बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २०४ ) सतसई-सटीक ।
मोरचन्द्रिका स्याम शिर, चढिकत करति गुमान।
लखवी पाँयनि पर लुटति, सुनियत राधा मान ॥
हे मोरचंद्रिका! श्रीकृष्णके शिरपर चढकर क्यों गुमान कर-
तीहै? सुनाहै कि, राधाके मान मनाते समय तू उनके चरणोंमें
पड़ीहै "पर्यायोक्ति" ॥ ६२७ ॥
गोधन तू हरष्यो हिये, घरि इक लेहु पुजाय ।
समुझ परैगी शीशपर, परत पशुनके पाय॥६२८॥
हे गोवर्द्धन पर्वत! मनमें प्रसन्न होकर तू घरीभरको अपनी
पूजा कराले, परन्तु जब अनेक पशुओंके चरण तुझपर पडेंगे
तब समझ पडैगी, जो महात्माओंके अभावमें अपनेको पुजाते
हैं उनपर “अन्योक्ति” ॥ ६२८ ॥
नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास यहिकाल
अली कलीहीसों बँध्यो, आगे कौन हवाल६२९॥
अभी न पराग है न मधुर मधु है न अभी विकास (खि-
ला) है कलीमेंही भौंरा बिंधरहा है जाने आगे क्या हाल होगा
मुग्धापर आसक्त पुरुषके प्रति “ भ्रमरोक्ति ” ॥ ६२९ ॥
जिन दिन देखे वे कुसुम, गई सो बीत बहार ।
अब अलि रही गुलाबमें, अपत कटीली डार६३०