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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

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पृष्ठ 254

सप्तमशतक ७. ( २०१ )
भाँतिका सहज स्वभाव नहीं छूटता आशय यह कि, सहजमें
किसीकी प्रकृति नहीं छूटती अथवा सखी कृष्णसे कहती है
हे लाल ! तुम्हारा पराये घरों में डोलनेका, और प्यारका
मान करनेका स्वभाव पड़ा है सो नहीं छूटनेका
“ विशेषोक्ति ” ॥ ६१७ ॥
जाको एकौ एकहू, जग व्योसाय न कोय ॥
सो निदाघ फूले फले, आक डहडहो होय॥६१८॥
जिसको जगत्में एकभी नहीं व्योसाता, अर्थात् कोई
साथी नहीं, और न कुछ सामर्थ्य है वह आकका पेडभी
गरमीमें फलता फूलता और हराभरा होता है अथवा जिसके
बढनेसे जगत्में एकको भी लाभ न हो वह नर फूले फलेभी
ऐसे हैं जैसे गरमीमें डहडहा आकका पेड़ “अन्योक्ति” ६१८
को कहिसकै वड़ेनसों, लखी बड़ीऔ भूल ।
दीने दई गुलाबकी, इन डारन यह फल ॥ ६१९ ॥
बड़ोंसे उनकी बड़ी भूल देखकरभी कौन कहसकता है
विधाताने ऐसी कटीली डालीमें यह कोमल सुगंधित गुला-
बके फूल लगाये हैं “अन्योक्ति” ॥ ६१९ ॥
शीतलतरु सुवासकी घटै न महिमा मृग ।
पौनसवारि जो तजो, सोरा जान कपूर ॥६२०॥