बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाहित्यपरिचय । ( २५ )
तत्पर धीर ललित है. जैसे रत्नावलीमें वत्सराजादि, सामा-
न्य गुणोंसे युक्त देव द्विजपूजक धीरप्रशान्त होता है इन
प्रत्येकके साथ दक्षिण धृष्ट अनुकूल शठ लगानेसे नायकके
सोलह भेद होते हैं, अनेक स्त्रियोंमें समान अनुराग रखने-
वाला दक्षिणनायक है, और अपराध करनेपरभी निश्शंक
तर्जनसेभी लज्जित न होनेवाला दोष देखनेपरभी मिथ्या-
वादी धृष्टनायक है, एकही स्त्रीमें निरत रहनेवाला अनुकूल
है और बाहरसे प्रेम दिखाकर भीतरसे शून्य और विपरीत
आचरण करै वह शठनायक है यह सब उत्तम मध्यम अध-
म लगानेसे ४८ प्रकारके होते हैं नायिकाओंके भी तीन
भेद हैं, अपनी स्त्री दूसरेकी स्त्री साधारण स्त्री विनय आर्ज-
वादि गुणसे युक्त गृहकर्ममें तत्पर पतिव्रता स्वीया है यह
मुग्धा मध्या प्रगल्भा तीन प्रकारकी है, नवयौवनवाली, गति
में वाम, मानमें मृदु, अधिक लज्जावती मुग्धा कहाती है,
विचित्र सुरतवाली कामसे पूर्ण प्रगल्भ वचनवाली, कुछ
लज्जावती मध्यमा हे कामसे अन्धी अतितरुण समस्त
रतिकी ज्ञाता भावमें उन्नत नायककी आक्रमण करनेवाली
प्रगल्भा कहाती है ।
यही प्रत्येक धीरा, अधीरा, धीराधीग इन भेदोंसे छः
प्रकारकी होती हैं इनमें कुछ हँसकर वक्र उक्तिसे कहनेवा-
ली तथा क्रोधसे जलानेवाली, मध्याधीग जाननी, धीराधीग