बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
( २०२ ) सतसई-सटीक ।
इससे शीतलता और सुगंधकी महिमा नहीं घटसकती
जो पीनस ( नाकका रोग नाकसे कीडे गिरते हैं ) रोगवालोंने
शोरा जानकर कपूर त्यागन कर दिया, इस रोगीको गंधका
ज्ञान नहीं होता "अन्योक्ति" ॥ ६२० ॥
चितदे भजै चकोर ज्यों, तीजे भजै न भूख ।
चिनगी चुगै अँगारकी, पिये कि चंदमयूख ६२१
मन देकर चकोरको देखो कि, तीसरी भाँति उसकी भूख
नहीं जाती या आगकी चिनगारी चुगती है वा चंद्रकिरण
पीती है "अन्योक्ति" ॥ ६२१ ॥
चलेजाहु ह्यां को करै, हाथिनको व्यवहार ।
नहिं जानत यहि पुर बसैं, धोबी और कुम्हार ६२२
ह्यांसे चलेजाओ यहां कोई हाथियोंका व्यापार नहीं
करता नहीं जानते इस पुरमें धोबी और कुम्हार रहते हैं
आशय यह यहाँ निर्गुणियोंकी गाहकी है गुणियोंकी नहीं
राजधानी त्यागके समय कहा होगा "अन्योक्ति" ॥ ६२२ ॥
नरकी अरु नलनीरकी, एक गति कर जोय ।
जेतो नीचो होचलै, तेतो ऊँचो होय ॥ ६२३ ॥
मनुष्यकी और नलके पानीकी एकही गति देखी गई है
कि, जितना नीचा होकर चलैगा उतनाही ऊँचा होगा कहीं
सप्तमशतक ७. (२०३)
जेतो ऊंचोहो चले पाठ है वहां यह अर्थ है कि, कमल और
मन जल और धन बढनेसे जितना ऊँचा होगा सम्पत्ति
न रहनेसे उतनाही नीचा होगा नलनीर-कमल "रूपक" ६२३
समय समय सुन्दर सबै, रूप कुरूप न कोय ।
मनकी रुचि जेती जितै, तिनतेती रुचि होय ६२४॥
समय २ पर सब सुन्दर लगते हैं रूप कुरूप कोई नहीं
है मनकी जितनी रुचि जिधर होती है उधर वह उतनीही
सुन्दर विदित होती है "परिसंख्या" ॥ ६२४ ॥
गिरितै ऊँचे रसिकमन, बूडे जहां हजार ।
वहै सदा पशु नरनको, प्रेमपयोधि पगार ॥६२५॥
पहाड़से ऊँचे रसिकोंके हजारों मन जहां डूब गये वही
प्रेमका समुद्र पशु मनुष्योंको पगार है जिस जलमें पांवमात्र
डूबता है उसको पगार कहते हैं, आशय यह कि, मूढ़ प्रीति-
रस नहीं जानते "रूपकालंकार" ॥ ६२५ ॥
संगति दोष लगै सबनि, कहनै सांचे बैन ।
कुटिल बंक भ्रूभंगमै, कुटिल बंक गति नैन ६२६
संगतिका दोष सबको लगताहै यह सब सच बचन कहतेहैं,
देखो टेढ़ी भौंहकी संगतिसे कुटिल और टेढ़ी गतिवाले नेत्र
होतेहैं "उदात्तालंकार" ॥ ६२६ ॥
( २०४ ) सतसई-सटीक ।
मोरचन्द्रिका स्याम शिर, चढिकत करति गुमान।
लखवी पाँयनि पर लुटति, सुनियत राधा मान ॥
हे मोरचंद्रिका! श्रीकृष्णके शिरपर चढकर क्यों गुमान कर-
तीहै? सुनाहै कि, राधाके मान मनाते समय तू उनके चरणोंमें
पड़ीहै "पर्यायोक्ति" ॥ ६२७ ॥
गोधन तू हरष्यो हिये, घरि इक लेहु पुजाय ।
समुझ परैगी शीशपर, परत पशुनके पाय॥६२८॥
हे गोवर्द्धन पर्वत! मनमें प्रसन्न होकर तू घरीभरको अपनी
पूजा कराले, परन्तु जब अनेक पशुओंके चरण तुझपर पडेंगे
तब समझ पडैगी, जो महात्माओंके अभावमें अपनेको पुजाते
हैं उनपर “अन्योक्ति” ॥ ६२८ ॥
नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास यहिकाल
अली कलीहीसों बँध्यो, आगे कौन हवाल६२९॥
अभी न पराग है न मधुर मधु है न अभी विकास (खि-
ला) है कलीमेंही भौंरा बिंधरहा है जाने आगे क्या हाल होगा
मुग्धापर आसक्त पुरुषके प्रति “ भ्रमरोक्ति ” ॥ ६२९ ॥
जिन दिन देखे वे कुसुम, गई सो बीत बहार ।
अब अलि रही गुलाबमें, अपत कटीली डार६३०
ग [ga] त [ta] म [ma] े [e] ं [n], -> "जगतमें,"
Word 4:
ए [e] क [ka] -> "एक"
Word 5:
त [ta] ु [u] ह [ha] ी [ii] -> "तुही"
Word 6:
व [va] ि [i] ह [ha] ं [n] ग [ga] -> "विहंग"
॥ ६३३ ॥
Line 20:
Word 1:
प [pa] ं [n] ख [kha] -> "पंख"
Word 2:
ह [ha] ी [ii] -> "ही"
Word 3:
क [ka] प [pa] ड़ [da] े [e] -> "कपड़े"
Word 4:
ह [ha] ै [ai] ं [n], -> "हैं,"
Word 5:
म [ma] क [ka] ड़ [da] ा [aa] -> "मकड़ा" (or "कंकड़ा"?)
Wait, look at word 5 in line 20:
Letter 1: is it 'म' or 'अ' or 'क'?
Look at line 18: "भख काँकरे" (eats pebbles).
In line 20: "पंख ही कपड़े हैं, ... आदि कंकड़में अन्न भक्षण करता"
Wait
( २०६ ) सतसई-सटीक ।
सफरमें अपनी परेईको साथलिये एक परेवाही पक्षी इस ज-
गतमें सुखी है, विदेशीको दीन देख कविवचन "परिसं-
ख्या" ॥ ६३३ ॥
दिन दश आदर पायके, करले आप बखान ।
ज्योंलगि काकशराधपख,त्योंलगि तव सन्मान॥
जो थोडे दिनकी प्रभुतापर अभिमानमें फूल उठते हैं उन-
पर काकोक्ति-हे काक! दश दिनकी प्रभुताई पाकर अपने आ-
पका कितनाही बखान करले जबतक श्राद्धका पक्ष है तबत-
कही तेरा सन्मान है "अन्योक्ति" ॥ ६३४ ॥
स्वारथ सुकृत न श्रमवृथा, देखि विहंग विचारि ।
बाज पराये हाथ पर, तू पक्षीहि न मारि ॥ ६३५॥
अपना स्वार्थभी नहीं, कुछ इस कार्यमें पुण्यभी नहीं, के-
वल वृथा श्रम है,पक्षी विचार देख इस कारण हे बाज ! पराये
हाथपर बैठा हुआ (निष्प्रयोजन ) तू पक्षियोंको मत मार !
बाजके प्रति उक्ति दुष्ट मनुष्यके सेवक जो अनर्थ करते हैं
उनके प्रति ॥ ६३५ ॥
मरत प्यास पिंजरा परयो, सुआ समयके फेर ।
आदर देदे बोलियतु, वायस बलिकी बेर॥६३६॥
समयके फेरसे तोता पींजरेमें पड़ा प्यासा मरता है, और
सप्तमशतक ७. (२०७)
बलिक समय (श्राद्धपक्षमें) कौआ आदर देदेकर बुलाया
जाता है "शुकोक्ति" गुणीके सम्मुख निर्गुणीके आदरमें ६३६
को छूटो यहि जाल परि, मत कुरंग अकुलाय।
ज्यों ज्यों सुरझ भज्यो चहै, त्यों ज्यों उरझो जाय॥
हे कुरंग! इस जालमें पड़कर कोई नहीं छूटा तू मत अकु-
लावै ज्यों ज्यों सुरझ कर भाजा चाहता है त्यों त्यों उलझा-
जाता है अपनी तृष्णा पूर्णकर विरक्त होजायेंगे उनसे "कुरंगो-
क्ति" हे॥ ६३७॥
नहिं पावस ऋतुराज यह, तज तरुवर मति भूल।
अपतभये बिन पाय है, क्यों न बहल फल फूल॥
हे वृक्ष! यह वर्षाऋतु नहीं वसन्तऋतु है मतिकी भूल त्याग-
न करै अपत हुए बिना नवीन फल फूल नहीं मिलेंगे अर्थात
राजसेवकके दुःखपर "तरुवोक्ति"॥ ६३८॥
अजौं तरौनाहीं रह्यो, श्रुति सेवत इक अंग।
नाक बास बेसर लह्यो, बसि मुक्तनके संग॥६३९॥
भक्तवचन परमार्थ विषय, एक अंगसे श्रुतिका सेवन करने-
वाला आजतक नहीं तरा परन्तु मुक्तोंके साथ बसकर बेसरने
नाकका स्थान पाया एकअंगसे श्रुति (कान) का सेवन करके
(तरौना) कर्णफूल नहीं तरा पर (मुक्तन) मोतियोंके
( २०८ ) सतसई-सटीक ।
साथ निवास करके बेसरनेभी नाक ( स्वर्ग ) नासिकाका
बास पाया है । भक्तिपक्षमें श्रुति-वेद । बेसर-एकमात्र
निर्द्वन्द्व पुरुष । नाक स्वर्ग उसका नाम तरौना वा तारनेवाला
श्रुति ( वेद-कान ) की संगतिसे हुआ, इसका नाम मुक्तनर
मोती मुक्तपुरुषोंकी संगतिसे बेसर ( अनुपम ) हुआ "श्लेषा-
लेकार" ॥ ६३९ ॥
जनम जलधि पानिप अमल, तो जग आव अपार।
रहै गुणी ह्वै गर पर्यो, भलो न मुकताहार॥६४०॥
समुद्रसे जन्म निर्मलरूप संसारमें बड़ा मोल मर्यादावान्
गुणी ( डोरेयुक्त ) है हेमोती ! ऐसे बुद्धिमान् होकर भी
दूसरोंके गले पड़ेहो इसमें हीनता होगई है अर्थात् गुणियोंको
किसीके गले न पडना चाहिये " अन्योक्ति" ॥ ६४० ॥
गहै न एकौ गुणगरब, हँसै सकल संसार ।
कुच उँच पद लालच रहै, गरे परेहू हार ॥ ६४१ ॥
तू मनमें एकभी गुणका अभिमान नहीं रखता इस कारण
तुझको सब संसार हँसता है कुचरूपी उच्चपदके लालचसे
पराये गलेमें पड़ा रहता है, हारके अर्थ मोतीहार और
हीनता जैसे कोई गुणी उच्चपदके निमित्त राजाके गले पड़े
उसपर कथन है "अन्योक्ति" ॥ ६४१ ॥
सप्तमशतक ७. (२०९)
मूँड़ चढ़ायेहू रहै, परो पीठ कचभार।
गरेपरे पहँ राखिये, तऊ हीयपर हार ॥६४२॥
मूँड चढ़नेपरही बालोंका बोझ पीठपर डालाजाता है गले
पड़नेपर तौभी हार हृदयपरही रक्खाजाता है ॥ ६४२ ॥
पाय तरुणि कुच उच्चपद, चिरमि ठग्यो सब गाउँ।
छुटे ठौर रहि है वहै, जुहो मोल छबि नाउँ ६४३॥
चोंटलीने तरुणीके स्तनरूपी उच्चपदको प्राप्त करके सब
गाँव ठग लिया है अब ठौर छूटनेपरभी वही मोल वही छवि
और वही नाम रहेगा, चिरमी-चोंटली, नीचके उच्चपद प्राप्त
होनेपर यह कथन है ॥ ६४३ ॥
वे न यहां नागर बड़े, जिन आदर तो आव ।
फूल्यो अनफूल्यो भयो, गँवई गाँव गुलाब ६४४
जिनको तेरी सुधराईका आदर है वे बड़े चतुर पुरुष
यहाँ नहीं हैं, हे गुलाब ! गाँवमें तू फूलाहुआ भी अनफूले
हुएके समान है, (मूर्खोंमें गुणीका गुण प्रकाशित नहीं
होता) ॥ ६४४ ॥
कर ले सूँघि सराहिकै, रहै सबै गहि मौन ।
गंधी गंध गुलाबको, गँवई गाहक कौन ॥ ६४५ ॥
१४
( २१० ) सतसई-सटीक ।
हाथमें ले सूंघ कर सराहना कर सब गँवार मौन होरहे
हे गन्धी!गुलाबकी गन्धका गाँवमें कौन ग्राहक है जो मोल ले
ऐसाही गुणीका मूर्खोमें गुण प्रकाश करना है "अन्यो०"६४५
करि फुलेलको आचमन, मीठो कहति सराहि ।
चुपकरि रहु गंधी चतुर,अतरदिखावतकाहि६४६
ग्रामीण फुलेलका आचमन कर सराहना कर मीठा कहने
लगे, हेचतुर गंधी! चुपकर, अतर किसको दिखाता है मूर्खोंके
आगे चतुरकी विडम्बनामें उक्ति ॥ ६४६ ॥
कनक कनकते सौगुणी, मादकता अधिकाय।
उहि खावे बौराय जग, यह पाये बौराय॥६४७॥
( कनक ) धतूरेसे ( कनक ) सोनेमें सौगुणी मादकता
अधिक है वह खानेसे बौरा होता है परन्तु सुवर्णके पातेही
जग बौराजाता है “व्यतिरेकालंकार” ॥ ६४७ ॥
बड़े न हूजे गुणन बिन, बिरद बड़ाई पाय ।
कहत धतूरेसों कनक,गहने गढो न जाय॥६४८॥
गुणके विना यश बड़ाई पाकर बड़ाहोना उचित नहीं
धतूरेकोभी कनक ( सोना ) कहते हैं परन्तु वह गहनेमें नहीं
गढाजाता है “अन्तरन्यास” ॥ ६४८ ॥
सप्तमशतक ७. ( २११ )
हास्यरसवर्णन ।
रवि वन्दो कर जोरकै, सुनत श्यामके वैन ।
भये हँसोहे सबनिके, अति अनखोहे नैन॥६४९॥
जिससमय गोपियें चीरहरणके समय हाथसे अंग छिपाय
जलसे बाहरहुईं तब कृष्णने कहा हाथ जोड़ सूर्यको प्रणाम
करो यह सुनकर बालाओंके क्रोधभरे नेत्रोंमें हँसी आगई
"पर्यायालंकार" ॥ ६४९ ॥
कण देव्यो सौंप्यो ससुर, बहू थुरहथी जानि ।
रूप रहिचटै लगिलग्यो, मांगन सब जग आनि ॥
ससुरने बहूको छोटे हाथकी जानकर अन्न देना सौंपा उस-
के रूपके लालचसे सब जगतके लोग आकर मांगनेलगे
"विषादालंकार" अन्न थोडा उठेगा इसकारण काम
सौंपा सो उसके विरुद्ध अधिक उठनेलगा इससे विषाद
हुआ ॥ ६५० ॥
परतिय दोष पुराण सुनि, हँस मुलकी मुखदानि ।
कसकरि राखी मिश्रहू, मुँह आई मुसकानि॥६५१॥
पुराणमें परस्त्रियोंके गमनका दोष सुनकर सुखदायक थो-
ड़ा मुसकाकर हँसी तथा मिश्र ( पुराणवक्ता ) नेभी मुखआई
मुस्कान दबाकर रक्खी "अनुमान" ॥ ६५१ ॥
( २१२ ) सतसई-सटीक ।
चित पितुघातक योग लखि, भयो भये सुत सोग।
फिर हुलसो जिय जोतसी, समझो जारज योग ॥
पुत्र होनेपर पितुघातक योग देखकर ज्योतिषीको पुत्रके
होनेका शोक हुआ फिर जारजयोग जानकर प्रसन्नहुए आशय
यह कि, यह जारसे उत्पन्नहै ऐसा होनेसे जारका घातकहै इ-
सकारण प्रसन्न हुए “लेखांलंकार ॥ ६५२ ॥
बहुधन लै अहसानकें, पारो देति सराहि ।
वैदवधू हँसि भेदसों, रही नाह मुखचाहि ॥६५३॥
वैद्य बहुतसा धनले अहसानकर सराहना करके दूसरोंको
पारादेताहै, परन्तु इस बातसे हँसकर वैद्यकी स्त्री भेदसे स्वा-
मीका मुख देखकररही “अनुमानालंकार” हँसनेसे वैद्यमें न-
पुंसकताका अनुमान है ॥ ६५३ ॥
गोपनके अँसुअनभरी, सदा असोत अपार ।
डगर डगरने ह्वैरही, बगरबगरके बार ॥ ६५४ ॥
उद्धवजीका वचन श्रीकृष्णसे गोपियोंके आंसुओंसे भरी
विनाही सोतेवाली नसूखनेवाली अपारनदी ब्रजकी गली
गलीमें नहीं किन्तु घर घरके बाहर होरहीहै “अत्युक्ता-
लंकार” ॥ ६५४ ॥
श्याम सुरतिकर राधिका, तकत तरणिजा तीर ।
सप्तमशतक ७. (२३३)
अँसुवनि करति तरोसके, क्षणक खरोहे नीर ॥
हे कृष्ण ! तुम्हारी सुरतकर राधिका यमुनाके तटको ता-
कती है आँसुओंसे क्षणमात्रमें तरोसके जलको खारि करदे-
तीहै तरोस-तलछट, "उल्हासालंकार" खरोह-खारी अथवा
गुनगुना, करोह पाठमें आंसुओंसे मिलनेसे काला ॥ ६५५ ॥
लोपे कोपे इन्द्रलौं, रोपे प्रलय अकाल ।
गिरिधारी राखेसबै, गो गोपी गोपाल ॥६५६ ॥
हे उद्धवजी ! जिससमय कृष्णने इन्द्रका यज्ञ लोपा तब
उसने कोपकर अकालप्रलय ( रोपा ) करनी चाही उससमय
गिरि धारण करके सब गो गोपी गोपालकी रक्षा कीथी "प-
रिकरांकुरवृत्त्यनुप्रासालंकार," [ दो०-अभिप्रायके सहित
जहाँ,हो विशेष्य सुखदान । परिकरांकुर तेहि कहत, कविजन
परमसुजान ॥ ६५६ ॥
हौं हारी कैकै हहा, पाँइन पारो प्यौर ।
लेह कहा अजहूँ किये, तेहतररे त्यौर ॥ ६५७ ॥
हम सब हाहाखाय समझा २ वा कह कह कर हारगई तथा
प्रीतमको पाँवमें डाला इससे तू क्या लेगी जो अब भी
क्रोधमें बड़ी २ आँखें कर देखती है "विशेषोक्ति" ॥६५७॥
अनी बडी उमडत लखै, अभिवादक भटभूप ।
( २१४ ) सतसई-सटीक ।
मंगल कारि मान्यो हिये, भोमुख मंगलरूप॥६५८
शत्रुका कटक बड़ा चारों ओरसे उमड़ा देखकर खड्ग-
धारी वीर राजा ( जयसाह ) ने उसे मनमें मंगल करके माना
और मुख मंगलरूप ( लालवर्ण ) हुआ । मंगलका लालव-
र्ण है “विभावना” ॥ ६५८ ॥
नाह गरज नाहर गरज, वचन सुनायो टेरि ।
फँसीफौज बिच बन्दिमें, हँसी सबानिमुखहेरि६५९
रुक्मिणीहरणका समय, मत्तसिंहकी गरजसे गरजे और
सबको पुकारकर यह वचन सुनाया, विरोधियोंकी सेनाकी
बांदिमें फँसी, और सब राक्षसोंका मुख देख हँसी ॥ ६५९ ॥
डिगतपानि डिगलातगिरि, लखि सब ब्रज बेहाल।
कम्प किशोरीदरशते, खरे लजाने लाल ॥६६०॥
हाथके हलनेसे गोवर्द्धनपर्वतभी हिलता है यह देखकर
सब ब्रज बेहाल होगया, राधिकाको देखकर (सात्त्विकहोनेसे)
कम्प हुआ इसकारण स्वयं लाल ( कृष्ण ) लजाये आशय
यह कि, ब्रजवासी न जानें कि, राधिकाकी प्रीति है
“हेतुअलंकार” ॥ ६६० ॥
प्रलयकरन बरसनलगे, जुरि जलधर इकसाथ ।
सुरपति गर्व हरो हरषि, गिरिधर गिरिधर हाथ ॥
सप्तमशतक ७. ( २१५ )
जिससमय सब मेघ एकसाथ जुरकर वर्षा करने लगे
उस गिरधारीने प्रसन्नहो हाथपर पर्वत धारणकर इन्द्रका
गर्व हरण किया "काव्यलिंग" ॥ ६६१ ॥
यों दल काढे बलखते, तैं जयसाह भुआल ।
उदर अघासुरके परे, ज्यों हरि गाय गुवाल६६२
जिस समय जयशाहकी सेना बलखपर चढकर ऐसी घिरी
कि, कहीं मार्ग दिखाई नहीं देताथा तब कौशलसे जयशाहने
निकाली उसपर कहते हैं हे जयशाह ! तैने बलखबुखारके
घेरेमेंसे इसप्रकार अपनी सेना निकाली कि, जैसे अघासुरके
उदरसे कृष्णने गाय ग्वाल निकालेथे"दृष्टान्तालंकार" ६६२
मोहनि मूरति श्यामकी, अति अद्भुत गति जोय।
बसत सुचित अंतर तऊ, प्रतिबिंबित जग होय ॥
श्यामकी मनमोहनी मूर्त्तिकी अद्भुत गति तो देखो कि,
चित्तके अन्तरमें निवास करती है और छाया संसारमें दृष्टि
आती है मलीन जगतमें भी ब्रह्मनिष्ठको श्यामका प्रतिबिंब
दीखता है यह अद्भुतगति है अद्भुत सुविचार " विशेष
अलंकार ॥ ६६३ ॥
या अनुरागी चित्तकी, गति समझे नहिं कोय ।
ज्यों ज्यों बूड़े स्यामरँग, त्यों त्यों उज्ज्वल होय॥
( २१६ ) सतसई-सटीक ।
इस प्रेमवाले चित्तकी गति कोई नहीं समझता है कि,
ज्यों ज्यों श्यामरंगमें डूबता है त्यों त्यों निर्मल होता है अ-
र्थात् श्रृंगारमय होता है "विषमालंकार संभावना" ॥६६४॥
सोरठा ।
मैं समझो निरधार, यह जग काचो काँचसों ।
एकैरूप अपार, प्रतिबिंबित लखियत जहां ६६५
मैंने विचारकर देखलिया, यह जगत् कच्चा कांचसा है
जिसमें परमात्माके एकरूपके अनन्त प्रतिबिम्ब देखे जाते
हैं "पूर्णोपमा" ॥ ६६५ ॥
दो०-कोऊ कोटिक संग्रहौ, कोऊ लाख हजार ।
मो संपति यदुपति सदा,विपति विदारनहार६६६
कोई करोड कोई लाख हजार द्रव्यका संग्रह करो परन्तु
मेरी सम्पत्तितो विपत्ति विदारणहार सदा यदुपतिही हैं
"व्यतिरेक" ॥ ६६६ ॥
यमकरि मुँहतरहरपरचो, यह धरहर चितलाय ।
विषयतृषापरिहरिअजौं, नरहरिकेगुणगाय ६६७
यमरूपी हाथी नीचा मुख किये तले पड़ा है; यह मनमें
धारण कर हरिमें चित्त लगा विषयरूपी तृष्णाको अब भी
छोड़कर नृसिंहजीके गुण गानकर "परिसंख्या" ॥६६७॥
सप्तमशतक ७. (२१७)
जप माला छापा तिलक, सरै न एको काम ॥
मनकाचे नाचे वृथा, साँचे रांचे राम ॥ ६६८ ॥
जप माला छापा तिलक इनसे एक भी काम नहीं निक-
लता है जो मन कच्चाहै तो नाचना वृथा है राम तो साँचेसे मि-
लते हैं अथवा जप माला छापा तिलक करनेसे पुराने क्या
नये का भी काम निकलजाता है, मन कच्चे और वृथाही नाचे
परन्तु राम साँचे ही मिले जप माला छापांस एक अपराधी
की रक्षा हुई थी राजाकी आज्ञा थी मच्छी मत मारना एक
धीमर इस आज्ञाको उल्लंघन कर मच्छी मारने लगा उधरसे
राजाकी सवारी आई तब यह झट टीका लगाय जालके दा-
नोंकी माला फेरने लगा राजा प्रणामकर चला गया “परि-
संख्या” ॥ ६६८ ॥
जगत जनायो जिन सकल, सो हरि जान्योनाहि ॥
ज्यों आंखनजगदेखियै, आंखनदेखिजाहि ६६९
जिन हरिने सब जगत् उपजाया है वे जाननेमें नहीं आते
जैसे आंखसे सब जगत् देखता है परन्तु आंख नहीं देखी-
जाती “दृष्टांत” जनाया-उपजाया चेतन किया॥६६९॥
भजन कह्यो ताते भज्यो, भज्यो न एको बार ।
दर भजन जाते कह्यो, सो तैं भज्यो गंवार॥६७०॥
( २१८ ) सतसई-सटीक ।
हे मन ! भजनकरनेको कहा और तू उससे भाजा एक वा-
रभी उसका भजन न किया, हे गँवार ! जिससे दूर भागना
( विषयसे ) कहा है सो तैने भजन किया "यमक" आशय
यह कि, ईश्वरको न भजा विषयको भजा ॥ ६७० ॥
पतवारी माला पकरि, और न कछू उपाव ।
तरि संसारपयोधिको, हरिनामें करि नाव ॥ ६७१ ॥
पतवाररूपी मालापकड़ और कुछ उपाय नहीं है इसप्रकार
परमात्माके नामकी नावको आश्रयकर संसारसागरके पार
होजा "रूपक" ॥ ६७१ ॥
यह बिरियां नहिं औरकी, तू किरिया वह शोधि ।
पाहननावचढाय जेहि, कीन्होपारपयोधि ॥ ६७२ ॥
यह समय औरका नहीं है हे मन ! तू उस पार उतारनेवाले
की खोजकर जिसने पत्थरपर अपने नामसे रीछ वानरोंको
चढाकर सागर पार करदिया "काव्यलिंग" ॥ ६७२ ॥
दूर भजत प्रभु पीठ दै, गुणविस्तारन काल ।
प्रगटत निर्गुण निकटरहि, चंगरंग भूपाल ॥ ६७३ ॥
गुण विस्तारके समय पीठ देकर दूर भागजाते हैं निर्गुण
के पासही प्रगट होते हैं, प्रभु राजा चंगके समान हैं अथवा चंग
और कलिके राजा की समानता वर्णन की है स्वामीके पाससे
दूर भाजते हैं. अर्थात् डोरा और राजस बढानेके समय दूर
भागते हैं. जिस समय ( डोरा ) गुणा बढायाजाता है चंग दूर
चला जाता है, और स्वामीके निकट निर्गुणता प्रगट करते हैं,
आशय यह कि, डोरा पाकर जैसे चंग दूर जाता है, इसीप्रका-
र रजोगुणकी शक्ति पानेसे राजा प्रभुको भूल जाते हैं, और
जब वह अपना रजोगुणी ऐश्वर्य खेंचलेता है तब दीन दुःखी
हो आठ पहर प्रभुको मनाते हैं, अथवा प्रभुके गुण विस्तार
समय विषय पीठ देकर भागते हैं, तब गुणीकी खोज होती
है, कोई क्षीरसागर और कोई वैकुंठमें खोज करते हैं, जब
निर्गुणब्रह्म कहाजाता है तब व्यापक होनेसे निकटही भास-
ता है आशय यह कि, रज तमकी वृद्धिमें चंगकी भांति प्रभु
से दूर होना है। "श्लेषालंकार" ॥ ६७३ ॥
नटुवालौं प्रभुकर गहै, निगुणी गुण लपटाय ।
वहै गुणी करते छुटै, निगुणीपै ह्वै जाय ॥ ६७४ ॥
लट्टूकी भाँति जब प्रभु हाथमें पकड़ते हैं तब निर्गुणको
गुण लिपटता है वही गुणी हाथसे छूटनेपर निर्गुणी होजाता है
आशय यह कि, जयशाह जिस निर्गुणीको अपने पास रखते
हैं वह गुणी होजाता है और छूटनेपर निर्गुणी होता है जैसे
लट्टू "श्लेषालंकार पूर्णोपमा" ॥ ६७४ ॥
जात जात वित होत है, ज्यों जियमें संतोष ।
(२२०) सतसई-सटीक ।
होत होत जो होय तो, होय घरैंमें मोष ॥६७५॥
धन जातेर मनमें संतोष होता है होतेरभी धन जो संतोष
हो ता घडीमें वा घरही मुक्त होय “विभावना” ॥ ६७५ ॥
ब्रजवासिनको उचित धन, सो धन रुचित न कोय।
सुचित न आयो सुचितई, कहो कहांते होय ६७६
ब्रजवासियोंका उचित धन श्रीकृष्णके प्रेमरूपी धन
किसीके चित्तमें न आया तो पवित्रता और स्थिरता कहांसे
होगी “पर्यायोक्ति व्यावृत्तिदीपकालंकार” ॥ ६७६ ॥
मनमोहनसे मोहकरि, तू घनश्याम सँभारि ।
कुंजविहारीसों विहारि, गिरिधारी उर धारि ६७७॥
हे मानवती ! तू मानसे निर्मोही होरही है मनमोहनसे
मोह (प्रेम) कर इन घनश्याम (काले मेघ) को देखकर
उनको संभार वे इस समय कुंजमें स्थित हैं तू भी कुंजमें चल-
कर उनके साथ विहार कर वे गिरिधारी सबके रक्षक हैं इस
समय तू उनको हृदयसे लगाय धारण कर “पुनरुक्तवदाभा-
सालंकार” [ दो०-अर्थ लखै पुनरुक्तसों, अरु पुनरुक्त न
होय। सो पुनरुक्त्याभासवत, भूषण कह सब कोय ]॥६७७॥
तौलगि या मनसदनमें, हरि आवैं केहि बाट ।
निपटविकट जबलों जुटे, खुलै न कपटकपाट ६७८
सप्तमशतक ७. ( २२१ )
तबतक इस मनरूपी घरमें भगवान् किस बाटसे आवैं
जबतक अतिविकट भिड़े हुए कपाटरूपी किवाड़ नहीं खु-
लते "रूपक" ॥ ६७८ ॥
बुधि अनुमान प्रमाण श्रुति,किये नीठ ठहराय ।
सूक्ष्मगतिपरब्रह्मकी,अलखलखी नहिंजाय६७९
बुद्धि अनुमान और वेदप्रमाणसे मनमें निश्चय ठहरता
है परन्तु परब्रह्मकी सूक्ष्म गति होनेसे तथा अलख होनेसे
लखी नहीं जाती इसीप्रकार कटिभी सूक्ष्म है होतो पर दि-
खाई नहीं देती "अनुमानालंकार" ॥ ६७९ ॥
या भव पारावारको, उलँघि पार को जाय ।
तियछवि छाया ग्राहिणी, गहै बीचही आय६८०
इस जगतरूपी संसारको उल्लंघनकर पार कौन जा सकता
है इसमें तियकी छवि छायाग्राहिणी है, सो बीचही आकर
पकड़लेती है आशय यह कि, स्त्रीसे कोई ही मुक्त होता
है छायाग्राहिणीने महावीरजीको धग था "पूर्णोपमा वा
दृष्टान्त" ॥ ६८० ॥
तज तीरथ हरि राधिका, तनद्युति कर अनुराग ।
जेहिब्रजकेलिनि कुंजमग,पगपगहोतप्रयाग६८१
हे मन ! अनेक तीर्थोंका भ्रमण छोड़कर राधाकृष्णके
शरीरकी कान्तिमें प्रेम कर, जिस ब्रजकी विहारकुंजके