बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाहित्यपरिचय। ( २३)
उत्तम प्रकृतिवाला वीररस है उत्साह स्थायीभाव है महेन्द्र
देवता हेमवर्ण विजेतादिक आलम्बन विभाव हैं, सहाय
अन्वेषणादि अनुभाव हैं धृति, मति, गर्व, स्मृति, तर्क, रोमाञ्च
संचारीभाव हैं।
भयानक रसमें भय स्थायीभाव काल देवता, स्त्री नीच
प्रकृति कृष्णवर्ण है, जिससे भय उपजे वह इसमें आलम्बन
है, घोरतर उसकी चेष्टा उद्दीपन है, विवर्ण गद्गद्स्वरभाषण,
प्रलय, स्वेद, रोमाञ्च, कम्प, दिशाओंका देखना, अनुभाव,
जुगुप्सा, वेग, सम्मोह, त्रास, ग्लानि, दीनता, शंख, अपस्मार,
संभ्रान्ति, मृत्युआदि इसमें व्यभिचारी हैं।
वीभत्सरसमें जुगुप्सा ( निन्दा ) स्थायिभावसे रहती है
नीलवर्ण महाकाल इसका देवता है दुर्गंध मांसभेद इसका
आलम्बन है, कृमिपातादि उद्दीपन है, निष्ठीवन नेत्रसंकोच-
नादि अनुभाव, मोह, अपस्मार, आवेग, व्याधि, मरणादिक
संचारीभाव हैं।
अद्भुतरसमें विस्मय स्थायीभाव गंधर्व देवता पीतवर्ण
अलौकिक वस्तु आलम्बन, उसके गुणोंकी महिमा उद्दीपन
है, स्तंभ, स्वेद, रोमांच, गद्गद्,स्वर, संभ्रम, नेत्रविकासादि
अनुभाव, और वितर्क, आवेग, संभ्रान्ति, हर्षादिक इसके
व्यभिचारी हैं।