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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 82

प्रथमशतक १. ( २३ )
हे प्यारी! यह मैने तुझीमें अपूर्व भक्ति देखी कि,प्रीतमकें
गलेकी प्रसादमाला पाकर तेरा शरीर कदम्बकी मालासां
हुआ रोमांच सात्विकहुआ हेतुअलंकार ॥ ७४ ॥
कोटियतन कीजे तऊ, नागरिनेह दुरैन ।
कहेदेत चित चीकनो, नई रुखाई नैन ॥ ७५ ॥
हे नागरि चतुरी चाहे कोटि उपाय करो, परन्तु प्रेम नहीं
छिपता, स्नेहभरा मन और नेत्रोंकी नई रुखाई यह दोनों
इसबातको कहेदेते हैं, पंचमविभावना विरुद्धसे काज होना
रुखाईसे चिकनाई प्रगट है ॥ ७५ ॥
और सबै हरषी फिरैं, गावति भरी उछाह ।
तूही बहू विलखी फिरै, क्यों देवरके व्याह ॥७६॥
और सब प्रसन्नहुई फिरती हैं, उछाहभरी गाती हैं, हे
बहू ! देवरके व्याहमें तू क्यों दुःखी हुई फिरती है उल्हासा-
लंकार ॥ ७६ ॥
नैन लगे तेहि लगनिमों, छुटे न छूटैं प्रान ।
काम न आवत एकहू, तेरेसों कि सयान ॥ ७७॥
मेरे नेत्र उन प्रीतमसे लगेहैं जो प्राण जानेमें न छूटेंगे
तेरेसों सयानोंसे एकभी सयान मेरे काम नहीं आता, अत्युक्ता-
लंकार [ दोहा-अतिशय अर्थ प्रकाश जहँ, सो अत्युक्ति
कहाय । प्राणगये छुटिहै नहीं, नैना यों समुझाय ॥ ]॥७७॥