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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

साहित्यपरिचय। ( २७ )
कुटुम्बी हितकारीजनोंके उत्तरके 'नहीं' यही दो अक्षर
होते हैं परंतु "सबै दिन नाहिं बरोबर जात" अंतमें क्षीणधन
होनेसे निकाले जाते और पछताते हैं यह रक्तहों वा विरक्त हों
इनमें प्रीति दुर्लभ है।
कोई इनमें कामके वशीभूत होनेसे अनुरागिणी भी
होती है।
अन्य स्त्रियोंके स्वाधीनभर्तृका, खण्डिता, अभिसारिका,
कलहान्तरिता, विप्रलब्धा, प्रोषितभर्तृका, वासकसज्जा, विर-
होत्कंठिता यह भेद हैं।
जो अपने स्वामीके सदा प्रेममें आधीन रहै यह स्वाधीन-
भर्तृका, अन्य स्त्रीसे रति करके उसके चिह्नोंसे युक्त पति
जिसके पास आवै वह खण्डिता, जो वेष छिपाकर संकेतमें
नायकके पास जाय वह अभिसारिका, क्षेत्र बावडीके
निकट भग्नदेवालय दूतीके घर वन स्मशान नदी आदिका
तट यह अंधकारके समय इनके अभिसारके स्थान हैं।
जो क्रोधसे बुरे वचन कहकर प्राणनाथको बाहर करदे पीछे
पछतावै वह कलहान्तरिता है, जिसका प्रीतम संकेत करके
मिलनेको न आवै वह विप्रलब्धा । जिसका पति कार्यवश
परदेश गया हो उसकी कामार्त्त स्त्री प्रोषितभर्तृका कहातीहै,
जो स्वामीका संगम जान कर शृंगार कर सेज प्रस्तुत करती
है वह वासकसज्जा, आनेका निश्चय करके प्रारब्धमें जिस-

( २८ ) साहित्यपरिचय ।
का पति न आवै वह विरहोत्कंठिता कहातीहै इनमें
मध्यम अधम लगाकर ३८४ सेभी अधिक नायकाभेद होते
हैं सो विस्तारभयसे नहीं लिखे, इनके शरीरमें
कारण अट्ठाईस विकार होते हैं और भावसे लेकर धैर्यतक
दशपुरुषोंमें होते हैं तथाहि-
भाव-निर्विकारात्मक चित्तमें पहला विकार ( विभाव
अनेत्रादिके विकारसे सम्भोगकी इच्छा प्रगट करनी, थोडा
संलक्ष्यका विकार हाव है। खेलादिके अत्यन्त प्रगट विकारका
नाम हेलाहै । रूप यौवनके लालित्यका नाम शोभाहै।कामकी
अधिकाईके प्रकाशका नाम कान्ति कान्तिकी अधिकाईदीप्ति।
सब अवस्था में रमणीयताका नाम माधुर्य है। भय न माननेका
नाम प्रागल्भ्यहै । विनयका नाम औदार्य्यहै । अपनी श्लाघा
करके चंचलता त्यागकर स्थिर मनोवृत्ति रखना धैर्यहै।
अलंकार धारणपूर्वक प्रीतियुक्त प्रेमभरे वचन
प्रियकी अनुकृतिका नाम लीलाहै । इष्टके देखने

साहित्यपरिचय । ( २९ )

किल किंचित् है। प्रीतमकी कथादिमें भाव रखकर कानआदिके
खुजाते जानेका नाम मोहायित है । प्रीतमके केश स्तन
अधरादिके स्पर्श करनेसे जो सम्भ्रमसे हाथ पैरका विधू-
नन है उसको कुट्टमित कहते हैं। जो पतिके आगमनादिके
हर्षमें शीघ्रताके कारण अन्यस्थानमें अन्यभूषणोंका धारण
करनाहै उसको विभ्रम कहते हैं।सुकुमारतासे अंगोंके विन्या-
सको ललित कहते हैं। सौभाग्य यौवनके मदसे उत्पन्न हुआ
विकार मदहै । वचन कहनेके समय लाजसे जो न कहाजाय
वह विकृतहै। प्रियके वियोगसे कामावेशकी चेष्टासे उत्पन्न
व्यापार तपनहै। जो जानकर भी अज्ञानके समान प्रियासे
वस्तु आदिके निमित्त प्रश्न है उसका नाम मौग्ध्यहै। प्रीत-
मके समीप भूषणोंकी अर्धरचना, निरर्थक चारों ओर
देखना कुछ मंद मंद गोपनीय विषयको कहना विक्षेप ह।
रम्यवस्तुके देखनेकी चंचलताका नाम कुतूहल है ।
यौवनके उद्भेदसे वृथाहास्यका नाम हसित है । प्रीतमके
आगे थोडे कारणसेभी भयसे संभ्रमका नाम चकितहै। विहा-
रमें प्रीतमके साथ क्रीडाका नाम केलि है। यह अट्ठाईस
विकार स्त्रीजनोंको होते हैं, भावसे लेकर धैर्यपर्यन्त दश
पुरुषोंको होते हैं। मुग्धा कन्या केवल देखती है, बहुत
पूछनेसे कुछ कहतीहै। लेख दर्शन चेष्टा तथा दूतीके मुखसे
स्त्रियोंके भाव प्रगट होते हैं कलाकौशल उत्साहसे युक्त

( ३० ) साहित्यपरिचय ।
भक्तिमान् तत्त्वज्ञाता स्मृतिवान् मधुरभाषी बहुत वाचालता-
युक्त दूती होनी चाहिये उत्तम मध्यम अधमके भेदसे यहभी
कई भेदवाली हैं।
सत्त्वसे उत्पन्नहुए विकार सात्त्विक कहाते हैं, भय वा
हर्षसे चेष्टाका स्तंभ होजाना, पसीना आजाना, रुएँ खड़े
होजाना, स्वरभंग होजाना, कंपित होना, विवर्णता हो जानी,
विषाद वा मदसे । क्रोध दुःख वा हर्षसे नेत्रोंमें जल आजा-
ना, सुख दुःखकी चेष्टाका ज्ञान न रहना प्रलयहै, यह भाव
प्रेममें उदय होते हैं। कई कारणोंसे ग्लानि मानकर अपनी
अमाननाका नाम निर्वेद है। व्यभिचारी होनेसे इनकेभी तैंती-
स भेद होते हैं।
रसके धर्म काव्यमें माधुर्य्य ओज प्रसाद यह तीन प्रका-
रके हैं, सुनतेही चित्त द्रवीभूत होकर आह्लादको प्राप्तहो इसका
नाम माधुर्य्य है । मनके विस्ताररूप विकासका नाम ओज है,
वीर बीभत्स रौद्र रसमें इसकी अधिकता है।

साहित्यपरिचय। (३१)
दोहा-प्रथम शब्द याते कहें, प्रथम शब्दके साज ॥
बहुरि अर्थके जानिये, अलंकार कविराज ॥ १ ॥
उक्तिभेदते होत हैं, अलंकार यह जानि ॥
वक्र उक्ति याते कही, द्वैविधि प्रथम बखानि॥ २ ॥
कहै बात औरै कछू, अर्थ करै कछु और ॥
वक्रउक्ति ताको कहें, श्लेष शुद्ध द्वै ठौर ॥ ३ ॥
वर्ण एकसे फिर जहाँ, अनुप्रास है सोय ॥
छेकविदग्धा वृत्ति करि, सो पुनिद्वै विधि होय ॥ ४ ॥
जहाँ बहुतसे वर्ण एकवार फिर आवैं वह विदग्धा अनु-
प्रासहै। अनेक व्यंजनका एकधा स्वरूपसे वा वारंवार अने-
क प्रकार क्रमसे एक व्यंजनका बारवार समभावसे जो वर्तना
है उसको वृत्यनुप्रास कहते हैं।
दोहा-फिरै अर्थ पदयुत जहाँ, अर्थभेद नहिं कोय ।
सो लाटानुप्रास पुनि, भावभेदते होय ॥ १ ॥
एक शब्द बहु शब्दको, एकरु भिन्न समास ।
परने वचन समासहू, पांच भांति सुप्रकाश ॥ २ ॥
यमकलक्षण ।
दोहा-अर्थ होय भिन्न जहाँ, शब्द एक अनुहार ।
यमक कहत तासों सबे, भेद अनन्त विचार ॥ १ ॥

( ३२ ) साहित्यपरिचय ।
श्लेषलक्षण ।
दोहा-कह जेहि अर्थ अनेकको, रहै एकही रूप ।
शब्द तहां सुश्लेष हैं, आठ भांति सुअनूप ॥ २ ॥
वर्ण वचन अरु लिंग पुनि, कहि विभक्ति पदकान्ति ।
भाषा अरु प्रत्यय प्रकृति, वरन आठ यहि भांति॥३॥
चित्रलक्षण ।
दोहा-लिखिवेहीकी चतुराई, उपजैं भेद अनेक ।
जहां सुचित्र कवित्त है, बहुविधि बन्धु विवेक ॥ १ ॥
अर्थालंकार ।
दोहा-उपमा औ उपमेय हैं, अलंकारके प्रान ।
तात इनको प्रथमही, कहियत रूप वखान ॥ १ ॥
होय बड़ाई सम किये, जाकूं सो उपमानि ॥
जाको वर्णन कीजिये, सो उपमेय बखानि ॥ २ ॥
शब्द अर्थ समना कहें, दोउनकी जेहि ठौर ॥
नहिं कल्पितउपमान जेहि, सो उपमा शिरमौर ॥३॥
शब्द सबैदौ पाइयै, समना श्रौती सोय ॥
अर्थ विचारै आर्थी, उपमाद्वै विधि होय ॥ ४ ॥
समना पद उपमेय पुनि, धर्म और उपमान ॥
चारो जुरैं सो पूरना, लोपहु ता जान ॥ ५ ॥

साहित्यपरिचय। ( ३३ )
जिमि जैसो मानोरु सों, भाषा श्रौती जान।
सम समान उपमा तुला, जोग आरथी आन ॥ ६ ॥
औरै जे समता कहैं, प्रगटति श्रौती हेत।
जे समझावैं अर्थसो, ते आरथी निकेत ॥ ७ ॥
लुप्ता।
दोहा–उपमा औ उपमेय पुनि, वाचकधर्म बखान।
एक दोय अरु तीन पुनि, लोपैलुप्ता जान ॥ १ ॥
प्रतिवस्तूपमा।
दोहा–समतासूचक पद जहाँ, रहै एक द्वै भांति ॥
सो है प्रतिवस्तूपमा, पदसमूहकी कांति ॥ १ ॥
जहँ लघुता उपमानकी, सो प्रतीप ह्वै भेव ॥
प्रथम निरादर कीजिये, पुनि कीजे उपमेव ॥ २ ॥
संशयमें जो सांचसी, तेहि विधिको उपमान ॥
अधिक होय उपमेयते, सो उत्प्रेक्षा जान ॥ ३ ॥
उपमा अरु उपमेयको, भेद परै नहिं जानि ॥
समता व्यंग्यरहै जहां, रूपक ताहि बखानि ॥ ४ ॥
जँहँ देखत उपमानको, सुधि आवै उपमेय ॥
ताही सों सुमिरण कहत, जे कवि जानत भेय ॥ ५ ॥
करि निषेध उपमेयको, जहँ थापै उपमान ॥
बहुविधि वाचक भेदते, ताहि उपह्नुति जान ॥ ६ ॥
३

( ३४ ) साहित्यपरिचय।
जहँ संबंध बने न तब, उपमामें विश्राम ॥
हेतु क्रिया कारि दोप है, निदर्शना सुखधाम ॥ ७ ॥
अति अभेद जिय राखि जहँ, नहिं कहिये उपमेय ॥
उपमानि कहिये जहाँ, अतिशयोक्ति सो भेव ॥ ८ ॥
उपमानरु उपमेय पुनि, साधारण जेहि ठाउँ ॥
वाचक सब प्रतिबिम्बहै, सो दृष्टान्ता नाउँ ॥ ९ ॥
अगले २ योग जहँ, प्रथम अधिक गुण होय ॥
मालादीपक कहत हैं, ताहि सब कविलोग ॥ १० ॥
दीपकहींसों भेव यह, नियत एकहीं होय ॥
उपमानि उपमेयको, तुल्य योग्यता सोय ॥ ११ ॥
जहाँ अधिक उपमानते, कहियत है उपमेय ॥
सो व्यतिरेक बखानिये, ऊँच नीच गुण भेय ॥ १२ ॥
इनके चौबीस भेद होते हैं.
दोहा—कथ्यो न कछु कहि बरनि, अधिकाईके हेत।
कह्यो कि कहिब भेद द्वै, आक्षेप कहि देत ॥ १ ॥

साहित्यपरिचय । ( ३१ )
संख्याक्रम चूकै नहीं, यथा संख्य है सोय ॥ १ ॥
जहां अर्थ सामान्यको, पोपन करे विशेप ।
पुनि सामान्य विशेषको, जेहिठाँ पोप न लेप ॥ २ ॥
सो अर्थान्तर न्यास है, और अर्थ जहाँ होय ।
स्वधर्म विधर्म भेदकर, चारभांति है सोय ॥ ३ ॥
है न विरोध विरोधसो, बातन माहिँ लखाय ।
जाति क्रिया गुण नाम करि, सो विरोध दशभाय ॥४॥
जाति चारिसों तीनगुण, द्वैसे क्रिया विरुद्ध ।
नाम नामहीसों बहुरि, यौँ हैं दश विधि शुद्ध ॥ ५ ॥
रूप रहै जु सुभायकै, तिनको वर्णन होय ।
सुस्वभावोक्ति जानिये, कृतिम जहाँ नहिं सोय ॥ ६ ॥
बहानेसे दोष वर्णन करनेका नाम व्याजस्तुति है, और
अर्थके बिना अर्थ जहाँ भला बुरा न हो उसको विनोक्ति कह
ते हैं जहां अर्थ बदले जाते हैं वह विनिमय अलंकार है सम
और अर्थ भेदसे दो प्रकारका है ।
सहोक्ति लक्षण ।
[L18

( ६६ ) साहित्यपरिचय ।
पदसमूहके अर्थ यह, हेतुनि द्विविधि होय ।
जहां सुकाव्यालिंगहै, द्वै पुनि द्वै विधि सोय ॥ ३ ॥
यह भी दो प्रकारका होता है ।
समुच्चय वर्णन ।
मूल अर्थकी सिद्धि जहँ, एक अर्थते होय ।
आगे पोषकहोय बहु, वरनि समुच्चय सोय ॥ १ ॥
एक अनेकनमें रहै, वरणपर्यायसु और ।
सो दूजो अरु अनेक जहँ, रहत एकही ठौर ॥ २ ॥
जनक परस्परा जानके, दोन अर्थ तब होय ।
एक क्रियाके योगते, सो अन्यान्‍याहिगोय ॥ ३ ॥
इस प्रकार संक्षेपसे थोड़े अलंकारोंका लक्षण दिखा दि-
याहै टीका करते समय भी बहुत अलंकारोंके लक्षण लिख
दिये हैं तात्पर्य पढनेवालोंको इसमें बहुत कुछ काव्यका भेद
खुलेगा; यदि और विशेष कुछ देखना हो तो वह दूसरे
काव्यादर्शवा , ग्रंथ जैसे काव्य निर्णयादि काव्यके
अंग देखें ।

श्रीगणेशायनमः ।
अथ बिहारीसतसईकी-
अकारादिअनुक्रमपूर्वक अनुक्रमणिका ।
अ. | अरतैं टरत ... ... ४५६
अंगअंगप्रतिबिम्ब ... ५३० | अरी खरी ... ... १६२
अंगअंगनग ... ... ५२९ | अरुनचरन ... ... ५१२
अंगअंगछवि ... ... ५३१ | अरुणसरोरुह ... ... ५७८
अंगुरिन .... ... २०६ | अरे परै ... ... ३८९
अजहुँ न आये ... ... १३० | अरे परंदो ... ... ६१५
अजौ तन्योनाहीं ... ... ६३९ | अरे हंसया ... ... ७१०
अतिअगाध ... ... ६०३ | अलिइन ... ... २५९
अधर धरत ... ... ६ | अलि इन लोयनसे ... २६०
अनत बसे .... ... १८८ | अहै दूहिन ... ... ६५०
अनरस ... ... ३७५ | अहै दहैंडी ... ... २२३
अनियारे दीरघ ... ३७१ |
अनी बड़ी ... ... ६५८ | आ.
अन्त भरेंगे ... ... ७०९ | आज कछु .... ... १८७
अपनी गरज ... ... ३०१ | आये दै आड़े ... ... ३८१
अपने अंगके .... ... २० | आप दगौ ... ... १८४
अपने अरैन ... ... ६८२ | आये आप .... ... ३७९
अपने गुहिकार ... ... ५५७ | आये मान .... ... ६४९
अब गति ... ... ५७६ | आननधाम ... ... ५८२

( २ ) - बिहारीसतसयीकी-
इ. | ओ.
इक भींजे .... ... ६०९ | ओछे बड़े न .... ... ६००
इत आवत .... ... ४१८ | ओठ उँचै ... ... २८२
इतते उत ... ... २८६ | औ.
इन अँखियां ... .... २७० | औंघाई ... .... ३८२
इहि आशा ... .... ६३१ | औये भांति ... .... ४१५
इहि हैही .... .... ४७४ | औरै सब ... ... ७६
इहि काटे ... .... ४७ | औरै ओप ... .... ८८
उ. | औरै गति .... .... ८१
उठि ठक ठक ... ... १५६ | क.
उडकुडबाती ... ... ३१५ | कंचन तनु ... ... ५२२
उडी गुर्डी ... ... २५५ | कञ्जनयनि ... ... ६०
उदय अस्त ... ... ७२३ | कच समेट .... .... ५४३
उनकी हितु ... ... २८९ | कत लपटैयत ... ... १९२
उनि हरकी ... ... २८८ | कत बेकाज ... ... १६८
उयो शरद ... ... २३७ | कत सकुचत ... ... १९०
उर मानिक्की .... ... ५०२ | कनक कनक ... ... ६४७
उर लीन्हे ... ... ३१० | कन दैबो ... ... ६५०
उर उरझ्यो .... ... २८७ | कपट सतर ... .... १०५
ऊ. | कबकी ध्यान ... ... ६७
ऊँचे चितय ... ... ७३ | कर उठाय .... ... ५०३
ए. | करके माँड़े ... .... ५२२
एरी यह तेरी ... ... ७० | करतु मलिन ... ... ५२५
ऐ. | कर फुलेलको .... ... ६४६
ऐंचतसी ... ... ६३ |

अनुक्रमणिका । ( ३ )
करले चूमि ... ... ४०५ | कालव्रूत... ... ... ३२२
करले संधि ... ... ६४५ | किती न गोकुल .... ... ७
करत जात ... ... २९५ | किय घायल ... ... ५१०
करी विरह ... ... ४२५ | कियो जु चिबुक ... .... १०८
करे चाहसों .... ... ३३ | कियो सयान ... ... १४४
करें सातसौ ... ... ७२७ | कियो सबै जग .... ... ५८१
करो कुवत .... .... ६९२ | कीनेऊ कोटक ... ... २८०
कबकी टेरत ... ... ६९० | कीजे चित सोई ... ... ६९८
कवि कहियत ... ... १७९ | कुंजभवन ... ... ५४८
कहत सबै ... ... ४४५ | कुष गिरि ... ... ४८४
कहत सबै कबि ... .... २६४ | कुटिल अलक ... ... ४४२
कहत नटत ... ... ५८ | कुढँग कोप ... ... ५७३
कहत न देवर ... .... १५ | केसर केसर .... ... १९७
कह लहि ... ... ५२० | केसरके ... ... ५३५
कह लाने ... .... ५६९ | कैवा आयत ... ... ३४३
कहा लैदैत ... ... २२७ | केस छोटे ... ... ५५९
कहा कहौं ... ... ७९८ | कोटि जनन ... ... ४०८
कहा कुसुम ... ... ५५९ | को छूटनौ .... ... ६३७
कहा भयो ... ... १९७ | को जानि ... ... २७१
कहो लैहूगे ... ... ३७३ | को हरसी ... ... ५०९
कहिपठई.... ... ... ९५ | कोटि ननन ... ... ७०
कहेतु वचन .... ... ३९४ | को कहिसकै, .... ... ३३९
कहै रही... ... ... ६०४ | कोटि नयन ... ... ७१५
कागद पर ... ... ४०७ | खोज कोटिक ... ... ६६६
काहे वरन ... ... २४५ | कौंधा और .... .... ४७१

( ४ ) बिहारीसतसयीकी-
कोनु सुनै ... ... ३९० | गहे न नेको ... ... ६४१
कौन भांति ... ... ६८७ | गह्यो अवाला ... ... ११९
क्यों बसिये ... ... २७५ | गाढ़े गाढ़े ... ... ४९८
क्योंहूं सब ... ... ३७६ | गिन्ती गनवे ... ... ५३१
क्ष. | गिरिते ऊँचे ... ... ६२५
क्षणेक उधार ... ... ११० | गिरे कंप ... ... ५६२
क्षणेक छबीले ... ... ३३६ | गुनी गुना सब ... ... ६१०
क्षणे वाचना ... ... २४४ | गुरुजन ... ... ७०८
क्षण २ में ... ... ३१३ | गोप अघाइन ... ... १५७
ख. | गोपिन संग ... ... १०
खरी भीर ... ... ५७ | गोरी गदकारी ... ... ५४३
खरी पातरी ... ... ३६७ | गोरी छिगुनी ... ... ४९६
खरी लसत ... ... ४९२ | गोधनतू ... ... ६२८
खरे अदब ... ... ३६१ | गोपिनके ... ... ६५४
खल बड़ई ... ... २९४ | घ.
खलित वचन ... ... २१९ | घनघेरी ... ... ५७७
खिंचे मान ... ... १०२ | घर घर हिन्दु ... ... ७०४
खेलन सिखये ... ... ४५८ | घर घर डोलत ... ... ६०६
खौरि पनच ... ... ४५३ | घाम घरीक ... ... ४८
ग. | च.
गडे बडे ... ... १७६ | चकी जकीसी ... ... ५२९
गढरचना ... ... ५९६ | चखरुचि ... ... २७९
गदराने तन ... ... ३४८ | चटक न छांडत ... ... ६९१
गली अँधेरी ... ... २२१ | चलन न पावन ... ... ५९७
गहली गरब ... ... ३६९ | चम चमात ... ... ४६८
गहाकि गांस ... ... २०० |

अनुक्रमणिका । (५)
चमक तमक ... ... ५४५ | छप्यो छबीलो ... ... ४९०
चलत चलत ... .... १३३ | छप्यो नेह... ... ... १२७
चलत घेर ... ... २४६ | छप्यो छुपाकर ... ... १५८
चलत पाँय ... ... ७०१ | छला परोसिन ... ... ११६
चकित ललित ... ... ५५५ | छला छवीले ... ... १२१
चलत देश ... ... १३९ | छाले परिवे ... ... ५३९
चले जाहु .... .... ६२२ | छिरके नाह ... ... ५५४
चलो चले ... .... ३७४ | छुटी न शिशुता... ... १७
चालेफी ... ... २९ | छुटी न लाज ... ... १४
चाहभरी ... ... १३७ | छुटन न पियत ... ... ३५३
चितवनि मोरे ... ... ३१२ | छुटे छुटावत ... ... ४४१
चितवत ... ... २७८ | छूटत मुठिन ... ... ५६१
चितवत नित ... ... ५१ | छैछिगुनी... .... ... २२५
चिरजीवो ... ... २२६ | ज.
चितवन रूखे .... .... ३५८ | जगत जनायो ... ... ६६९
चित तरसत ... .... ६२८ | जयजुगल... ... ... ५०६
चितपितु ... ... ६६२ | जब जब वह सुधि... ... ४१०
चितई उछ ... .... ५४ | जटित नील ... ... ४७२
चिनवै नितै ... ... ६३१ | जदपि नाहिं ... ... ७१९
चिलक चिकन .... ... ३१४ | जनम अजाचे ... ... ६४७
चुनरी श्याम ... ... ३१८ | जनक धरत ... ... ५३८
चुवत स्वेद ... ... ५८८ | जपमाला... ... ... ६८८
छ. | जरतार... ... ... ४९१
छवि रसाल ... ... ५६५ | जहां जहां ठांई ... ... ४१२
जांइ जूही ... ... ३३८

( ६ ) बिहारीसतसयीकी-
जात सयान ... ... २७६
जालरंध्रभग ... ... ३२६
जात जात बित ... ... ६७५
जात मरी.... ... ... २४९
जा मृगनैनी ... ... ७१५
जिन दिन... ... ... ६२०
जिहि निदाघ ... ... ३८३
जिहि भामिनि ... ... १७५
जुरे दुहुँनके ... .... ६१
जुवति जोन्हमें ... ... १६०
जेती सम्पति ... ... ५९३
जो तब होत ... ... ४७०
जोग जुगति ... ... ४५७
जो तिय तुम ... ... १९४
जो वाके तन ... ... ३०८
जो चाहै चट .... ... ३६५
जो शिर धारि ... ... ६१४
जोन्ह नहीं ... .... ४२०
जोन जुगति ... ... ५४७
जो कोऊ... ... ... ७
जोलों लखों .... ... १०४
ज्यों ज्यों... ... ... २२
ज्यों कर त्यों ... ... ५४१
ज्यों ज्यों बढ़ती... ... ... ५७९
ज्यों ज्यों पट ... .... ५६३
ज्यों ज्यों उलझि... .... ५५८
ज्यों ज्यों पावक ... ... १४८
ज्यों हुइहौं... ... ... ६९१
ज्यों ज्यों आवत ... ... १५४
झ.
झमकि चढ़त ... .... २८५
झीने पटमें... ... ... ४८२
झुकि झुकि ... ... १५३
झूठे जात न ... ... ४६१
ट.
टटकी ... ... ... २४३
टुनिहाई ... ... ... १२४
टोरीलाई ... ... ... ३३७
ठ.
ठाढी मन्दिर ... ... ७१२
ड.
डर न टरै ... ... ... २७७
डारे ठोढ़ी ... ... ४८५
डिगत पानि .... ... ६६०
ढ.
ढरे ढार .... ... ... २६३
ढीठचौ दे... .... ... २८
त.
तंत्रीनाद... ... ... ५९७

अनुक्रमणिका । ( ७ )
तजत अटान ... ... ७१५ | तो तन अधिक ... ... ५३६
तच्यो आँच ... ... ४२८ | तोपर वारी ... ... १२३
तजि तीरथ ... ... ६२१ | तोहीको छूट .... ... १०७
तजी शंक... ... ... ४२९ | तोही निरमोही ... ... ३५२
तनक झूठ ... ... ५४६ | तो लखि मो मन ... ... ५४६
तनभूषण.... ... ... ५१५ | तोरसराच्यो ... ... ३६८
तप न तेज ... ... ५८३ | तो भलिये ... ... ६९५
तर झुरसी ... ... ४०३ | तो लगिया .... ... ६७८
तरुणकौंक ... ... १८० | त्यो त्यों प्यासे ... ... ५३३
तरवनि ... ... ९३ | ध.
तिय कित ... ... ४६७ | थाकी जतन ... ... ३०६
तिय तरसी हैं ... ... ५७१ | थोरई गुन .... ... ६८९
तिय निज हिय .... ... २९१ | द.
तिय तिथि ... ... १८ | दयौसुशीश ... ... ६८५
तियमुख ... ... ४४८ | दच्छिन ... ... २०२
त्रिवली ... ... ४१ | दहें निगोड़े ... ... १००
तीतरपंख ... ... ३३२ | दिन दश आदर ... ... ६३५
तुरत सुरत ... ... १६९ | दियो अरघ ... ... २३३
तुम सौतिनि ... ... १०९ | दिये जु पिय ... ... ५६०
तुह कहत ... ... ९९ | दिशि दिशि ... ... ५६०
तु मनि मानै ... ... ७८ | दीठि परत ... ... ५०
तू मोहन ... ... ३२४ | दीठि परासिन .... ... ४१८
तू रहि सखि ... ... २३२ | दीठन परन ... ... ७२८
तेद तस्यौ .... ... १९१ | दीनेगेह ... ... ६१
तो अनेक ... ... ६८३ | दीरघ सांस ... ... १०५

( ८ ) बिहारीसतसयीकी-
दुःखबहायतु ... ... ३५५ ध.
दुरित न ... ... ४५९ धनियह द्वेज ... ... ७९
दुरै न निघर ... ... १३ धुँवा ... ... ... ३८६
दुसह दुराज ... ... ६०५ ध्यान आनि ... ... ३५८
दुसह विरह ... ... ३९३ न.
दुसह साँति ... ... ११२ नई लगनि ... ... २८४
दुचिते चितं ... ... ३४६ न करु न डर ... ... १८१
दुरयो खरे ... ... ६४ नख रेखा... ... ... १७२
दूजमुधा ... ... २५० नखशिख.... .... २६७
दृगनि लगत ... ... ४६२ नटिनशीश ... .... ८५
दृग धरकौंहै ... ... ५४२ नभलाली ... ... १५२
दृग मीचत ... ... २१३ नरकी औ नल ... ... ६२३
दृग उरझत ... ... २७३ नये बिससिये ... ... ५९२
देहडुलैया ... ... २६ नये विरह ... ... १३८
देखी सोनजुही ... ... ५१७ नवनागरि ... ... २१
देखाजान ... ... ३४५ नहिं अन्हाय ... ... ५३
देख्यो अनदेक्यो ... ... ४४ नहिं पराग ... ... ६२९
देखत कछु ... ... ५२ नहिं पावस ... ... ६३८
देखत चुरै ... ... २९७ नहिं हारिलो ... ... ३४१
देवर फूल हमें ... ... ४६ नहिं नचाय ... ... १०६
देह लग्यो ... ... ३२० नाक चढ़े ... ... २४५
दोऊ चाहभरे ... ... २३६ नागरिविविध ... ... ३३१
दोऊचोर ... ... २१६ नाचि अचानक ... ... ४०७
दोऊ अधिकाई ... ... ३६२ नाम सुनतही ... ... ७०
नावक शरसे ... ... २३८
नाल हराते ... ... ४३७

अनुक्रमणिका । ( ९ )
नासा मोरि ... ... ४५४ प.
नाह गरज ... ... ६५९ पग पग .... .... ५१३
नांह नहीं ... .... २४७ पचरंग ... ... ४५२
नाहिं नये ... .... ५६८ पटकी ढिग ... ... ९४
निज करनी .... ... ६९७ पटसों पौंछ ... ... १७४
नितप्रति ... .... ९ पट पाँख ... ... ६३३
निपट लँजीली ... ... २१८ पतनारी माला ... ... ६७१
निरखि ... . २७ पति रतिकी ... ... ३६
निरदइ नेह .... ... ३५४ पत्राही तिथि ... ... ४८९
नित संसों ... ... ४२५ पति ऋतु ... .... ३५९
निशिअंधियारी ... ... १६१ पर तिय ... ... ६५१
नीको लसत ... .... ४५४ पर्यो जोर .... ... २०७
नीकी दई ... ... ६८६ पलन चले ... ... ६९
नीच हिये ... ... ५१५ पल साँहें .... ... १७३
नीचई निच ... .... ४६५ पलन पीक ... .... १६५
नीठि नीठि .... ... २०८ परन प्रगट .... ... ४२६
नेको वह ... ... ३३८ पहरन भूषन ... ... ५२६
नैक उतै ... ... ३२७ पहरत री ... .... ४९३
नैक न झरसी ... ... २९३ पहुँची ... ... ६२
नैक न जानी ... ... ६०१ पाय तरूनि ... ... ६५३
नैक न जानी परति ... ४६३ पायक दृग .... .... ३८७
नैना नैक ... ... २६१ पावकसो ... ... १५७
नैक ऐसोहीं ... .... ४८३ पानिप न ... .... ५७१
नैन लगे .... ... ७१ पानहू कठिन ... ... ३९९
न्याव पराइ .... ... ५० पारतै निर ... ... ७३

( १० ) विहारीसतसयीकी-
पाय महावर ... ... ५०८ | फिरतनु ... ... १८९
पायल पाय ... ... ७१६ | फिरि सुधि दै ... ... ३९१
पिय तियसों .... ... ४७८ | फूले ... ... ४६६
पिय मन ... ... ३२५ | फूली फाली ... ... १६५
पिय माननको ... ... १२६ | फेरि कहू ... ... ३१९
पियके ध्यान ... .... ३४९ |
पिय बिछुरनकी ... ... ३७ | ब.व.
पीठ दिये ... ... ५५९ | बंधु भये ... ... ६८८
प्रीतम दृग ... ... २११ | बढी कुटुमकी ... ... ५५८
पूसमास ... ... १३१ | बडे कहावत ... ... ५९४
पूछैक्यों ... ... ७१ | बडे नहूजे ... ... ६४८
प्यासे दोपहर ... ... ६०१ | बढ़त निकस ... ... ५५६
प्रगट भये ... ... ६९९ | बतरस ... ... २५६
प्रति बिम्बित ... ... ७०३ | बन बाटन ... ... ३९२
प्रगटी आज ... ... ४२७ | बनतनको ... ... २७२
प्रफुल हार ... ... ५४४ | बरन वास ... ... ४७६
प्रलय करन ... ... ६६१ | बर जीते शर ... ... ४६०
प्राणप्रिया ... ... १७१ | बरजैं दुनी .... ... ५५०
प्रेम अडौले ... ... ७२ | बस सकोच .... ... २९२
| बसै बुराई .... ... ६०७
फ. | बहकि बड़ाई ... ... ३७०
फिरि घरको .... ... ५६७ | बहके सब ... ... ३६६
फिर फिर ... ... ९६ | बहु धन लै .... ... ६५३
फिरि फिरि दौरत... ... ४६३ | वह किन इहि ... ... २३१
फिर फिर चित ... ... २८१ | बाढत तो ... ... २३
फिरि २ बूझति ... ... ४१९ | वाम बाहु ... ... १४२