सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 290 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 28

साहित्यपरिचय। ( २७ )
कुटुम्बी हितकारीजनोंके उत्तरके 'नहीं' यही दो अक्षर
होते हैं परंतु "सबै दिन नाहिं बरोबर जात" अंतमें क्षीणधन
होनेसे निकाले जाते और पछताते हैं यह रक्तहों वा विरक्त हों
इनमें प्रीति दुर्लभ है।
कोई इनमें कामके वशीभूत होनेसे अनुरागिणी भी
होती है।
अन्य स्त्रियोंके स्वाधीनभर्तृका, खण्डिता, अभिसारिका,
कलहान्तरिता, विप्रलब्धा, प्रोषितभर्तृका, वासकसज्जा, विर-
होत्कंठिता यह भेद हैं।
जो अपने स्वामीके सदा प्रेममें आधीन रहै यह स्वाधीन-
भर्तृका, अन्य स्त्रीसे रति करके उसके चिह्नोंसे युक्त पति
जिसके पास आवै वह खण्डिता, जो वेष छिपाकर संकेतमें
नायकके पास जाय वह अभिसारिका, क्षेत्र बावडीके
निकट भग्नदेवालय दूतीके घर वन स्मशान नदी आदिका
तट यह अंधकारके समय इनके अभिसारके स्थान हैं।
जो क्रोधसे बुरे वचन कहकर प्राणनाथको बाहर करदे पीछे
पछतावै वह कलहान्तरिता है, जिसका प्रीतम संकेत करके
मिलनेको न आवै वह विप्रलब्धा । जिसका पति कार्यवश
परदेश गया हो उसकी कामार्त्त स्त्री प्रोषितभर्तृका कहातीहै,
जो स्वामीका संगम जान कर शृंगार कर सेज प्रस्तुत करती
है वह वासकसज्जा, आनेका निश्चय करके प्रारब्धमें जिस-