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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 36

साहित्यपरिचय । ( ३१ )
संख्याक्रम चूकै नहीं, यथा संख्य है सोय ॥ १ ॥
जहां अर्थ सामान्यको, पोपन करे विशेप ।
पुनि सामान्य विशेषको, जेहिठाँ पोप न लेप ॥ २ ॥
सो अर्थान्तर न्यास है, और अर्थ जहाँ होय ।
स्वधर्म विधर्म भेदकर, चारभांति है सोय ॥ ३ ॥
है न विरोध विरोधसो, बातन माहिँ लखाय ।
जाति क्रिया गुण नाम करि, सो विरोध दशभाय ॥४॥
जाति चारिसों तीनगुण, द्वैसे क्रिया विरुद्ध ।
नाम नामहीसों बहुरि, यौँ हैं दश विधि शुद्ध ॥ ५ ॥
रूप रहै जु सुभायकै, तिनको वर्णन होय ।
सुस्वभावोक्ति जानिये, कृतिम जहाँ नहिं सोय ॥ ६ ॥
बहानेसे दोष वर्णन करनेका नाम व्याजस्तुति है, और
अर्थके बिना अर्थ जहाँ भला बुरा न हो उसको विनोक्ति कह
ते हैं जहां अर्थ बदले जाते हैं वह विनिमय अलंकार है सम
और अर्थ भेदसे दो प्रकारका है ।
सहोक्ति लक्षण ।
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