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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 32

साहित्यपरिचय। (३१)
दोहा-प्रथम शब्द याते कहें, प्रथम शब्दके साज ॥
बहुरि अर्थके जानिये, अलंकार कविराज ॥ १ ॥
उक्तिभेदते होत हैं, अलंकार यह जानि ॥
वक्र उक्ति याते कही, द्वैविधि प्रथम बखानि॥ २ ॥
कहै बात औरै कछू, अर्थ करै कछु और ॥
वक्रउक्ति ताको कहें, श्लेष शुद्ध द्वै ठौर ॥ ३ ॥
वर्ण एकसे फिर जहाँ, अनुप्रास है सोय ॥
छेकविदग्धा वृत्ति करि, सो पुनिद्वै विधि होय ॥ ४ ॥
जहाँ बहुतसे वर्ण एकवार फिर आवैं वह विदग्धा अनु-
प्रासहै। अनेक व्यंजनका एकधा स्वरूपसे वा वारंवार अने-
क प्रकार क्रमसे एक व्यंजनका बारवार समभावसे जो वर्तना
है उसको वृत्यनुप्रास कहते हैं।
दोहा-फिरै अर्थ पदयुत जहाँ, अर्थभेद नहिं कोय ।
सो लाटानुप्रास पुनि, भावभेदते होय ॥ १ ॥
एक शब्द बहु शब्दको, एकरु भिन्न समास ।
परने वचन समासहू, पांच भांति सुप्रकाश ॥ २ ॥
यमकलक्षण ।
दोहा-अर्थ होय भिन्न जहाँ, शब्द एक अनुहार ।
यमक कहत तासों सबे, भेद अनन्त विचार ॥ १ ॥