बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३२ ) साहित्यपरिचय ।
श्लेषलक्षण ।
दोहा-कह जेहि अर्थ अनेकको, रहै एकही रूप ।
शब्द तहां सुश्लेष हैं, आठ भांति सुअनूप ॥ २ ॥
वर्ण वचन अरु लिंग पुनि, कहि विभक्ति पदकान्ति ।
भाषा अरु प्रत्यय प्रकृति, वरन आठ यहि भांति॥३॥
चित्रलक्षण ।
दोहा-लिखिवेहीकी चतुराई, उपजैं भेद अनेक ।
जहां सुचित्र कवित्त है, बहुविधि बन्धु विवेक ॥ १ ॥
अर्थालंकार ।
दोहा-उपमा औ उपमेय हैं, अलंकारके प्रान ।
तात इनको प्रथमही, कहियत रूप वखान ॥ १ ॥
होय बड़ाई सम किये, जाकूं सो उपमानि ॥
जाको वर्णन कीजिये, सो उपमेय बखानि ॥ २ ॥
शब्द अर्थ समना कहें, दोउनकी जेहि ठौर ॥
नहिं कल्पितउपमान जेहि, सो उपमा शिरमौर ॥३॥
शब्द सबैदौ पाइयै, समना श्रौती सोय ॥
अर्थ विचारै आर्थी, उपमाद्वै विधि होय ॥ ४ ॥
समना पद उपमेय पुनि, धर्म और उपमान ॥
चारो जुरैं सो पूरना, लोपहु ता जान ॥ ५ ॥