सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 290 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 25

( २४ ) साहित्यपरिचय ।
शान्तरसमें शम स्थायिभाव, उत्तम प्रकृति, कुन्द और
चन्द्रमाके समानवर्ण श्रीनारायण देवता, अनित्यता वस्तुकी
निस्सारता वा परमात्माका स्वरूप इसका आलम्बन
है, पुण्याश्रमक्षेत्र तीर्थ महापुरुषोंका संग उद्दीपन है,
और रोमांचादि अनुभाव तथा निर्वेद हर्ष स्मरण अतिभूत
दयादिक संचारी हैं ।
कोई दशवाँ वत्सल रस कहते हैं, वत्सलता स्नेह स्थायि-
भाव पुत्रादि आलम्बन, उसकी चेष्टा विद्या शौर्य्यादि उद्दीपन,
आलिंगन, स्पर्श, चुम्बन, पुलकादि आनंद अनुभाव,
अनिष्टकी आशंका, हर्ष, गर्व, संचारीभावहैं कमलके गर्भके
समान वर्ण लोकमाता ये देवता हैं ।
इसके आगे काव्यकी ध्वनि व्यंजना लक्षणका विस्तार
होताहै परन्तु हम सतसईमात्रका विषय संक्षेपसें दिखाते हैं
इनके आलम्बन नायकादि हैं उनको कहते हैं त्यागी, कृती,
कुलीन, लक्ष्मीसम्पन्न रूप यौवनसे युक्त उत्साहवान्, चतुर,
अनुरक्त, शीलवान, नेता यह नायकके लक्षण हैं, धीरोदात्त,
धीरोद्धत, धीरललित, धीरप्रशान्त नायकके यह चार भेद हैं
अपनी बड़ाई न करनेवाले क्षमावान् गंभीर महाबली दृढ-
प्रतिज्ञ धीरोदात्त हैं यथा राम युधिष्ठिरादि ।
मायावी चपल अहंकारदंभसे युक्त अपनी बड़ाई करने-
वाला धीरोद्धत है, यथा भीमसेनादि निश्चिन्त मृदुकलामें