बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३० ) सतसई-सटीक ।
तू मतमानै मुक्तई, किये कपटवत कोटि ।
जो गुनहीतो राखिये, आँखनि माहिं अगोटि ७८
लोगोंके कपटसे कोटिवातें करनेपरभी तू अपने चाहतेसे
वियोग मतमानै जो नायक तुम्हारा अपराधी है तौ आंखोंमें
नजर बंद कररख. तात्पर्य यह है कि, प्रीतमको मानका
रूप भला लगता है सो जानकै रुठावैहै । गुणही अपराधी
सम्भावना अथवा करोड़ कपट वल करनेपरभी अच्छेकी
मतमानै जो हृदयमें गुणहै तो नेत्रोंमें भर रख । अर्थात् तू
गुणी है तो छिपा तौ सही ॥ ७८ ॥
धन यह द्वैज जहां लख्यो, तजो दृगनि दुखद्वंद।
तुव भागनि पूरव उयो, अहो अपूरव चंद ॥७९॥
धन्य यह दोयजहै जहां देखागयाहै और नेत्रोंने दुःखद्वंद
त्याग दिया अहो कृष्ण यह अपूर्व चंद्रमा तुम्हारे भाग्यसेभी
पूर्वमें उदय हुआहै प्यारीका मुख जो चन्द्रवत कहाहै वही
अपूर्व है पूर्णचंद्र पूर्वमें उदय होताहै सो दोयजके दिनही उस-
पूर्ण चंद्रमुखीका पूर्वमें दर्शन है यही अपूर्वता है पर्या-
योक्ति ॥ ७९ ॥
एरी यह तेरी दई, क्योंहू प्रकृति नजाय।
नेहभरे हिय राखिये, तू रूखिये लखाय॥८०