बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २८ ) साहित्यपरिचय ।
का पति न आवै वह विरहोत्कंठिता कहातीहै इनमें
मध्यम अधम लगाकर ३८४ सेभी अधिक नायकाभेद होते
हैं सो विस्तारभयसे नहीं लिखे, इनके शरीरमें
कारण अट्ठाईस विकार होते हैं और भावसे लेकर धैर्यतक
दशपुरुषोंमें होते हैं तथाहि-
भाव-निर्विकारात्मक चित्तमें पहला विकार ( विभाव
अनेत्रादिके विकारसे सम्भोगकी इच्छा प्रगट करनी, थोडा
संलक्ष्यका विकार हाव है। खेलादिके अत्यन्त प्रगट विकारका
नाम हेलाहै । रूप यौवनके लालित्यका नाम शोभाहै।कामकी
अधिकाईके प्रकाशका नाम कान्ति कान्तिकी अधिकाईदीप्ति।
सब अवस्था में रमणीयताका नाम माधुर्य है। भय न माननेका
नाम प्रागल्भ्यहै । विनयका नाम औदार्य्यहै । अपनी श्लाघा
करके चंचलता त्यागकर स्थिर मनोवृत्ति रखना धैर्यहै।
अलंकार धारणपूर्वक प्रीतियुक्त प्रेमभरे वचन
प्रियकी अनुकृतिका नाम लीलाहै । इष्टके देखने