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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 76

प्रथमशतक १. ( २३ )
सबही तनु समुहाति क्षण, चलति सबनिदै पीठ।
वाही तनु ठहराति यह, किवलनु मालौं दीठ ५६
क्षणमात्र सबहीकी ओर देखती है और क्षणमें
सबहीकी ओर पीठ दे चलतीहै, परन्तु यह किवलनुमासी
दृष्टि उन्हीं (कृष्ण) की ओर ठहरतीहै, किवलनुमा सदा
पश्चिमहीकी ओर रहताहै पूर्णोपमा, दृष्टि उपमेय किवलनुमा
उपमान, लौं वाचक, समुहातिधर्म है ॥ ५६ ॥
खरी भीरहू भेदिकै, कितहूं है इत आय।
फिरै दीठ जुरि दीठसों, सबकी दीठ बचाय॥५७
प्यारीकी दृष्टि कितहूं होय बहुतसी भीड़को भेदकर भी
इधर आती है और सबकी दृष्टि बचाकर स्वामीकी दृष्टिसे
प्रियाकी दृष्टि मिलकर फिरती है विभावनालंकार ॥ ५७ ॥
कहतनटतरीझतखिजत,मिलतखिलतलजियात।
भरे भौनमें करतहैं, नैननिमें सबवात ॥५८
कहते हैं, नाहीं करते हैं, प्रसन्न होते, खीजते, मिलने,
खिलते और लजातेहैं, भरे घरमें सब बातें नेत्रों मेंही करते हे,
आशय यह कि, प्यारेने चलनेका संकेत किया प्यारीने नाहीं
कही, इस भावसे प्यारे रीझे, तब प्यारी खीजी, फिर मिल-
कर नायक प्रसन्न हुए, प्यारी लजाई पूर्वार्द्धमें कारकदीपक