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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 81

( २८ ) सतसई-सटीक ।
रही है, तू मनमोहनकी छविपर रीझ रहीहै, सो तेरे शरीरके
रोमांच कहे देते हैं, काव्यलिंग ॥ ७१ ॥
प्रेम अडोल डुलै नहीं, मुखबोलै अनखाय ।
चितउनकी मूरतिबसी, चितवनि माहिंलखाय ७२
हे सखी तुम्हारा प्रेम अडोलहै डुलतानहीं, और मुखसे
अनखाकर बोलतीहो, मनमें तुम्हारे प्यारेकी मूर्ति बसी है,
सो नेत्रोंमें दीखतीहै,अथवा प्रेम निश्चलही है मुखसे अनखा-
कर बोलनेसे डुलेगा नहीं, उनकी मूर्ति तेरे मनमें बसी है,
यह चितवनहीमें दिखाई देताहैं, अथवा प्रेम डोलहै सो हमने
जाना कारण कि, डुलता है, भाव यह कि मूर्ति नहीं डुलती
इससे तेरा चित्त उनमें दृष्टि आताहै और मुखसे बोलनेमें अनख
है इससे विदितहै कि, हृदयमें नहीं अनुमानअलंकार॥७२॥
ऊँची चितै सराहियत, गिरह कबूतर लेत ।
दृगझलकित मुलकितवदन,तनु पुलकितकहिदेत।
ऊँचे देखकर सराहा जाता है, कबूतर गिरह लेताहै किस
कारण नेत्र झलकते मुख मुलकता और शरीर पुलकित
होताहै, नायकका कबूतर देखकर प्यारीके मनमें उसका
स्वरूप आनेसे सात्विक भाव हुआ हेतुअलंकार ॥ ७३ ॥
यह मैं तोहीमें लखी, भक्ति अपूरव बाल ।
लहि प्रसाद मालाजुभौ, तनु कदम्बकी माल७४॥