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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 80

प्रथमशतक १. ( २७ )
रही अचलसी ह्वै मनो, लिखी चित्रकी आहि ।
तजे लाज डर लोकको, कहो विलोकति काहि ६८
वह ऐसी अचलसी होरहींहैं, मानो चित्रकी लिखीहो,
लोककी लाज और लोकका भय छोड़कर कहो किसको
देखतीहो, उत्प्रेक्षालंकार ॥ ६८ ॥
पल न चलै जकिसीरही, थकिसीरही उसाँस ।
अबही तन रितयो कहा,मन पठयोकिहिं पास६९
हे प्यारी! तुम्हारी पलक नहीं चलती, जड़सी होरही हो,
तथा उसाँस थकसा रहाहै; क्या अबही किसीके पास अपना
मन भेजकर तनु रीता किया है स्मृतिछेकानुप्रास ॥ ६९ ॥
नाम सुनतही ह्वै गयो, तनु औरै मन और ।
दबै नहीं चित चढरह्यो, अबै चढाये त्योर॥७०॥
प्यारी उनका नाम सुनतेही तुम्हारा तन और मन और
और होगया, त्यौरीके चढ़ायेसे जो चित्तपर चढ़रहाहै सो दबता
नहीं भेदकांति और छेकानुप्रास अलंकार ॥ ७० ॥
पूछे क्यों रूखी परति, सगबग रही सनेह ।
मनमोहन छवि पर कटी, कहै कट्यानी देह ७१
मेरे पूछनेसे क्यों रूखी होती है तूतो सनेहमें सगबग हो