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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 290 में से

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पृष्ठ 30

साहित्यपरिचय । ( २९ )

किल किंचित् है। प्रीतमकी कथादिमें भाव रखकर कानआदिके
खुजाते जानेका नाम मोहायित है । प्रीतमके केश स्तन
अधरादिके स्पर्श करनेसे जो सम्भ्रमसे हाथ पैरका विधू-
नन है उसको कुट्टमित कहते हैं। जो पतिके आगमनादिके
हर्षमें शीघ्रताके कारण अन्यस्थानमें अन्यभूषणोंका धारण
करनाहै उसको विभ्रम कहते हैं।सुकुमारतासे अंगोंके विन्या-
सको ललित कहते हैं। सौभाग्य यौवनके मदसे उत्पन्न हुआ
विकार मदहै । वचन कहनेके समय लाजसे जो न कहाजाय
वह विकृतहै। प्रियके वियोगसे कामावेशकी चेष्टासे उत्पन्न
व्यापार तपनहै। जो जानकर भी अज्ञानके समान प्रियासे
वस्तु आदिके निमित्त प्रश्न है उसका नाम मौग्ध्यहै। प्रीत-
मके समीप भूषणोंकी अर्धरचना, निरर्थक चारों ओर
देखना कुछ मंद मंद गोपनीय विषयको कहना विक्षेप ह।
रम्यवस्तुके देखनेकी चंचलताका नाम कुतूहल है ।
यौवनके उद्भेदसे वृथाहास्यका नाम हसित है । प्रीतमके
आगे थोडे कारणसेभी भयसे संभ्रमका नाम चकितहै। विहा-
रमें प्रीतमके साथ क्रीडाका नाम केलि है। यह अट्ठाईस
विकार स्त्रीजनोंको होते हैं, भावसे लेकर धैर्यपर्यन्त दश
पुरुषोंको होते हैं। मुग्धा कन्या केवल देखती है, बहुत
पूछनेसे कुछ कहतीहै। लेख दर्शन चेष्टा तथा दूतीके मुखसे
स्त्रियोंके भाव प्रगट होते हैं कलाकौशल उत्साहसे युक्त