बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमशतक ७. (२०७)
बलिक समय (श्राद्धपक्षमें) कौआ आदर देदेकर बुलाया
जाता है "शुकोक्ति" गुणीके सम्मुख निर्गुणीके आदरमें ६३६
को छूटो यहि जाल परि, मत कुरंग अकुलाय।
ज्यों ज्यों सुरझ भज्यो चहै, त्यों ज्यों उरझो जाय॥
हे कुरंग! इस जालमें पड़कर कोई नहीं छूटा तू मत अकु-
लावै ज्यों ज्यों सुरझ कर भाजा चाहता है त्यों त्यों उलझा-
जाता है अपनी तृष्णा पूर्णकर विरक्त होजायेंगे उनसे "कुरंगो-
क्ति" हे॥ ६३७॥
नहिं पावस ऋतुराज यह, तज तरुवर मति भूल।
अपतभये बिन पाय है, क्यों न बहल फल फूल॥
हे वृक्ष! यह वर्षाऋतु नहीं वसन्तऋतु है मतिकी भूल त्याग-
न करै अपत हुए बिना नवीन फल फूल नहीं मिलेंगे अर्थात
राजसेवकके दुःखपर "तरुवोक्ति"॥ ६३८॥
अजौं तरौनाहीं रह्यो, श्रुति सेवत इक अंग।
नाक बास बेसर लह्यो, बसि मुक्तनके संग॥६३९॥
भक्तवचन परमार्थ विषय, एक अंगसे श्रुतिका सेवन करने-
वाला आजतक नहीं तरा परन्तु मुक्तोंके साथ बसकर बेसरने
नाकका स्थान पाया एकअंगसे श्रुति (कान) का सेवन करके
(तरौना) कर्णफूल नहीं तरा पर (मुक्तन) मोतियोंके