालाको
लिये सबमें डहडही ( हरीभरी ) फिरती है । पंचम विभा-
वना ॥ १०९ ॥

द्वितीयशतक २. (४१)
क्षणक उघारतिक्षणछुवति,राखतिक्षणकछिपाय।
सबदिनपियखंडितअधर,दर्पणदेखतजाय ११०
क्षणमें उघारती क्षणमें छूती और क्षणमें छिपारखती है
सब दिन प्यारेके खंडित अधर दर्पणमें देखती जाती है, ।
जाति अलंकार लाटानुप्रास ॥ ११० ॥
छाला छबीले छैलकों, नवल नेह लहि नारि ।
चूमति चाहति लाय उर, पहरति धरति उतारि १११
प्यारी स्त्री छबीले लालके नये नेहमें उसके दिये छल्लेको
पाकर चूमती है हृदय लगाय देखती है पहरती है उता-
र धरती है । प्रेमजातालंकार परकीया प्रेमगर्विता वर्णन
हुआ ॥ १११ ॥
स्वकीया रूपगर्वितावर्णन ।
दुसहसौति शल्य जुहिय,गनति न नाह विवाह ।
धरेरूपगुणकोगरव,फिरै अछेह उछाह ॥११२॥
हे सखी । सौतनोंका दुस्सह खटका सबके मनमें होताहै
परन्तु यह नायकके विवाहको कुछ नहीं गिनती; अपने
रूप और गुणका गर्व धारणकिये अनन्त आनंदसे फिरती है,
अर्थात् इसने समझरक्खाहै कि, आजतक तो यह मेरी पर-
ख नहीं जानते थे, अब दूसरेके आनेसे जब वे बातें उसमें न
देखेंगे तब मुझे अधिक जानेंगे । पंचमविभावना ॥ ११२ ॥