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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 35

( ३४ ) साहित्यपरिचय।
जहँ संबंध बने न तब, उपमामें विश्राम ॥
हेतु क्रिया कारि दोप है, निदर्शना सुखधाम ॥ ७ ॥
अति अभेद जिय राखि जहँ, नहिं कहिये उपमेय ॥
उपमानि कहिये जहाँ, अतिशयोक्ति सो भेव ॥ ८ ॥
उपमानरु उपमेय पुनि, साधारण जेहि ठाउँ ॥
वाचक सब प्रतिबिम्बहै, सो दृष्टान्ता नाउँ ॥ ९ ॥
अगले २ योग जहँ, प्रथम अधिक गुण होय ॥
मालादीपक कहत हैं, ताहि सब कविलोग ॥ १० ॥
दीपकहींसों भेव यह, नियत एकहीं होय ॥
उपमानि उपमेयको, तुल्य योग्यता सोय ॥ ११ ॥
जहाँ अधिक उपमानते, कहियत है उपमेय ॥
सो व्यतिरेक बखानिये, ऊँच नीच गुण भेय ॥ १२ ॥
इनके चौबीस भेद होते हैं.
दोहा—कथ्यो न कछु कहि बरनि, अधिकाईके हेत।
कह्यो कि कहिब भेद द्वै, आक्षेप कहि देत ॥ १ ॥