बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३२ ) सतसई-सटीक ।
प्यारेको देख प्रिया सखीसे लिपटी उसपर कहते हैं वे उधर
खडे हुए उमडते हैं उधर बड़वाग्नि (समुद्रकी आग) जलसे नहीं
बुझती जिससे तेरा मन लगा है उसीके हृदयसे लग तौ यह तेरी
कामाग्नि बुझेगी. स्वभावोक्ति ॥ ८३ ॥
लाज गर्व आरस उमँग, भरे नैन मुसकात ।
राति रमी रति देति कहि, औरै प्रभा प्रभात॥८४॥
लाज, गर्व और आलस्य उमंगसे भरीहुई तेरी आँखें मुस-
काती हैं, यह प्रभातसमयकी औरही प्रभा (कान्ति) कहे
देती है रातके रमनेकी छिपी हुई रति क्रीड़ा, भेदकांति
शयोक्ति ॥ ८४ ॥
नटन शीश साबित भई, लुटी सुखनकी मोट ।
चुपकरिये चारीकरति, सारी परी सरोट ॥ ८५ ॥
हे सखी ! अब तू मुकरै मत, वह बातकी तैने सुखकी मोट
लूटी है तेरे शिर साबित है; यह सारीकी पड़ी सबबटैंहीं चुपकी
चुपकी तेरी चुगली खाती हैं काव्यलिंग ॥ ८५ ॥
मोसों मिलवति चातुरी, तू नाह मानति भेद ।
कहेदेत यह प्रगटही, प्रगट्यो पूस प्रस्वेद ॥८६॥
मुझसे चतुराई मिलाती है और अपनी बातोंमेंसे भेद दूर