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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 84

प्रथमशतक १. ( ३१ )
हे नारायण ! अरी यह तेरी प्रकृति ( स्वभाव ) किसी
प्रकार नहीं जाती, हृदयमें स्नेह(प्रीतिरूप तेल) भर रक्खा है
तथापि तू रूखीही दीखती है, अतद्गुणालंकार [ दोहा-
जहँ गुणकी संगति नहीं, कहत अतद्गुण ताय । हियमें नेह
भरो तऊ, रूखी बाल लखाय ] ॥ ८० ॥
औरै गति औरै वचन, भयो वदन रंग और ।
द्योसेक तैं पियचितचढ़ी, कहैं चढ़ौं हैं त्यौर॥८१॥
ओरही प्रकारकी चाल, औरही प्रकारकी वाक्यरचना,
औरही प्रकारका मुखका रंग होगया, दो एक दिनसे पियाके
चित्तपर चढ़ी है, यह तेरी चढ़ी त्यौरी कहे देती हैं, भेदकां-
तिशयोक्ति ॥ ८१ ॥
रही फेर मुँह हेरि इत, हित समुहैं चित नारि ।
दीठ परत उठि पीठकी, पुलकें कहत पुकारि ८२
हे नारि ! इधरको देखकर तू मुँह फेररही है, परन्तु तेरा
चित्त प्रेमके सन्मुख हे, प्यारेकी दृष्टिके पड़नेही तेरी पीठपर
जो रोमांच होगये हैं, वह इसबातको पुकारके कहते हैं अनु-
मान ॥ ८२ ॥
वे ठाढे उमडात उत, जल न बुझैवड़वागि ।
जाहीसों लागो हियो, ताहीके उरलागि ॥८३॥