बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २०६ ) सतसई-सटीक ।
सफरमें अपनी परेईको साथलिये एक परेवाही पक्षी इस ज-
गतमें सुखी है, विदेशीको दीन देख कविवचन "परिसं-
ख्या" ॥ ६३३ ॥
दिन दश आदर पायके, करले आप बखान ।
ज्योंलगि काकशराधपख,त्योंलगि तव सन्मान॥
जो थोडे दिनकी प्रभुतापर अभिमानमें फूल उठते हैं उन-
पर काकोक्ति-हे काक! दश दिनकी प्रभुताई पाकर अपने आ-
पका कितनाही बखान करले जबतक श्राद्धका पक्ष है तबत-
कही तेरा सन्मान है "अन्योक्ति" ॥ ६३४ ॥
स्वारथ सुकृत न श्रमवृथा, देखि विहंग विचारि ।
बाज पराये हाथ पर, तू पक्षीहि न मारि ॥ ६३५॥
अपना स्वार्थभी नहीं, कुछ इस कार्यमें पुण्यभी नहीं, के-
वल वृथा श्रम है,पक्षी विचार देख इस कारण हे बाज ! पराये
हाथपर बैठा हुआ (निष्प्रयोजन ) तू पक्षियोंको मत मार !
बाजके प्रति उक्ति दुष्ट मनुष्यके सेवक जो अनर्थ करते हैं
उनके प्रति ॥ ६३५ ॥
मरत प्यास पिंजरा परयो, सुआ समयके फेर ।
आदर देदे बोलियतु, वायस बलिकी बेर॥६३६॥
समयके फेरसे तोता पींजरेमें पड़ा प्यासा मरता है, और