बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३० ) साहित्यपरिचय ।
भक्तिमान् तत्त्वज्ञाता स्मृतिवान् मधुरभाषी बहुत वाचालता-
युक्त दूती होनी चाहिये उत्तम मध्यम अधमके भेदसे यहभी
कई भेदवाली हैं।
सत्त्वसे उत्पन्नहुए विकार सात्त्विक कहाते हैं, भय वा
हर्षसे चेष्टाका स्तंभ होजाना, पसीना आजाना, रुएँ खड़े
होजाना, स्वरभंग होजाना, कंपित होना, विवर्णता हो जानी,
विषाद वा मदसे । क्रोध दुःख वा हर्षसे नेत्रोंमें जल आजा-
ना, सुख दुःखकी चेष्टाका ज्ञान न रहना प्रलयहै, यह भाव
प्रेममें उदय होते हैं। कई कारणोंसे ग्लानि मानकर अपनी
अमाननाका नाम निर्वेद है। व्यभिचारी होनेसे इनकेभी तैंती-
स भेद होते हैं।
रसके धर्म काव्यमें माधुर्य्य ओज प्रसाद यह तीन प्रका-
रके हैं, सुनतेही चित्त द्रवीभूत होकर आह्लादको प्राप्तहो इसका
नाम माधुर्य्य है । मनके विस्ताररूप विकासका नाम ओज है,
वीर बीभत्स रौद्र रसमें इसकी अधिकता है।