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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 23

( २२ ) साहित्यपरिचय ।
नहैं चन्द्र चन्दन कोकिलादिके शब्द इसके उद्दीपनहैं भ्रूवि-
क्षेप कटाक्षादि अनुभाव आलस्य जुगुप्सा व्यभिचारीहैं रति-
स्थायीभाव श्यामवर्ण विष्णु देवताहै ॥ १ ॥
विकृताकार वाणी चेष्टा आदिसे हास्यरस उत्पन्न होताहै
हास्यस्थायीभाव श्वेतवर्ण प्रमथ देवता, जिस वाणी वा चेष्टा
को देखकर मनुष्य हँसै वह, आलम्बन और उसकी चेष्टा
उद्दीपन है अक्षिसंकोच स्मेरतादिक अनुभाव, निद्रा आलस्य
अवहित्थादि व्यभिचारी हैं ।
इष्टका नाश अनिष्टकी प्राप्ति करुणरस है यह कपोतवर्ण
यम देवता वाला है इसमें शोकस्थायी भाव, शोच्य आलम्बन
दाहादिकावस्था उद्दीपन हैं, देवनिंदा, भूपात, क्रन्दन यह
अनुभाव हैं, तथा विवर्ण, उच्छ्वासनिश्वास, स्तम्भ, प्रलयन,
निर्वेद, मोह, अपस्मार, व्याधि, ग्लानि, स्मृति, भ्रम,
विषाद, जड़ता, उन्माद, चिन्ता आदिक व्यभिचारी हैं ।
रौद्रमें क्रोध स्थायीभाव, रक्तवर्ण रुद्र देवता शत्रु आल-
म्बन, उसकी चेष्टा उद्दीपन है, मुष्टिप्रहारपतन विकृति
अवदारण संग्राम संभ्रममें इसकी उद्दीपना होती है, भ्रूभंग,
होंट काटना, संभ, ठोंकना, तर्जन, अपनी बड़ाई, आयुध विक्षेप
अनुभाव हैं आक्षेप, क्रूर, संदंशन, उग्रता, वेग, रोमांच स्वेद,
वेपथु, मद, मोह, आमर्ष, व्यभिचारीभाव हैं ।

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