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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 77

( २४ ) सतसई-सटीक ।
अलंकार [दोहा-जहां कहूं इक वाक्यमें, भाव अनेक दिखाहिं।
कारक दीपक कहतहैं, कविजन ताहि सराहिं ] उत्तरार्द्धमें
विभावना है ॥ ५८ ॥
दीठ बरत बांधी अटनि, चढि आवत न डरात।
इत उतते चित दुहुँनके, नटलों आवतजात ५९॥
दोनों ने अटारीपरसे दृष्टिकी रस्सी बांधी है, उसपर बरा-
बर चढ़ते आते हैं डरते नहीं इधर उधरसे ( उनरस्सोंपर )
दोनोंके मन नटके समान आते जाते हैं, रूपकालंकार पूर्णो-
पमालंकार है ॥ ५९ ॥
संजनयनि मज्जन किये, बैठी व्यौरति बार ।
कच अँगुरिन बिचदीठदे,चितवति नंदकुमार६०
कमललोचनि स्नानकर बैठकर बार व्योरने ( सुलझाने )
लगी, परन्तु बालोंमें अंगुलियोंके लगानेमें जो छिद्र
होते हैं उन छिद्रोंमें दृष्टि लगाकर कृष्णको देख रही है
पर्यायोक्ति ॥ ६० ॥
जुरे दुहुँनके दृग झमकि, रुके न झीने चीर ।
हलकी फौज हरोल ज्यों,परति गोलपर भीर६१
दोनोंके नेत्र झमककर जुरे झीने वस्त्रमें रुके नहीं, जैसे
सेनाकी हलकी हरावलके समान गोलपर भीर पड़ती है.