बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमशतक ७. (२०३)
जेतो ऊंचोहो चले पाठ है वहां यह अर्थ है कि, कमल और
मन जल और धन बढनेसे जितना ऊँचा होगा सम्पत्ति
न रहनेसे उतनाही नीचा होगा नलनीर-कमल "रूपक" ६२३
समय समय सुन्दर सबै, रूप कुरूप न कोय ।
मनकी रुचि जेती जितै, तिनतेती रुचि होय ६२४॥
समय २ पर सब सुन्दर लगते हैं रूप कुरूप कोई नहीं
है मनकी जितनी रुचि जिधर होती है उधर वह उतनीही
सुन्दर विदित होती है "परिसंख्या" ॥ ६२४ ॥
गिरितै ऊँचे रसिकमन, बूडे जहां हजार ।
वहै सदा पशु नरनको, प्रेमपयोधि पगार ॥६२५॥
पहाड़से ऊँचे रसिकोंके हजारों मन जहां डूब गये वही
प्रेमका समुद्र पशु मनुष्योंको पगार है जिस जलमें पांवमात्र
डूबता है उसको पगार कहते हैं, आशय यह कि, मूढ़ प्रीति-
रस नहीं जानते "रूपकालंकार" ॥ ६२५ ॥
संगति दोष लगै सबनि, कहनै सांचे बैन ।
कुटिल बंक भ्रूभंगमै, कुटिल बंक गति नैन ६२६
संगतिका दोष सबको लगताहै यह सब सच बचन कहतेहैं,
देखो टेढ़ी भौंहकी संगतिसे कुटिल और टेढ़ी गतिवाले नेत्र
होतेहैं "उदात्तालंकार" ॥ ६२६ ॥