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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 262

सप्तमशतक ७. (२०९)
मूँड़ चढ़ायेहू रहै, परो पीठ कचभार।
गरेपरे पहँ राखिये, तऊ हीयपर हार ॥६४२॥
मूँड चढ़नेपरही बालोंका बोझ पीठपर डालाजाता है गले
पड़नेपर तौभी हार हृदयपरही रक्खाजाता है ॥ ६४२ ॥
पाय तरुणि कुच उच्चपद, चिरमि ठग्यो सब गाउँ।
छुटे ठौर रहि है वहै, जुहो मोल छबि नाउँ ६४३॥
चोंटलीने तरुणीके स्तनरूपी उच्चपदको प्राप्त करके सब
गाँव ठग लिया है अब ठौर छूटनेपरभी वही मोल वही छवि
और वही नाम रहेगा, चिरमी-चोंटली, नीचके उच्चपद प्राप्त
होनेपर यह कथन है ॥ ६४३ ॥
वे न यहां नागर बड़े, जिन आदर तो आव ।
फूल्यो अनफूल्यो भयो, गँवई गाँव गुलाब ६४४
जिनको तेरी सुधराईका आदर है वे बड़े चतुर पुरुष
यहाँ नहीं हैं, हे गुलाब ! गाँवमें तू फूलाहुआ भी अनफूले
हुएके समान है, (मूर्खोंमें गुणीका गुण प्रकाशित नहीं
होता) ॥ ६४४ ॥
कर ले सूँघि सराहिकै, रहै सबै गहि मौन ।
गंधी गंध गुलाबको, गँवई गाहक कौन ॥ ६४५ ॥
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