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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 78

प्रथमशतक १. ( २५ )
हरौल सेनाका अग्रभाग प्यारीके नेत्र राजाकी सेना, चूँटपट
हरौल, और प्रियके नेत्र दक्षिणी कटक दृष्टान्तालंकार ॥ ६१॥
पहुँचति डटि रण सुभटलों, रोंकि सके सब नाहिं
लाखनहूकी भीरमें, आँखि वहीं चलिजाहिं ॥ ६२ ॥
रणके शूरमाके समान वहीं डटके पहुँचती है, सबभी नहीं
रोकसकते। लाखोंकीभी भीरमें आंखें वहीं चलकर जाती हैं,
विशेषोक्ति विभावना पूर्णोपमा ॥ ६२ ॥
ऐंचतिसी चितवन चितै, भई ओट अरसाय ।
फिर उझकनको मृगनयनि, दृगनि लगनियां लाय ॥
खैंचतीसी दृष्टिसे देखकर फिर अलसाकर ओटमें हुई मृग-
नयनी मेरे नेत्रोंमें लगनियां लगाकर फिर देखनेके निमित्त
अथवा हे सखी ! मृगनयनी मैं फिर उसके झाँकनेके निमित्त
अपने नेत्रोंमें लगन लगा रहाहूं कि वह मुझे प्यार करती
है फिर उझकेगी. अनुमानालंकार, जहां किसी बातसे कुछ
मनमें होनहार विचारी जाय वह अनुमान है ॥ ६३ ॥
दूरौ खरे समीपको, मानलेत मन मोद ।
होत दुहुँनके दृग नहीं, बंतरस हँसी विनोद ॥ ६४ ॥
यद्यपि वे दोनों दूर खड़े हैं, परन्तु समीपका मनमें आनंद