बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
पृष्ठ 27, कुल 290 में से
संदर्भ में पढ़ें( २६ ) साहित्यपरिचय ।
रुदन करती है, और अधीरा कठोर वचन कहती है यह
सबमें लगालेना, प्रगल्भा यदि धीरा होती है तो क्रोध छिपा-
कर बहुत आदर दिखाती है, सुरतमें उदासीन होती है, पर-
कीया दो प्रकारकी हैं प्रौढा और कन्या, यात्रादिमें निरत
लाजहीन कुलटा प्रौढा कहाती है, नवयौवना शीलवान्
लज्जायुक्त कन्या होती है, सामान्यस्त्रीमें धीरा कलाओंमें
प्रगल्भा वेश्या होती हैं यह किसीमें अनुराग नहीं करतीं,
इनकी दृष्टिमें गुणी निर्गुणी कोई नहीं, केवल धनमात्रके
लोभसे बनावटी गाढा प्रेम दिखाती हैं, अंगीकार करके भी
क्षीणधन पुरुष यह घरसे निकाल देती हैं तस्कर षण्डक
मूर्ख जिनको सेतमेत सुखसे धन मिलगया है वही इनके
प्रिय होते हैं "कैसा वीभत्स व्यापार है, माता पिता कष्ट
पाऔ कुछ चिन्ता नहीं, स्त्री महाशोकसागरमें मग्नहो कुछ
चिन्ता नहीं, पिता गरमी जाड़ा वर्षातमें वस्त्र अन्नका कष्ट भोगै
कुछ चिन्ता नहीं, वृद्धावस्थामें हम क्या करेंगे कुछ चिन्ता
नहीं लोक हमारा हास्य करते हैं कुछ चिन्ता नहीं जाय-
दात गिरवी हुई कुछ चिन्ता नहीं जातिसे पतित होंगे धर्म
जायगा कुछ चिन्ता नहीं, वेश्याके यहाँ सर्वस्व चलाजाता है
कुछ चिन्ता नहीं, परंतु यदि अपने कुटुम्बके निमित्त दो
पैसेका खर्च आजाय तो पैरके तलेसे भूमि निकल जाती है
बहुत क्या वारांगनाकी आत्मामें 'जी' ही यही होगा और