बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
षट्शतक ६. ( १९३ )
पड़ता “अर्थान्तरन्यासालंकार” [ दोहा:-कही जाय कहुँ
बात जो, अर्थान्तर चलिजाय । सो अर्थान्तर न्यास है, बुध
जन परत लखाय ॥ ५९१ ॥
दुर्जनवर्णन ।
नये विससिये अतिनये, दुर्जन दुसह स्वभाव ।
आंडे परि प्राणनहरै, कांटेलों लगि पांव ॥ ५९२ ॥
हे मित्र ! दुर्जन दुःसह स्वभाववालोंका विश्वास न करो
चाहे अतिनम्र होते हों अथवा नये विश्वासीकी ओर मत
देख यह कांटेके समान पाँवमें लगकर दांव पड़नेसे प्राण-
तक हरण करलेते हैं “पूर्णोपमा” ॥ ५९२ ॥
जेती सम्पति कृपणकी, तेती सू अत जोरि ।
बढ़त जाँय ज्योंज्यों उरज, त्योंत्यों होत कठोर ॥
जितनी सम्पत्ति कृपणके यहां है उतनी सू अत जोरि
देखो ज्यों २ कुच बढ़ते जाते हैं त्यों २ कठोर होतेजाते हैं ।
“दृष्टान्तालंकार” ॥ ५९३ ॥
नीच हिये हुलसे रहें, गहे गेंदके पोत ।
ज्यों ज्यों माथे मारिये, त्यों त्यों ऊँचो होत ॥
गेंदका गुण ग्रहण किये नीच लोग मनमें प्रसन्न रहते हैं
२५
( १९४ ) सतसई-सटीक ।
ज्यों ज्यों उनके माथेमें मारै त्यों २ ऊँचे होते हैं "दृष्टान्ता-
लंकार" कृपणके समान धन संग्रह करनेवालेकी नि-
न्दाहै ॥ ५९४ ॥
कोटि यतन कोऊ करै, परै न प्रकृतिहि बीच ।
नलबल जल ऊंचे चढै, अन्त नीचको नीच ५९५
चाहै कोई कोटि यत्न करै परन्तु स्वभावमें अन्तर नहीं
पडता देखो नलके बलसे जल ऊँचे चढ़ताहै परन्तु अन्तमें
नीचेहीको आताहै नीच प्रकृति है ( नल-फुहारेका )
"दृष्टान्तालंकार" ॥ ५९५ ॥
गढरचना वरुनीं अलक, चितवन भाहकमान ।
आव बँकाईही बढै, तरुणि तुरंगम तान ॥५९६॥
गढ़की रचना, बरौनी-पलकके बाल अलक ( जुल्फ )
चितवन भौंह कमान तरुणी ( स्त्री ) घोडा और हाथी इनकी
आव ( प्रतिष्ठा ) बांकेपनसेही बढ़ती है, अथवा तुरंगम घोडा
और तान "दीपिकालंकार" ॥ ५९६ ॥
तन्त्री नाद कवित्त रस, सरस राग रतिरंग ।
अनबूडे बूडे तरे, जे बूडे सब अंग ॥ ५९७ ॥
वीणाका शब्द, कविताईका रस, रसभरे राग रतिरंग, जो
षटशतक ६. ( १९५ )
इनमें नहीं डूबेहैं सो तो डूबे और जो इनमें सर्वांगसे डूबे हैं
वेतेरेहैं " विरोधाभास " ॥ ५९७ ॥
सम्पति केश सुदेश नर, नवत दुहुँनि यकवानि।
विभवसतरकुचनीचनर, नरमविभवकीहानि ॥
सम्पत्तिमें केश और भले मनुष्य नवतेहैं दोनोंकी एकही
बानहै, जैसे ऐश्वर्यमें कुच और नीच नर कठोर होतेहैं ऐश्व-
र्यकी हानिमें नरम होतेहैं "दीपकमालालंकार" जहाँ उप-
मान उपमेयसे एक पद लगताहै वह दीपक माला ॥ ५९८॥
कैसे छोटे नरनसों, सरत बड़नके काम ।
मढो दमामो जातहै, कहिं चूहेके चाम ॥५९९॥
छोटे मनुष्योंसे बड़ोंके काम किसप्रकार सर सकते हैं
कहीं चूहेके चामसे (दमामा) ऊँट पर रखनेका नगाड़ा
मढ़ा जासकताहै कभी नहीं " दृष्टांत " ॥ ५९९ ॥
ओछे बड़े हुए सकें
( १९६ ) सतसई-सटीक ।
प्यासे दुपहर जेठके, थके सबै जल शोधि।
मरु धर पायमतीरही, मारू कहति पयोधि॥६०१
दुपहरके प्यासे जेठ महीनेमें पथिक सब ओर जल ढूंढ
कर थकगये, और मारवारकी भूमिमें बड़े तरबूजको पाकर
उसको दूधका सागर कहतेहैं, यह मारवाडमें जाकर कहाथा
“ प्रहर्षणांलंकार ” ॥ ६०१ ॥
विषम वृषादिककी तृषा, जिये मतीरनि शोधि ।
अमित अपार अगाध जल, मारो मूंड पयोधि॥
कठिन वृषके सूर्य ( ज्येष्ठ महीने ) की प्यासमें जो कि,
दुःसह होती है, उसमें जो मनुष्य तरबूजको ढूंढ जल पान
करतेहैं वे कहते हैं कि, इसके सामने महा अपार गहरे जल-
वाले समुद्रको शिरसे मारो अर्थात् सागरसे हमें कुछ काम
नहीं “अन्योक्तिअलंकार” ॥ ६०२ ॥
अतिअगाध अति ऊथरो, नदी कूप सर बाय।
सो ताको सागर जहाँ, जाकी प्यास बुझाय॥६०३
नदी कूप सरोवर बावडीका अति गहरा या उथला पानी
हो परन्तु उसका वही सागरहै जहां जिसकी प्यास बुझजाय,
किसी पुरुषकी लग्न किसी कामिनीसे लगी. और उसकीही
गुणकथा गाई इसपर सखीने कहा “अन्योक्तिअलंकार” ६०३
सतमशतक ७. (३९७)
मीत न नीति गलीतहै, जो धरिये धन जोरि।
खाये खरचे जो बचै, तो जोरिये करोरि॥ ६०४॥
हेमित्र! यह नीति नहीं जो अपनी दुर्दशा बनाकर धन
जोड़ रक्खे जो खाये खरचेसे बचै तो करोंड़ों जोड़ो "सम्भा-
वना"॥ ६०४॥
दुसह दुराज प्रजानमें, क्यों न करै अतिद्वंद्व।
अधिक अँधेरो मिलि करत, मिलि मावस रविचंद
कठिन बुरे राज्यमें प्रजाके दुःख और क्लेश क्यों न बढ़ें
अमावसके दिन सूर्य चन्द्रमा एक राशिपर होकर अधिक
अंधकार करतेहैं "दृष्टान्त" जयसिंहके उपगम समय
कहाहै॥ ६०५॥
घर घर डोलत दीन ह्वै, जन जन याचत जाय।
दिये लोभ चश्मा चखनि, लघु पुनि बड़ो लखाय॥
घर घर दीन होकर डोलताहै प्रत्येक जनको याचना
जाता है जिसकी आँखोंमें लोभका चश्मा लगा है उसको
छोटा भी बड़ा दीखताहै "रूपक"॥ ६०६॥
बसै बुराई जासु तनु, ताहीको सन्मान॥
भलो भलो कहि छाँड़िये, खोटे ग्रह जप दान॥
( १९८ ) सतसई-सटीक ।
जिसके शरीरमें बुराई होतीहै, उसीका सन्मान होताहै
भलेको तो अच्छा कह छोड़देते हैं, परन्तु खोटे ग्रहका जप
दान करते हैं “लौकिकदृष्टान्त” ॥ ६०७ ॥
कहैं यहै श्रुति स्मृतिनसों, सबै सयाने लोग ।
तीन दबावत निकसही, राजा पातिक रोग ६०८॥
वेदशास्त्र और सब सयाने लोग यह बात कहतेहैं कि, राजा
पाप और रोग यह तीनों निर्बलको तुरत दबातेहैं अथवा
राजा निर्बलको अवल देहको रोग दबातेहैं निकस-निर्बल
“दीपकालं” ॥ ६०८ ॥
इक भीजे चहले परे, बूडे बहे हजार ।
कितने अवगुण जग करत, नैवे चढती बार ६०९
कोई भीगे कोई चहले (दलदल) में पड़े कोई डूबे और
सहस्रों बहगये नई अवस्थारूपी नदीके चढते समय कितने
अवगुण नहीं करती है “उल्लासालंकार ॥ ६०९ ॥
गुणी गुणी सबकोउ कहत, निगुणी गुणी न होत।
सुनो कबहुँ तरु अर्कते, अर्क समान उदोत ६१०
सब कोई गुणी २ कहतेहैं परन्तु किसीके कहनेसे निर्गुणी
गुणी नहीं होता, कहीं किसीने आकके पेडसे सूरजके समान
चांदना सुनाहै अर्क-सूरज और आक “न्यासालं-
कार” ॥ ६१० ॥
सप्तमशतक ७. ( १२२ )
संगति सुमति न पावहीं, परे कुमतिके धंध ।
राखो मेल कपूरमें, हींग न होय सुगंध ॥६११॥
जो बुद्धि कुमतिमें फँसजातीहै तो फिर मनुष्य संगतिसे
सुमति नहीं पाता चाहे कपूरमें डाल रक्खो परन्तु हींगमें सु-
गंध नहीं होती "अतद्गुणालंकार" ॥ ६११ ॥
सबै हँसत करतार दे, नागरताके नाँव ।
गयो गव गुणको सबै, बसे गमेले गाँव ॥ ६१२ ॥
नागरता चतुराईके नाम से सब ताली बजाकर हँसते हैं,
गँवारू गांवमें निवास करनेसे गुणका गर्व सब जातारहा "ले-
शालंकार" ॥ ६१२ ॥
सोहत संग समानसों, यहै कहैं सबलोग ।
पानपीक ओठन बने, काजर नैनन योग॥६१३॥
संग समानसे शोभित होताहै, सब लोग यही कहते हैं,
पानकी पीक होंठोंमें भली लगतीहै, और काजर नेत्रों-
हींके योग्यहै, होंठ लालहैं पानकी पीकभी लाल है
नेत्र श्यामहैं काजरभी श्यामहै, इसकारण दोनों शोभा यो-
ग्यतासे पातेहैं "समालंकार" ॥ ६१३ ॥
जो शिरधर महिमा मही, लहियत ग ना गव ।
प्रगटत जडता अपनी, मुकुट पागियन पाँव ॥
( २०० ) सतसई-सटीक ।
जिसको शिरपर धारण कर राजा और राव संसार अपनी
बडी प्रतिष्ठा प्राप्त करतेहैं, यदि मुकुटको पाँवमें पहरे तो
अपनी जडता प्रगट करतेहैं आशय यह कि, श्रेष्ठ लोक मुक-
टके समानहैं उनको जो शिर धरते अर्थात् आदर करतेहैं
वे बडाई पातेहैं, जो निरादर करतेहैं वे अपनी मूर्खता
प्रगट करते हैं “ अन्योक्तिअलंकार ” ॥ ६१४ ॥
अरे परेखो क्यों करै, तुही विलोक विचारि ।
केहि नर केहि सर राखिये, खरे बढेपर पारि ६१५
अरे अब परीक्षा कौन करै तूही विचारकर देख अच्छी
प्रकार बढते किस मनुष्य और किस सरोवरने मर्यादा रक्खी
है “ दीपकालंकार ” ॥ ६१५ ॥
बुरे बुराई जो तजैं, तौ मन खरो सकात ।
ज्यों निकलंक मयंक लखि, गिनैं लोग उतपात ॥
जो बुरे बुराई त्यागदें तो उनसे मन बहुत डरता है जैसे
निष्कलंक चंद्रमाको देखकर लोग उतपात मानते हैं “दृष्टा-
न्तालंकार” ॥ ६१६ ॥
भाँवरि अनभाँवरि भरो, करो कोटि बकवाद ।
अपनी अपनी भाँतिको, छुटै न सहज सवाद ६१७
रुचिमें अरुचि करो करोड़ बकवाद करो परन्तु अपनी २
सप्तमशतक ७. ( २०१ )
भाँतिका सहज स्वभाव नहीं छूटता आशय यह कि, सहजमें
किसीकी प्रकृति नहीं छूटती अथवा सखी कृष्णसे कहती है
हे लाल ! तुम्हारा पराये घरों में डोलनेका, और प्यारका
मान करनेका स्वभाव पड़ा है सो नहीं छूटनेका
“ विशेषोक्ति ” ॥ ६१७ ॥
जाको एकौ एकहू, जग व्योसाय न कोय ॥
सो निदाघ फूले फले, आक डहडहो होय॥६१८॥
जिसको जगत्में एकभी नहीं व्योसाता, अर्थात् कोई
साथी नहीं, और न कुछ सामर्थ्य है वह आकका पेडभी
गरमीमें फलता फूलता और हराभरा होता है अथवा जिसके
बढनेसे जगत्में एकको भी लाभ न हो वह नर फूले फलेभी
ऐसे हैं जैसे गरमीमें डहडहा आकका पेड़ “अन्योक्ति” ६१८
को कहिसकै वड़ेनसों, लखी बड़ीऔ भूल ।
दीने दई गुलाबकी, इन डारन यह फल ॥ ६१९ ॥
बड़ोंसे उनकी बड़ी भूल देखकरभी कौन कहसकता है
विधाताने ऐसी कटीली डालीमें यह कोमल सुगंधित गुला-
बके फूल लगाये हैं “अन्योक्ति” ॥ ६१९ ॥
शीतलतरु सुवासकी घटै न महिमा मृग ।
पौनसवारि जो तजो, सोरा जान कपूर ॥६२०॥
( २०२ ) सतसई-सटीक ।
इससे शीतलता और सुगंधकी महिमा नहीं घटसकती
जो पीनस ( नाकका रोग नाकसे कीडे गिरते हैं ) रोगवालोंने
शोरा जानकर कपूर त्यागन कर दिया, इस रोगीको गंधका
ज्ञान नहीं होता "अन्योक्ति" ॥ ६२० ॥
चितदे भजै चकोर ज्यों, तीजे भजै न भूख ।
चिनगी चुगै अँगारकी, पिये कि चंदमयूख ६२१
मन देकर चकोरको देखो कि, तीसरी भाँति उसकी भूख
नहीं जाती या आगकी चिनगारी चुगती है वा चंद्रकिरण
पीती है "अन्योक्ति" ॥ ६२१ ॥
चलेजाहु ह्यां को करै, हाथिनको व्यवहार ।
नहिं जानत यहि पुर बसैं, धोबी और कुम्हार ६२२
ह्यांसे चलेजाओ यहां कोई हाथियोंका व्यापार नहीं
करता नहीं जानते इस पुरमें धोबी और कुम्हार रहते हैं
आशय यह यहाँ निर्गुणियोंकी गाहकी है गुणियोंकी नहीं
राजधानी त्यागके समय कहा होगा "अन्योक्ति" ॥ ६२२ ॥
नरकी अरु नलनीरकी, एक गति कर जोय ।
जेतो नीचो होचलै, तेतो ऊँचो होय ॥ ६२३ ॥
मनुष्यकी और नलके पानीकी एकही गति देखी गई है
कि, जितना नीचा होकर चलैगा उतनाही ऊँचा होगा कहीं
सप्तमशतक ७. (२०३)
जेतो ऊंचोहो चले पाठ है वहां यह अर्थ है कि, कमल और
मन जल और धन बढनेसे जितना ऊँचा होगा सम्पत्ति
न रहनेसे उतनाही नीचा होगा नलनीर-कमल "रूपक" ६२३
समय समय सुन्दर सबै, रूप कुरूप न कोय ।
मनकी रुचि जेती जितै, तिनतेती रुचि होय ६२४॥
समय २ पर सब सुन्दर लगते हैं रूप कुरूप कोई नहीं
है मनकी जितनी रुचि जिधर होती है उधर वह उतनीही
सुन्दर विदित होती है "परिसंख्या" ॥ ६२४ ॥
गिरितै ऊँचे रसिकमन, बूडे जहां हजार ।
वहै सदा पशु नरनको, प्रेमपयोधि पगार ॥६२५॥
पहाड़से ऊँचे रसिकोंके हजारों मन जहां डूब गये वही
प्रेमका समुद्र पशु मनुष्योंको पगार है जिस जलमें पांवमात्र
डूबता है उसको पगार कहते हैं, आशय यह कि, मूढ़ प्रीति-
रस नहीं जानते "रूपकालंकार" ॥ ६२५ ॥
संगति दोष लगै सबनि, कहनै सांचे बैन ।
कुटिल बंक भ्रूभंगमै, कुटिल बंक गति नैन ६२६
संगतिका दोष सबको लगताहै यह सब सच बचन कहतेहैं,
देखो टेढ़ी भौंहकी संगतिसे कुटिल और टेढ़ी गतिवाले नेत्र
होतेहैं "उदात्तालंकार" ॥ ६२६ ॥
( २०४ ) सतसई-सटीक ।
मोरचन्द्रिका स्याम शिर, चढिकत करति गुमान।
लखवी पाँयनि पर लुटति, सुनियत राधा मान ॥
हे मोरचंद्रिका! श्रीकृष्णके शिरपर चढकर क्यों गुमान कर-
तीहै? सुनाहै कि, राधाके मान मनाते समय तू उनके चरणोंमें
पड़ीहै "पर्यायोक्ति" ॥ ६२७ ॥
गोधन तू हरष्यो हिये, घरि इक लेहु पुजाय ।
समुझ परैगी शीशपर, परत पशुनके पाय॥६२८॥
हे गोवर्द्धन पर्वत! मनमें प्रसन्न होकर तू घरीभरको अपनी
पूजा कराले, परन्तु जब अनेक पशुओंके चरण तुझपर पडेंगे
तब समझ पडैगी, जो महात्माओंके अभावमें अपनेको पुजाते
हैं उनपर “अन्योक्ति” ॥ ६२८ ॥
नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास यहिकाल
अली कलीहीसों बँध्यो, आगे कौन हवाल६२९॥
अभी न पराग है न मधुर मधु है न अभी विकास (खि-
ला) है कलीमेंही भौंरा बिंधरहा है जाने आगे क्या हाल होगा
मुग्धापर आसक्त पुरुषके प्रति “ भ्रमरोक्ति ” ॥ ६२९ ॥
जिन दिन देखे वे कुसुम, गई सो बीत बहार ।
अब अलि रही गुलाबमें, अपत कटीली डार६३०
ग [ga] त [ta] म [ma] े [e] ं [n], -> "जगतमें,"
Word 4:
ए [e] क [ka] -> "एक"
Word 5:
त [ta] ु [u] ह [ha] ी [ii] -> "तुही"
Word 6:
व [va] ि [i] ह [ha] ं [n] ग [ga] -> "विहंग"
॥ ६३३ ॥
Line 20:
Word 1:
प [pa] ं [n] ख [kha] -> "पंख"
Word 2:
ह [ha] ी [ii] -> "ही"
Word 3:
क [ka] प [pa] ड़ [da] े [e] -> "कपड़े"
Word 4:
ह [ha] ै [ai] ं [n], -> "हैं,"
Word 5:
म [ma] क [ka] ड़ [da] ा [aa] -> "मकड़ा" (or "कंकड़ा"?)
Wait, look at word 5 in line 20:
Letter 1: is it 'म' or 'अ' or 'क'?
Look at line 18: "भख काँकरे" (eats pebbles).
In line 20: "पंख ही कपड़े हैं, ... आदि कंकड़में अन्न भक्षण करता"
Wait
( २०६ ) सतसई-सटीक ।
सफरमें अपनी परेईको साथलिये एक परेवाही पक्षी इस ज-
गतमें सुखी है, विदेशीको दीन देख कविवचन "परिसं-
ख्या" ॥ ६३३ ॥
दिन दश आदर पायके, करले आप बखान ।
ज्योंलगि काकशराधपख,त्योंलगि तव सन्मान॥
जो थोडे दिनकी प्रभुतापर अभिमानमें फूल उठते हैं उन-
पर काकोक्ति-हे काक! दश दिनकी प्रभुताई पाकर अपने आ-
पका कितनाही बखान करले जबतक श्राद्धका पक्ष है तबत-
कही तेरा सन्मान है "अन्योक्ति" ॥ ६३४ ॥
स्वारथ सुकृत न श्रमवृथा, देखि विहंग विचारि ।
बाज पराये हाथ पर, तू पक्षीहि न मारि ॥ ६३५॥
अपना स्वार्थभी नहीं, कुछ इस कार्यमें पुण्यभी नहीं, के-
वल वृथा श्रम है,पक्षी विचार देख इस कारण हे बाज ! पराये
हाथपर बैठा हुआ (निष्प्रयोजन ) तू पक्षियोंको मत मार !
बाजके प्रति उक्ति दुष्ट मनुष्यके सेवक जो अनर्थ करते हैं
उनके प्रति ॥ ६३५ ॥
मरत प्यास पिंजरा परयो, सुआ समयके फेर ।
आदर देदे बोलियतु, वायस बलिकी बेर॥६३६॥
समयके फेरसे तोता पींजरेमें पड़ा प्यासा मरता है, और
सप्तमशतक ७. (२०७)
बलिक समय (श्राद्धपक्षमें) कौआ आदर देदेकर बुलाया
जाता है "शुकोक्ति" गुणीके सम्मुख निर्गुणीके आदरमें ६३६
को छूटो यहि जाल परि, मत कुरंग अकुलाय।
ज्यों ज्यों सुरझ भज्यो चहै, त्यों ज्यों उरझो जाय॥
हे कुरंग! इस जालमें पड़कर कोई नहीं छूटा तू मत अकु-
लावै ज्यों ज्यों सुरझ कर भाजा चाहता है त्यों त्यों उलझा-
जाता है अपनी तृष्णा पूर्णकर विरक्त होजायेंगे उनसे "कुरंगो-
क्ति" हे॥ ६३७॥
नहिं पावस ऋतुराज यह, तज तरुवर मति भूल।
अपतभये बिन पाय है, क्यों न बहल फल फूल॥
हे वृक्ष! यह वर्षाऋतु नहीं वसन्तऋतु है मतिकी भूल त्याग-
न करै अपत हुए बिना नवीन फल फूल नहीं मिलेंगे अर्थात
राजसेवकके दुःखपर "तरुवोक्ति"॥ ६३८॥
अजौं तरौनाहीं रह्यो, श्रुति सेवत इक अंग।
नाक बास बेसर लह्यो, बसि मुक्तनके संग॥६३९॥
भक्तवचन परमार्थ विषय, एक अंगसे श्रुतिका सेवन करने-
वाला आजतक नहीं तरा परन्तु मुक्तोंके साथ बसकर बेसरने
नाकका स्थान पाया एकअंगसे श्रुति (कान) का सेवन करके
(तरौना) कर्णफूल नहीं तरा पर (मुक्तन) मोतियोंके
( २०८ ) सतसई-सटीक ।
साथ निवास करके बेसरनेभी नाक ( स्वर्ग ) नासिकाका
बास पाया है । भक्तिपक्षमें श्रुति-वेद । बेसर-एकमात्र
निर्द्वन्द्व पुरुष । नाक स्वर्ग उसका नाम तरौना वा तारनेवाला
श्रुति ( वेद-कान ) की संगतिसे हुआ, इसका नाम मुक्तनर
मोती मुक्तपुरुषोंकी संगतिसे बेसर ( अनुपम ) हुआ "श्लेषा-
लेकार" ॥ ६३९ ॥
जनम जलधि पानिप अमल, तो जग आव अपार।
रहै गुणी ह्वै गर पर्यो, भलो न मुकताहार॥६४०॥
समुद्रसे जन्म निर्मलरूप संसारमें बड़ा मोल मर्यादावान्
गुणी ( डोरेयुक्त ) है हेमोती ! ऐसे बुद्धिमान् होकर भी
दूसरोंके गले पड़ेहो इसमें हीनता होगई है अर्थात् गुणियोंको
किसीके गले न पडना चाहिये " अन्योक्ति" ॥ ६४० ॥
गहै न एकौ गुणगरब, हँसै सकल संसार ।
कुच उँच पद लालच रहै, गरे परेहू हार ॥ ६४१ ॥
तू मनमें एकभी गुणका अभिमान नहीं रखता इस कारण
तुझको सब संसार हँसता है कुचरूपी उच्चपदके लालचसे
पराये गलेमें पड़ा रहता है, हारके अर्थ मोतीहार और
हीनता जैसे कोई गुणी उच्चपदके निमित्त राजाके गले पड़े
उसपर कथन है "अन्योक्ति" ॥ ६४१ ॥
सप्तमशतक ७. (२०९)
मूँड़ चढ़ायेहू रहै, परो पीठ कचभार।
गरेपरे पहँ राखिये, तऊ हीयपर हार ॥६४२॥
मूँड चढ़नेपरही बालोंका बोझ पीठपर डालाजाता है गले
पड़नेपर तौभी हार हृदयपरही रक्खाजाता है ॥ ६४२ ॥
पाय तरुणि कुच उच्चपद, चिरमि ठग्यो सब गाउँ।
छुटे ठौर रहि है वहै, जुहो मोल छबि नाउँ ६४३॥
चोंटलीने तरुणीके स्तनरूपी उच्चपदको प्राप्त करके सब
गाँव ठग लिया है अब ठौर छूटनेपरभी वही मोल वही छवि
और वही नाम रहेगा, चिरमी-चोंटली, नीचके उच्चपद प्राप्त
होनेपर यह कथन है ॥ ६४३ ॥
वे न यहां नागर बड़े, जिन आदर तो आव ।
फूल्यो अनफूल्यो भयो, गँवई गाँव गुलाब ६४४
जिनको तेरी सुधराईका आदर है वे बड़े चतुर पुरुष
यहाँ नहीं हैं, हे गुलाब ! गाँवमें तू फूलाहुआ भी अनफूले
हुएके समान है, (मूर्खोंमें गुणीका गुण प्रकाशित नहीं
होता) ॥ ६४४ ॥
कर ले सूँघि सराहिकै, रहै सबै गहि मौन ।
गंधी गंध गुलाबको, गँवई गाहक कौन ॥ ६४५ ॥
१४
( २१० ) सतसई-सटीक ।
हाथमें ले सूंघ कर सराहना कर सब गँवार मौन होरहे
हे गन्धी!गुलाबकी गन्धका गाँवमें कौन ग्राहक है जो मोल ले
ऐसाही गुणीका मूर्खोमें गुण प्रकाश करना है "अन्यो०"६४५
करि फुलेलको आचमन, मीठो कहति सराहि ।
चुपकरि रहु गंधी चतुर,अतरदिखावतकाहि६४६
ग्रामीण फुलेलका आचमन कर सराहना कर मीठा कहने
लगे, हेचतुर गंधी! चुपकर, अतर किसको दिखाता है मूर्खोंके
आगे चतुरकी विडम्बनामें उक्ति ॥ ६४६ ॥
कनक कनकते सौगुणी, मादकता अधिकाय।
उहि खावे बौराय जग, यह पाये बौराय॥६४७॥
( कनक ) धतूरेसे ( कनक ) सोनेमें सौगुणी मादकता
अधिक है वह खानेसे बौरा होता है परन्तु सुवर्णके पातेही
जग बौराजाता है “व्यतिरेकालंकार” ॥ ६४७ ॥
बड़े न हूजे गुणन बिन, बिरद बड़ाई पाय ।
कहत धतूरेसों कनक,गहने गढो न जाय॥६४८॥
गुणके विना यश बड़ाई पाकर बड़ाहोना उचित नहीं
धतूरेकोभी कनक ( सोना ) कहते हैं परन्तु वह गहनेमें नहीं
गढाजाता है “अन्तरन्यास” ॥ ६४८ ॥
सप्तमशतक ७. ( २११ )
हास्यरसवर्णन ।
रवि वन्दो कर जोरकै, सुनत श्यामके वैन ।
भये हँसोहे सबनिके, अति अनखोहे नैन॥६४९॥
जिससमय गोपियें चीरहरणके समय हाथसे अंग छिपाय
जलसे बाहरहुईं तब कृष्णने कहा हाथ जोड़ सूर्यको प्रणाम
करो यह सुनकर बालाओंके क्रोधभरे नेत्रोंमें हँसी आगई
"पर्यायालंकार" ॥ ६४९ ॥
कण देव्यो सौंप्यो ससुर, बहू थुरहथी जानि ।
रूप रहिचटै लगिलग्यो, मांगन सब जग आनि ॥
ससुरने बहूको छोटे हाथकी जानकर अन्न देना सौंपा उस-
के रूपके लालचसे सब जगतके लोग आकर मांगनेलगे
"विषादालंकार" अन्न थोडा उठेगा इसकारण काम
सौंपा सो उसके विरुद्ध अधिक उठनेलगा इससे विषाद
हुआ ॥ ६५० ॥
परतिय दोष पुराण सुनि, हँस मुलकी मुखदानि ।
कसकरि राखी मिश्रहू, मुँह आई मुसकानि॥६५१॥
पुराणमें परस्त्रियोंके गमनका दोष सुनकर सुखदायक थो-
ड़ा मुसकाकर हँसी तथा मिश्र ( पुराणवक्ता ) नेभी मुखआई
मुस्कान दबाकर रक्खी "अनुमान" ॥ ६५१ ॥
( २१२ ) सतसई-सटीक ।
चित पितुघातक योग लखि, भयो भये सुत सोग।
फिर हुलसो जिय जोतसी, समझो जारज योग ॥
पुत्र होनेपर पितुघातक योग देखकर ज्योतिषीको पुत्रके
होनेका शोक हुआ फिर जारजयोग जानकर प्रसन्नहुए आशय
यह कि, यह जारसे उत्पन्नहै ऐसा होनेसे जारका घातकहै इ-
सकारण प्रसन्न हुए “लेखांलंकार ॥ ६५२ ॥
बहुधन लै अहसानकें, पारो देति सराहि ।
वैदवधू हँसि भेदसों, रही नाह मुखचाहि ॥६५३॥
वैद्य बहुतसा धनले अहसानकर सराहना करके दूसरोंको
पारादेताहै, परन्तु इस बातसे हँसकर वैद्यकी स्त्री भेदसे स्वा-
मीका मुख देखकररही “अनुमानालंकार” हँसनेसे वैद्यमें न-
पुंसकताका अनुमान है ॥ ६५३ ॥
गोपनके अँसुअनभरी, सदा असोत अपार ।
डगर डगरने ह्वैरही, बगरबगरके बार ॥ ६५४ ॥
उद्धवजीका वचन श्रीकृष्णसे गोपियोंके आंसुओंसे भरी
विनाही सोतेवाली नसूखनेवाली अपारनदी ब्रजकी गली
गलीमें नहीं किन्तु घर घरके बाहर होरहीहै “अत्युक्ता-
लंकार” ॥ ६५४ ॥
श्याम सुरतिकर राधिका, तकत तरणिजा तीर ।