बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाहित्यपरिचय। ( ३३ )
जिमि जैसो मानोरु सों, भाषा श्रौती जान।
सम समान उपमा तुला, जोग आरथी आन ॥ ६ ॥
औरै जे समता कहैं, प्रगटति श्रौती हेत।
जे समझावैं अर्थसो, ते आरथी निकेत ॥ ७ ॥
लुप्ता।
दोहा–उपमा औ उपमेय पुनि, वाचकधर्म बखान।
एक दोय अरु तीन पुनि, लोपैलुप्ता जान ॥ १ ॥
प्रतिवस्तूपमा।
दोहा–समतासूचक पद जहाँ, रहै एक द्वै भांति ॥
सो है प्रतिवस्तूपमा, पदसमूहकी कांति ॥ १ ॥
जहँ लघुता उपमानकी, सो प्रतीप ह्वै भेव ॥
प्रथम निरादर कीजिये, पुनि कीजे उपमेव ॥ २ ॥
संशयमें जो सांचसी, तेहि विधिको उपमान ॥
अधिक होय उपमेयते, सो उत्प्रेक्षा जान ॥ ३ ॥
उपमा अरु उपमेयको, भेद परै नहिं जानि ॥
समता व्यंग्यरहै जहां, रूपक ताहि बखानि ॥ ४ ॥
जँहँ देखत उपमानको, सुधि आवै उपमेय ॥
ताही सों सुमिरण कहत, जे कवि जानत भेय ॥ ५ ॥
करि निषेध उपमेयको, जहँ थापै उपमान ॥
बहुविधि वाचक भेदते, ताहि उपह्नुति जान ॥ ६ ॥
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