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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

wait, ह has ि which goes over to the left!

  • The vertical line before ह is the left stem of the ि (i-matra) of हिं!

  • YES! In Devanagari, the short 'i' matra ि has a vertical line that stands BEFORE the consonant!

  • So प + ा = पा.

  • Then व.

  • Then the vertical line of ि belonging to ह!

  • So the letters are: प ा व ि ह ं = पावहिं!

  • Brilliant! It is NOT पावाहिं, it is पावहिं!

  • Let's double check: प + ा (पा), व, then ि on ह with anusvara (हिं). Exactly: पावहिं!

  • Now check कवित्तम,:

    • Is there an e-matra on म?
    • Look at म: above म, there is a comma after it, but above म there is no slant. But wait, could it be कवित्तमें where the slant broke off? Or कवित्तम?
    • Wait, look above म:

साहित्यपरिचय (२१)
संचारीभाव तेतीसहैं निर्वेद,ग्लानि,शंका,असूया,मद,श्रम,
आलस्य,दीनता,चिन्ता,मोह,स्मृति,धृति,लाज,वेग,चपलता,
जड़ता, हर्ष, गर्व, विषाद, नींद, अमर्ष, औत्सुक्य,
अपस्मार, सोना, बोध, उग्रता, मरण, बुद्धि, व्याधि, अव-
हित्थ, त्रास, उन्मादता, तर्क, विलास यह तेतीस संचारी
नौरसके साथ रहतेहैं ।
स्थायीभाव ।
सब भावनि सरदार है, टारिसक नाह कोय ।
सो थिरभाव बखानिये, रस स्वरूप जो होय ॥
इनके नौ भेद ।
रस सुहास अरु शोक पुनि, कहत क्रोध उत्साह ।
भय अरु ग्लानी आचरज,थिरभावनु कविनाह॥
शांतरसका निर्वेद भी स्थायी होता है ॥
रसोंके भेद ।
पहलो रस शृंगार पुनि, हास्यरु करुण बखानि ।
रौद्रो वीर भयानकौ, अरु वीभत्सहि जानि ॥
अद्भुतसों मिलि आठ यह, रस नाटकमें होत ।
शांतिसहित नौ कथितमें,कविकुल कहत उदोत॥
शृंगारमें कामका उद्भेद होताहै उत्तम प्रकृति में नवीन
अनुरागिणी नायिका आलम्बन है दक्षिणादि नायक आलंब-

( २२ ) साहित्यपरिचय ।
नहैं चन्द्र चन्दन कोकिलादिके शब्द इसके उद्दीपनहैं भ्रूवि-
क्षेप कटाक्षादि अनुभाव आलस्य जुगुप्सा व्यभिचारीहैं रति-
स्थायीभाव श्यामवर्ण विष्णु देवताहै ॥ १ ॥
विकृताकार वाणी चेष्टा आदिसे हास्यरस उत्पन्न होताहै
हास्यस्थायीभाव श्वेतवर्ण प्रमथ देवता, जिस वाणी वा चेष्टा
को देखकर मनुष्य हँसै वह, आलम्बन और उसकी चेष्टा
उद्दीपन है अक्षिसंकोच स्मेरतादिक अनुभाव, निद्रा आलस्य
अवहित्थादि व्यभिचारी हैं ।
इष्टका नाश अनिष्टकी प्राप्ति करुणरस है यह कपोतवर्ण
यम देवता वाला है इसमें शोकस्थायी भाव, शोच्य आलम्बन
दाहादिकावस्था उद्दीपन हैं, देवनिंदा, भूपात, क्रन्दन यह
अनुभाव हैं, तथा विवर्ण, उच्छ्वासनिश्वास, स्तम्भ, प्रलयन,
निर्वेद, मोह, अपस्मार, व्याधि, ग्लानि, स्मृति, भ्रम,
विषाद, जड़ता, उन्माद, चिन्ता आदिक व्यभिचारी हैं ।
रौद्रमें क्रोध स्थायीभाव, रक्तवर्ण रुद्र देवता शत्रु आल-
म्बन, उसकी चेष्टा उद्दीपन है, मुष्टिप्रहारपतन विकृति
अवदारण संग्राम संभ्रममें इसकी उद्दीपना होती है, भ्रूभंग,
होंट काटना, संभ, ठोंकना, तर्जन, अपनी बड़ाई, आयुध विक्षेप
अनुभाव हैं आक्षेप, क्रूर, संदंशन, उग्रता, वेग, रोमांच स्वेद,
वेपथु, मद, मोह, आमर्ष, व्यभिचारीभाव हैं ।

साहित्यपरिचय। ( २३)
उत्तम प्रकृतिवाला वीररस है उत्साह स्थायीभाव है महेन्द्र
देवता हेमवर्ण विजेतादिक आलम्बन विभाव हैं, सहाय
अन्वेषणादि अनुभाव हैं धृति, मति, गर्व, स्मृति, तर्क, रोमाञ्च
संचारीभाव हैं।
भयानक रसमें भय स्थायीभाव काल देवता, स्त्री नीच
प्रकृति कृष्णवर्ण है, जिससे भय उपजे वह इसमें आलम्बन
है, घोरतर उसकी चेष्टा उद्दीपन है, विवर्ण गद्गद्स्वरभाषण,
प्रलय, स्वेद, रोमाञ्च, कम्प, दिशाओंका देखना, अनुभाव,
जुगुप्सा, वेग, सम्मोह, त्रास, ग्लानि, दीनता, शंख, अपस्मार,
संभ्रान्ति, मृत्युआदि इसमें व्यभिचारी हैं।
वीभत्सरसमें जुगुप्सा ( निन्दा ) स्थायिभावसे रहती है
नीलवर्ण महाकाल इसका देवता है दुर्गंध मांसभेद इसका
आलम्बन है, कृमिपातादि उद्दीपन है, निष्ठीवन नेत्रसंकोच-
नादि अनुभाव, मोह, अपस्मार, आवेग, व्याधि, मरणादिक
संचारीभाव हैं।
अद्भुतरसमें विस्मय स्थायीभाव गंधर्व देवता पीतवर्ण
अलौकिक वस्तु आलम्बन, उसके गुणोंकी महिमा उद्दीपन
है, स्तंभ, स्वेद, रोमांच, गद्गद्,स्वर, संभ्रम, नेत्रविकासादि
अनुभाव, और वितर्क, आवेग, संभ्रान्ति, हर्षादिक इसके
व्यभिचारी हैं।

( २४ ) साहित्यपरिचय ।
शान्तरसमें शम स्थायिभाव, उत्तम प्रकृति, कुन्द और
चन्द्रमाके समानवर्ण श्रीनारायण देवता, अनित्यता वस्तुकी
निस्सारता वा परमात्माका स्वरूप इसका आलम्बन
है, पुण्याश्रमक्षेत्र तीर्थ महापुरुषोंका संग उद्दीपन है,
और रोमांचादि अनुभाव तथा निर्वेद हर्ष स्मरण अतिभूत
दयादिक संचारी हैं ।
कोई दशवाँ वत्सल रस कहते हैं, वत्सलता स्नेह स्थायि-
भाव पुत्रादि आलम्बन, उसकी चेष्टा विद्या शौर्य्यादि उद्दीपन,
आलिंगन, स्पर्श, चुम्बन, पुलकादि आनंद अनुभाव,
अनिष्टकी आशंका, हर्ष, गर्व, संचारीभावहैं कमलके गर्भके
समान वर्ण लोकमाता ये देवता हैं ।
इसके आगे काव्यकी ध्वनि व्यंजना लक्षणका विस्तार
होताहै परन्तु हम सतसईमात्रका विषय संक्षेपसें दिखाते हैं
इनके आलम्बन नायकादि हैं उनको कहते हैं त्यागी, कृती,
कुलीन, लक्ष्मीसम्पन्न रूप यौवनसे युक्त उत्साहवान्, चतुर,
अनुरक्त, शीलवान, नेता यह नायकके लक्षण हैं, धीरोदात्त,
धीरोद्धत, धीरललित, धीरप्रशान्त नायकके यह चार भेद हैं
अपनी बड़ाई न करनेवाले क्षमावान् गंभीर महाबली दृढ-
प्रतिज्ञ धीरोदात्त हैं यथा राम युधिष्ठिरादि ।
मायावी चपल अहंकारदंभसे युक्त अपनी बड़ाई करने-
वाला धीरोद्धत है, यथा भीमसेनादि निश्चिन्त मृदुकलामें

साहित्यपरिचय । ( २५ )
तत्पर धीर ललित है. जैसे रत्नावलीमें वत्सराजादि, सामा-
न्य गुणोंसे युक्त देव द्विजपूजक धीरप्रशान्त होता है इन
प्रत्येकके साथ दक्षिण धृष्ट अनुकूल शठ लगानेसे नायकके
सोलह भेद होते हैं, अनेक स्त्रियोंमें समान अनुराग रखने-
वाला दक्षिणनायक है, और अपराध करनेपरभी निश्शंक
तर्जनसेभी लज्जित न होनेवाला दोष देखनेपरभी मिथ्या-
वादी धृष्टनायक है, एकही स्त्रीमें निरत रहनेवाला अनुकूल
है और बाहरसे प्रेम दिखाकर भीतरसे शून्य और विपरीत
आचरण करै वह शठनायक है यह सब उत्तम मध्यम अध-
म लगानेसे ४८ प्रकारके होते हैं नायिकाओंके भी तीन
भेद हैं, अपनी स्त्री दूसरेकी स्त्री साधारण स्त्री विनय आर्ज-
वादि गुणसे युक्त गृहकर्ममें तत्पर पतिव्रता स्वीया है यह
मुग्धा मध्या प्रगल्भा तीन प्रकारकी है, नवयौवनवाली, गति
में वाम, मानमें मृदु, अधिक लज्जावती मुग्धा कहाती है,
विचित्र सुरतवाली कामसे पूर्ण प्रगल्भ वचनवाली, कुछ
लज्जावती मध्यमा हे कामसे अन्धी अतितरुण समस्त
रतिकी ज्ञाता भावमें उन्नत नायककी आक्रमण करनेवाली
प्रगल्भा कहाती है ।
यही प्रत्येक धीरा, अधीरा, धीराधीग इन भेदोंसे छः
प्रकारकी होती हैं इनमें कुछ हँसकर वक्र उक्तिसे कहनेवा-
ली तथा क्रोधसे जलानेवाली, मध्याधीग जाननी, धीराधीग

( २६ ) साहित्यपरिचय ।
रुदन करती है, और अधीरा कठोर वचन कहती है यह
सबमें लगालेना, प्रगल्भा यदि धीरा होती है तो क्रोध छिपा-
कर बहुत आदर दिखाती है, सुरतमें उदासीन होती है, पर-
कीया दो प्रकारकी हैं प्रौढा और कन्या, यात्रादिमें निरत
लाजहीन कुलटा प्रौढा कहाती है, नवयौवना शीलवान्
लज्जायुक्त कन्या होती है, सामान्यस्त्रीमें धीरा कलाओंमें
प्रगल्भा वेश्या होती हैं यह किसीमें अनुराग नहीं करतीं,
इनकी दृष्टिमें गुणी निर्गुणी कोई नहीं, केवल धनमात्रके
लोभसे बनावटी गाढा प्रेम दिखाती हैं, अंगीकार करके भी
क्षीणधन पुरुष यह घरसे निकाल देती हैं तस्कर षण्डक
मूर्ख जिनको सेतमेत सुखसे धन मिलगया है वही इनके
प्रिय होते हैं "कैसा वीभत्स व्यापार है, माता पिता कष्ट
पाऔ कुछ चिन्ता नहीं, स्त्री महाशोकसागरमें मग्नहो कुछ
चिन्ता नहीं, पिता गरमी जाड़ा वर्षातमें वस्त्र अन्नका कष्ट भोगै
कुछ चिन्ता नहीं, वृद्धावस्थामें हम क्या करेंगे कुछ चिन्ता
नहीं लोक हमारा हास्य करते हैं कुछ चिन्ता नहीं जाय-
दात गिरवी हुई कुछ चिन्ता नहीं जातिसे पतित होंगे धर्म
जायगा कुछ चिन्ता नहीं, वेश्याके यहाँ सर्वस्व चलाजाता है
कुछ चिन्ता नहीं, परंतु यदि अपने कुटुम्बके निमित्त दो
पैसेका खर्च आजाय तो पैरके तलेसे भूमि निकल जाती है
बहुत क्या वारांगनाकी आत्मामें 'जी' ही यही होगा और

साहित्यपरिचय। ( २७ )
कुटुम्बी हितकारीजनोंके उत्तरके 'नहीं' यही दो अक्षर
होते हैं परंतु "सबै दिन नाहिं बरोबर जात" अंतमें क्षीणधन
होनेसे निकाले जाते और पछताते हैं यह रक्तहों वा विरक्त हों
इनमें प्रीति दुर्लभ है।
कोई इनमें कामके वशीभूत होनेसे अनुरागिणी भी
होती है।
अन्य स्त्रियोंके स्वाधीनभर्तृका, खण्डिता, अभिसारिका,
कलहान्तरिता, विप्रलब्धा, प्रोषितभर्तृका, वासकसज्जा, विर-
होत्कंठिता यह भेद हैं।
जो अपने स्वामीके सदा प्रेममें आधीन रहै यह स्वाधीन-
भर्तृका, अन्य स्त्रीसे रति करके उसके चिह्नोंसे युक्त पति
जिसके पास आवै वह खण्डिता, जो वेष छिपाकर संकेतमें
नायकके पास जाय वह अभिसारिका, क्षेत्र बावडीके
निकट भग्नदेवालय दूतीके घर वन स्मशान नदी आदिका
तट यह अंधकारके समय इनके अभिसारके स्थान हैं।
जो क्रोधसे बुरे वचन कहकर प्राणनाथको बाहर करदे पीछे
पछतावै वह कलहान्तरिता है, जिसका प्रीतम संकेत करके
मिलनेको न आवै वह विप्रलब्धा । जिसका पति कार्यवश
परदेश गया हो उसकी कामार्त्त स्त्री प्रोषितभर्तृका कहातीहै,
जो स्वामीका संगम जान कर शृंगार कर सेज प्रस्तुत करती
है वह वासकसज्जा, आनेका निश्चय करके प्रारब्धमें जिस-

( २८ ) साहित्यपरिचय ।
का पति न आवै वह विरहोत्कंठिता कहातीहै इनमें
मध्यम अधम लगाकर ३८४ सेभी अधिक नायकाभेद होते
हैं सो विस्तारभयसे नहीं लिखे, इनके शरीरमें
कारण अट्ठाईस विकार होते हैं और भावसे लेकर धैर्यतक
दशपुरुषोंमें होते हैं तथाहि-
भाव-निर्विकारात्मक चित्तमें पहला विकार ( विभाव
अनेत्रादिके विकारसे सम्भोगकी इच्छा प्रगट करनी, थोडा
संलक्ष्यका विकार हाव है। खेलादिके अत्यन्त प्रगट विकारका
नाम हेलाहै । रूप यौवनके लालित्यका नाम शोभाहै।कामकी
अधिकाईके प्रकाशका नाम कान्ति कान्तिकी अधिकाईदीप्ति।
सब अवस्था में रमणीयताका नाम माधुर्य है। भय न माननेका
नाम प्रागल्भ्यहै । विनयका नाम औदार्य्यहै । अपनी श्लाघा
करके चंचलता त्यागकर स्थिर मनोवृत्ति रखना धैर्यहै।
अलंकार धारणपूर्वक प्रीतियुक्त प्रेमभरे वचन
प्रियकी अनुकृतिका नाम लीलाहै । इष्टके देखने

साहित्यपरिचय । ( २९ )

किल किंचित् है। प्रीतमकी कथादिमें भाव रखकर कानआदिके
खुजाते जानेका नाम मोहायित है । प्रीतमके केश स्तन
अधरादिके स्पर्श करनेसे जो सम्भ्रमसे हाथ पैरका विधू-
नन है उसको कुट्टमित कहते हैं। जो पतिके आगमनादिके
हर्षमें शीघ्रताके कारण अन्यस्थानमें अन्यभूषणोंका धारण
करनाहै उसको विभ्रम कहते हैं।सुकुमारतासे अंगोंके विन्या-
सको ललित कहते हैं। सौभाग्य यौवनके मदसे उत्पन्न हुआ
विकार मदहै । वचन कहनेके समय लाजसे जो न कहाजाय
वह विकृतहै। प्रियके वियोगसे कामावेशकी चेष्टासे उत्पन्न
व्यापार तपनहै। जो जानकर भी अज्ञानके समान प्रियासे
वस्तु आदिके निमित्त प्रश्न है उसका नाम मौग्ध्यहै। प्रीत-
मके समीप भूषणोंकी अर्धरचना, निरर्थक चारों ओर
देखना कुछ मंद मंद गोपनीय विषयको कहना विक्षेप ह।
रम्यवस्तुके देखनेकी चंचलताका नाम कुतूहल है ।
यौवनके उद्भेदसे वृथाहास्यका नाम हसित है । प्रीतमके
आगे थोडे कारणसेभी भयसे संभ्रमका नाम चकितहै। विहा-
रमें प्रीतमके साथ क्रीडाका नाम केलि है। यह अट्ठाईस
विकार स्त्रीजनोंको होते हैं, भावसे लेकर धैर्यपर्यन्त दश
पुरुषोंको होते हैं। मुग्धा कन्या केवल देखती है, बहुत
पूछनेसे कुछ कहतीहै। लेख दर्शन चेष्टा तथा दूतीके मुखसे
स्त्रियोंके भाव प्रगट होते हैं कलाकौशल उत्साहसे युक्त

( ३० ) साहित्यपरिचय ।
भक्तिमान् तत्त्वज्ञाता स्मृतिवान् मधुरभाषी बहुत वाचालता-
युक्त दूती होनी चाहिये उत्तम मध्यम अधमके भेदसे यहभी
कई भेदवाली हैं।
सत्त्वसे उत्पन्नहुए विकार सात्त्विक कहाते हैं, भय वा
हर्षसे चेष्टाका स्तंभ होजाना, पसीना आजाना, रुएँ खड़े
होजाना, स्वरभंग होजाना, कंपित होना, विवर्णता हो जानी,
विषाद वा मदसे । क्रोध दुःख वा हर्षसे नेत्रोंमें जल आजा-
ना, सुख दुःखकी चेष्टाका ज्ञान न रहना प्रलयहै, यह भाव
प्रेममें उदय होते हैं। कई कारणोंसे ग्लानि मानकर अपनी
अमाननाका नाम निर्वेद है। व्यभिचारी होनेसे इनकेभी तैंती-
स भेद होते हैं।
रसके धर्म काव्यमें माधुर्य्य ओज प्रसाद यह तीन प्रका-
रके हैं, सुनतेही चित्त द्रवीभूत होकर आह्लादको प्राप्तहो इसका
नाम माधुर्य्य है । मनके विस्ताररूप विकासका नाम ओज है,
वीर बीभत्स रौद्र रसमें इसकी अधिकता है।

साहित्यपरिचय। (३१)
दोहा-प्रथम शब्द याते कहें, प्रथम शब्दके साज ॥
बहुरि अर्थके जानिये, अलंकार कविराज ॥ १ ॥
उक्तिभेदते होत हैं, अलंकार यह जानि ॥
वक्र उक्ति याते कही, द्वैविधि प्रथम बखानि॥ २ ॥
कहै बात औरै कछू, अर्थ करै कछु और ॥
वक्रउक्ति ताको कहें, श्लेष शुद्ध द्वै ठौर ॥ ३ ॥
वर्ण एकसे फिर जहाँ, अनुप्रास है सोय ॥
छेकविदग्धा वृत्ति करि, सो पुनिद्वै विधि होय ॥ ४ ॥
जहाँ बहुतसे वर्ण एकवार फिर आवैं वह विदग्धा अनु-
प्रासहै। अनेक व्यंजनका एकधा स्वरूपसे वा वारंवार अने-
क प्रकार क्रमसे एक व्यंजनका बारवार समभावसे जो वर्तना
है उसको वृत्यनुप्रास कहते हैं।
दोहा-फिरै अर्थ पदयुत जहाँ, अर्थभेद नहिं कोय ।
सो लाटानुप्रास पुनि, भावभेदते होय ॥ १ ॥
एक शब्द बहु शब्दको, एकरु भिन्न समास ।
परने वचन समासहू, पांच भांति सुप्रकाश ॥ २ ॥
यमकलक्षण ।
दोहा-अर्थ होय भिन्न जहाँ, शब्द एक अनुहार ।
यमक कहत तासों सबे, भेद अनन्त विचार ॥ १ ॥

( ३२ ) साहित्यपरिचय ।
श्लेषलक्षण ।
दोहा-कह जेहि अर्थ अनेकको, रहै एकही रूप ।
शब्द तहां सुश्लेष हैं, आठ भांति सुअनूप ॥ २ ॥
वर्ण वचन अरु लिंग पुनि, कहि विभक्ति पदकान्ति ।
भाषा अरु प्रत्यय प्रकृति, वरन आठ यहि भांति॥३॥
चित्रलक्षण ।
दोहा-लिखिवेहीकी चतुराई, उपजैं भेद अनेक ।
जहां सुचित्र कवित्त है, बहुविधि बन्धु विवेक ॥ १ ॥
अर्थालंकार ।
दोहा-उपमा औ उपमेय हैं, अलंकारके प्रान ।
तात इनको प्रथमही, कहियत रूप वखान ॥ १ ॥
होय बड़ाई सम किये, जाकूं सो उपमानि ॥
जाको वर्णन कीजिये, सो उपमेय बखानि ॥ २ ॥
शब्द अर्थ समना कहें, दोउनकी जेहि ठौर ॥
नहिं कल्पितउपमान जेहि, सो उपमा शिरमौर ॥३॥
शब्द सबैदौ पाइयै, समना श्रौती सोय ॥
अर्थ विचारै आर्थी, उपमाद्वै विधि होय ॥ ४ ॥
समना पद उपमेय पुनि, धर्म और उपमान ॥
चारो जुरैं सो पूरना, लोपहु ता जान ॥ ५ ॥

साहित्यपरिचय। ( ३३ )
जिमि जैसो मानोरु सों, भाषा श्रौती जान।
सम समान उपमा तुला, जोग आरथी आन ॥ ६ ॥
औरै जे समता कहैं, प्रगटति श्रौती हेत।
जे समझावैं अर्थसो, ते आरथी निकेत ॥ ७ ॥
लुप्ता।
दोहा–उपमा औ उपमेय पुनि, वाचकधर्म बखान।
एक दोय अरु तीन पुनि, लोपैलुप्ता जान ॥ १ ॥
प्रतिवस्तूपमा।
दोहा–समतासूचक पद जहाँ, रहै एक द्वै भांति ॥
सो है प्रतिवस्तूपमा, पदसमूहकी कांति ॥ १ ॥
जहँ लघुता उपमानकी, सो प्रतीप ह्वै भेव ॥
प्रथम निरादर कीजिये, पुनि कीजे उपमेव ॥ २ ॥
संशयमें जो सांचसी, तेहि विधिको उपमान ॥
अधिक होय उपमेयते, सो उत्प्रेक्षा जान ॥ ३ ॥
उपमा अरु उपमेयको, भेद परै नहिं जानि ॥
समता व्यंग्यरहै जहां, रूपक ताहि बखानि ॥ ४ ॥
जँहँ देखत उपमानको, सुधि आवै उपमेय ॥
ताही सों सुमिरण कहत, जे कवि जानत भेय ॥ ५ ॥
करि निषेध उपमेयको, जहँ थापै उपमान ॥
बहुविधि वाचक भेदते, ताहि उपह्नुति जान ॥ ६ ॥
३

( ३४ ) साहित्यपरिचय।
जहँ संबंध बने न तब, उपमामें विश्राम ॥
हेतु क्रिया कारि दोप है, निदर्शना सुखधाम ॥ ७ ॥
अति अभेद जिय राखि जहँ, नहिं कहिये उपमेय ॥
उपमानि कहिये जहाँ, अतिशयोक्ति सो भेव ॥ ८ ॥
उपमानरु उपमेय पुनि, साधारण जेहि ठाउँ ॥
वाचक सब प्रतिबिम्बहै, सो दृष्टान्ता नाउँ ॥ ९ ॥
अगले २ योग जहँ, प्रथम अधिक गुण होय ॥
मालादीपक कहत हैं, ताहि सब कविलोग ॥ १० ॥
दीपकहींसों भेव यह, नियत एकहीं होय ॥
उपमानि उपमेयको, तुल्य योग्यता सोय ॥ ११ ॥
जहाँ अधिक उपमानते, कहियत है उपमेय ॥
सो व्यतिरेक बखानिये, ऊँच नीच गुण भेय ॥ १२ ॥
इनके चौबीस भेद होते हैं.
दोहा—कथ्यो न कछु कहि बरनि, अधिकाईके हेत।
कह्यो कि कहिब भेद द्वै, आक्षेप कहि देत ॥ १ ॥

साहित्यपरिचय । ( ३१ )
संख्याक्रम चूकै नहीं, यथा संख्य है सोय ॥ १ ॥
जहां अर्थ सामान्यको, पोपन करे विशेप ।
पुनि सामान्य विशेषको, जेहिठाँ पोप न लेप ॥ २ ॥
सो अर्थान्तर न्यास है, और अर्थ जहाँ होय ।
स्वधर्म विधर्म भेदकर, चारभांति है सोय ॥ ३ ॥
है न विरोध विरोधसो, बातन माहिँ लखाय ।
जाति क्रिया गुण नाम करि, सो विरोध दशभाय ॥४॥
जाति चारिसों तीनगुण, द्वैसे क्रिया विरुद्ध ।
नाम नामहीसों बहुरि, यौँ हैं दश विधि शुद्ध ॥ ५ ॥
रूप रहै जु सुभायकै, तिनको वर्णन होय ।
सुस्वभावोक्ति जानिये, कृतिम जहाँ नहिं सोय ॥ ६ ॥
बहानेसे दोष वर्णन करनेका नाम व्याजस्तुति है, और
अर्थके बिना अर्थ जहाँ भला बुरा न हो उसको विनोक्ति कह
ते हैं जहां अर्थ बदले जाते हैं वह विनिमय अलंकार है सम
और अर्थ भेदसे दो प्रकारका है ।
सहोक्ति लक्षण ।
[L18

( ६६ ) साहित्यपरिचय ।
पदसमूहके अर्थ यह, हेतुनि द्विविधि होय ।
जहां सुकाव्यालिंगहै, द्वै पुनि द्वै विधि सोय ॥ ३ ॥
यह भी दो प्रकारका होता है ।
समुच्चय वर्णन ।
मूल अर्थकी सिद्धि जहँ, एक अर्थते होय ।
आगे पोषकहोय बहु, वरनि समुच्चय सोय ॥ १ ॥
एक अनेकनमें रहै, वरणपर्यायसु और ।
सो दूजो अरु अनेक जहँ, रहत एकही ठौर ॥ २ ॥
जनक परस्परा जानके, दोन अर्थ तब होय ।
एक क्रियाके योगते, सो अन्यान्‍याहिगोय ॥ ३ ॥
इस प्रकार संक्षेपसे थोड़े अलंकारोंका लक्षण दिखा दि-
याहै टीका करते समय भी बहुत अलंकारोंके लक्षण लिख
दिये हैं तात्पर्य पढनेवालोंको इसमें बहुत कुछ काव्यका भेद
खुलेगा; यदि और विशेष कुछ देखना हो तो वह दूसरे
काव्यादर्शवा , ग्रंथ जैसे काव्य निर्णयादि काव्यके
अंग देखें ।

श्रीगणेशायनमः ।
अथ बिहारीसतसईकी-
अकारादिअनुक्रमपूर्वक अनुक्रमणिका ।
अ. | अरतैं टरत ... ... ४५६
अंगअंगप्रतिबिम्ब ... ५३० | अरी खरी ... ... १६२
अंगअंगनग ... ... ५२९ | अरुनचरन ... ... ५१२
अंगअंगछवि ... ... ५३१ | अरुणसरोरुह ... ... ५७८
अंगुरिन .... ... २०६ | अरे परै ... ... ३८९
अजहुँ न आये ... ... १३० | अरे परंदो ... ... ६१५
अजौ तन्योनाहीं ... ... ६३९ | अरे हंसया ... ... ७१०
अतिअगाध ... ... ६०३ | अलिइन ... ... २५९
अधर धरत ... ... ६ | अलि इन लोयनसे ... २६०
अनत बसे .... ... १८८ | अहै दूहिन ... ... ६५०
अनरस ... ... ३७५ | अहै दहैंडी ... ... २२३
अनियारे दीरघ ... ३७१ |
अनी बड़ी ... ... ६५८ | आ.
अन्त भरेंगे ... ... ७०९ | आज कछु .... ... १८७
अपनी गरज ... ... ३०१ | आये दै आड़े ... ... ३८१
अपने अंगके .... ... २० | आप दगौ ... ... १८४
अपने अरैन ... ... ६८२ | आये आप .... ... ३७९
अपने गुहिकार ... ... ५५७ | आये मान .... ... ६४९
अब गति ... ... ५७६ | आननधाम ... ... ५८२

( २ ) - बिहारीसतसयीकी-
इ. | ओ.
इक भींजे .... ... ६०९ | ओछे बड़े न .... ... ६००
इत आवत .... ... ४१८ | ओठ उँचै ... ... २८२
इतते उत ... ... २८६ | औ.
इन अँखियां ... .... २७० | औंघाई ... .... ३८२
इहि आशा ... .... ६३१ | औये भांति ... .... ४१५
इहि हैही .... .... ४७४ | औरै सब ... ... ७६
इहि काटे ... .... ४७ | औरै ओप ... .... ८८
उ. | औरै गति .... .... ८१
उठि ठक ठक ... ... १५६ | क.
उडकुडबाती ... ... ३१५ | कंचन तनु ... ... ५२२
उडी गुर्डी ... ... २५५ | कञ्जनयनि ... ... ६०
उदय अस्त ... ... ७२३ | कच समेट .... .... ५४३
उनकी हितु ... ... २८९ | कत लपटैयत ... ... १९२
उनि हरकी ... ... २८८ | कत बेकाज ... ... १६८
उयो शरद ... ... २३७ | कत सकुचत ... ... १९०
उर मानिक्की .... ... ५०२ | कनक कनक ... ... ६४७
उर लीन्हे ... ... ३१० | कन दैबो ... ... ६५०
उर उरझ्यो .... ... २८७ | कपट सतर ... .... १०५
ऊ. | कबकी ध्यान ... ... ६७
ऊँचे चितय ... ... ७३ | कर उठाय .... ... ५०३
ए. | करके माँड़े ... .... ५२२
एरी यह तेरी ... ... ७० | करतु मलिन ... ... ५२५
ऐ. | कर फुलेलको .... ... ६४६
ऐंचतसी ... ... ६३ |

अनुक्रमणिका । ( ३ )
करले चूमि ... ... ४०५ | कालव्रूत... ... ... ३२२
करले संधि ... ... ६४५ | किती न गोकुल .... ... ७
करत जात ... ... २९५ | किय घायल ... ... ५१०
करी विरह ... ... ४२५ | कियो जु चिबुक ... .... १०८
करे चाहसों .... ... ३३ | कियो सयान ... ... १४४
करें सातसौ ... ... ७२७ | कियो सबै जग .... ... ५८१
करो कुवत .... .... ६९२ | कीनेऊ कोटक ... ... २८०
कबकी टेरत ... ... ६९० | कीजे चित सोई ... ... ६९८
कवि कहियत ... ... १७९ | कुंजभवन ... ... ५४८
कहत सबै ... ... ४४५ | कुष गिरि ... ... ४८४
कहत सबै कबि ... .... २६४ | कुटिल अलक ... ... ४४२
कहत नटत ... ... ५८ | कुढँग कोप ... ... ५७३
कहत न देवर ... .... १५ | केसर केसर .... ... १९७
कह लहि ... ... ५२० | केसरके ... ... ५३५
कह लाने ... .... ५६९ | कैवा आयत ... ... ३४३
कहा लैदैत ... ... २२७ | केस छोटे ... ... ५५९
कहा कहौं ... ... ७९८ | कोटि जनन ... ... ४०८
कहा कुसुम ... ... ५५९ | को छूटनौ .... ... ६३७
कहा भयो ... ... १९७ | को जानि ... ... २७१
कहो लैहूगे ... ... ३७३ | को हरसी ... ... ५०९
कहिपठई.... ... ... ९५ | कोटि ननन ... ... ७०
कहेतु वचन .... ... ३९४ | को कहिसकै, .... ... ३३९
कहै रही... ... ... ६०४ | कोटि नयन ... ... ७१५
कागद पर ... ... ४०७ | खोज कोटिक ... ... ६६६
काहे वरन ... ... २४५ | कौंधा और .... .... ४७१