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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 79

( २६ ) सतसई-सटीक ।
मानतेहैं, दोनोंके नेत्रोंमेंही बातोंका रस और हँसीका आनंद
होताहै प्रथम विभावनालंकार ॥ ६४ ॥
यदपि चवायनि चोकनी, चलति चहूँ दिशसैन ।
तदपि न छाँडत दुहुँनके, हँसी रसीले नैन ॥६५॥
यद्यपि चबाव करनेमें चिकनी चुटपटी चतुरहैं, यद्यपि
चारों ओर उँगुली उठा उठाकर, लोगोंकी सैन चलती है,
तौभी दोनोंके रसीले नेत्र हँसी नहीं छोड़ते तीसरी विभा-
वना ॥ ६५ ॥
सटपटातसी शशिमुखी, मुख घूँघटपट ढांकि ।
पावक झरसी झमकिकै, गई झरोखे झांकि ॥६६॥
चन्द्रमुखी सटपटातीसी घूँघटके पटसे मुख ढककर अग्नि
की झरसी झमककै झरोखेमें झांककर गई पूर्णोपमा॥ ६६ ॥
कबकी ध्यान लगी लखौं, यह घर लगिहै काहि ।
डरियतभृंगी कीटलों, जिन वहई ह्वैजाहि ॥६७॥
हे सखी! मैं इसे कबकी ध्यान लगाये देखरही हूं यह इस-
का घर कौन संभालेगा. मुझे डरहै कि, भृंगी कीटके समान
ध्यान करते करते कहीं जिसका ध्यान करती है वही न हो-
जाय भृंगी कीडा जिसे पकड़ताहै क्षणमें उसे अपना स्वरूप
बनालेताहै स्मृति अलंकार ॥ ६७ ॥