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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 37

( ६६ ) साहित्यपरिचय ।
पदसमूहके अर्थ यह, हेतुनि द्विविधि होय ।
जहां सुकाव्यालिंगहै, द्वै पुनि द्वै विधि सोय ॥ ३ ॥
यह भी दो प्रकारका होता है ।
समुच्चय वर्णन ।
मूल अर्थकी सिद्धि जहँ, एक अर्थते होय ।
आगे पोषकहोय बहु, वरनि समुच्चय सोय ॥ १ ॥
एक अनेकनमें रहै, वरणपर्यायसु और ।
सो दूजो अरु अनेक जहँ, रहत एकही ठौर ॥ २ ॥
जनक परस्परा जानके, दोन अर्थ तब होय ।
एक क्रियाके योगते, सो अन्यान्‍याहिगोय ॥ ३ ॥
इस प्रकार संक्षेपसे थोड़े अलंकारोंका लक्षण दिखा दि-
याहै टीका करते समय भी बहुत अलंकारोंके लक्षण लिख
दिये हैं तात्पर्य पढनेवालोंको इसमें बहुत कुछ काव्यका भेद
खुलेगा; यदि और विशेष कुछ देखना हो तो वह दूसरे
काव्यादर्शवा , ग्रंथ जैसे काव्य निर्णयादि काव्यके
अंग देखें ।