बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २०८ ) सतसई-सटीक ।
साथ निवास करके बेसरनेभी नाक ( स्वर्ग ) नासिकाका
बास पाया है । भक्तिपक्षमें श्रुति-वेद । बेसर-एकमात्र
निर्द्वन्द्व पुरुष । नाक स्वर्ग उसका नाम तरौना वा तारनेवाला
श्रुति ( वेद-कान ) की संगतिसे हुआ, इसका नाम मुक्तनर
मोती मुक्तपुरुषोंकी संगतिसे बेसर ( अनुपम ) हुआ "श्लेषा-
लेकार" ॥ ६३९ ॥
जनम जलधि पानिप अमल, तो जग आव अपार।
रहै गुणी ह्वै गर पर्यो, भलो न मुकताहार॥६४०॥
समुद्रसे जन्म निर्मलरूप संसारमें बड़ा मोल मर्यादावान्
गुणी ( डोरेयुक्त ) है हेमोती ! ऐसे बुद्धिमान् होकर भी
दूसरोंके गले पड़ेहो इसमें हीनता होगई है अर्थात् गुणियोंको
किसीके गले न पडना चाहिये " अन्योक्ति" ॥ ६४० ॥
गहै न एकौ गुणगरब, हँसै सकल संसार ।
कुच उँच पद लालच रहै, गरे परेहू हार ॥ ६४१ ॥
तू मनमें एकभी गुणका अभिमान नहीं रखता इस कारण
तुझको सब संसार हँसता है कुचरूपी उच्चपदके लालचसे
पराये गलेमें पड़ा रहता है, हारके अर्थ मोतीहार और
हीनता जैसे कोई गुणी उच्चपदके निमित्त राजाके गले पड़े
उसपर कथन है "अन्योक्ति" ॥ ६४१ ॥