बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २०२ ) सतसई-सटीक ।
इससे शीतलता और सुगंधकी महिमा नहीं घटसकती
जो पीनस ( नाकका रोग नाकसे कीडे गिरते हैं ) रोगवालोंने
शोरा जानकर कपूर त्यागन कर दिया, इस रोगीको गंधका
ज्ञान नहीं होता "अन्योक्ति" ॥ ६२० ॥
चितदे भजै चकोर ज्यों, तीजे भजै न भूख ।
चिनगी चुगै अँगारकी, पिये कि चंदमयूख ६२१
मन देकर चकोरको देखो कि, तीसरी भाँति उसकी भूख
नहीं जाती या आगकी चिनगारी चुगती है वा चंद्रकिरण
पीती है "अन्योक्ति" ॥ ६२१ ॥
चलेजाहु ह्यां को करै, हाथिनको व्यवहार ।
नहिं जानत यहि पुर बसैं, धोबी और कुम्हार ६२२
ह्यांसे चलेजाओ यहां कोई हाथियोंका व्यापार नहीं
करता नहीं जानते इस पुरमें धोबी और कुम्हार रहते हैं
आशय यह यहाँ निर्गुणियोंकी गाहकी है गुणियोंकी नहीं
राजधानी त्यागके समय कहा होगा "अन्योक्ति" ॥ ६२२ ॥
नरकी अरु नलनीरकी, एक गति कर जोय ।
जेतो नीचो होचलै, तेतो ऊँचो होय ॥ ६२३ ॥
मनुष्यकी और नलके पानीकी एकही गति देखी गई है
कि, जितना नीचा होकर चलैगा उतनाही ऊँचा होगा कहीं