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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

( ११४ ) सतसई-सटीक ।
नेको उहि न जुदी करी, हरष जु दी तुम माल।
उरते वास छुटो नहीं, वास छुटेहूं लाल ॥ ३३८॥
जो माला तुमने प्रसन्न होकर उसे दी उसे उसने क्षणमात्र
कोभी हृदयसे अलग न किया, हे लाल ! उसकी सुगंधि
जातीरही परन्तु हृदयसे उसका वास न छूटा। यमक॥३३८॥
मोहिं भरोसो रीझिहैं, उझक झांकि इकबार ।
रूप रिझावनहार यह, ये नैना रिझवार ॥३३९॥
मुझे भरोसा है कि, तू एकहीबार उझककर झाँकेगी
तो रीझैगी अर्थात् एकबार तू खिडकीमें झांककर तो देख
उनका रूप रिझानेवाला है, और तेरे नेत्र रीझनेवाले हैं।
समालंकार ॥ ३३९ ॥
ल्याई लाल विलोकिये, जियकी जीवनमूल ।
रही भौनके कोनमें, सोनजुहीसी फूल ॥३४०॥
हे कृष्ण ! मैं लेआईहूं चलकर अपनी जीवनमूलको
देखिये वह भवनके कोनेमें सोनजुहीसी फूल रही है।
उपमा ॥ ३४० ॥
नहिं हरिलों हियरा धरो, नहिं हरलों अरधंग ।
एकतहीं करि राखिये, अंग अंग प्रतिअंग ३४१॥

चतुर्थशतक ४. ( ११५ )
हे कृष्ण ! न तो विष्णुके समान उसके हृदयपरही लक्ष्मी
के समान रक्खो न शिवके समान अर्धांग धारण करो
किन्तु उसके अंग अंग अपने अंग अंग मिला रखिये । दूपणो-
पमा ॥ ३४१ ॥
रही पैज कीन्ही जु मैं, दीन्ही तुम्हें मिलाय ।
राखो चम्पकमालसी, लाल हिये लपटाय ॥ ३४२ ॥
जो मैंने पैज की थी सो पूरी की, तुम्हें मिलादिया हे लाल!
अब चम्पकमालासी हृदयमें लगाकर इसे रक्खो । उपमेय-
लुप्तालंकार ॥ ३४२ ॥
कैबारावत यहि गली, रहे चलाय चलैन ।
दरशनकी साधे रही, सूधे रहत न नैन ॥ ३४३ ॥
हेप्यारी ! मैंने उन्हें कईवार इस गलीमें आते देखा चलने
की इच्छा करें पर न चलें दर्शनकी अभिलाषा करते हैं इस
कारण नेत्र सूधे नहीं रहते आशय यह कि, जब वह गलीमें
आते हैं तब तो सूधे नेत्र मन्दिरके सन्मुख लगे रहते हैं और
जब मंदिरसे आगे चलते हैं तब मंदिरकी ओर होजाते हैं ।
हेतु अलंकार ॥ ३४३ ॥
स्वप्नदर्शन ।
देख्यो जागत वैसिये, सांकर लगी कपाट ।
कित ह्वै आवत जातभाजि, को जाने केहि बाट ३४४

( ११६ ) सतसई-सटीक ।
जागतेहुए देखा कि, किवाँड़में वैसीही साकर लगी है
कौन जाने किधर होकर आते हैं और किस मार्गसे भगजा-
तेंहैं । विभावना ॥ ३४४ ॥
सुखसों बीती सब निशा, मनु सोये इकसाथ ।
मूकामेलि गह्योजु छिन, हाथ न छोड़त हाथ ३४५
सारी रात सुखसे बीती मानो एकसाथही सोये हैं मूके में
डालकर हाथ जो पकड़ा सो एक क्षणमात्रको भी नहीं छोड़ा
मूका-मोखा भट्ठा अथवा स्वम उनको देखतेमें सुखसे सब
रात बीती मानों एक साथही सोये हैं अपने हाथसेही जो
अपना हाथ पकड़ा उसे उनका जानकर एक क्षणमात्र को न
छोड़ा । उत्प्रेक्षा ॥ ३४५ ॥
दुचितैचितहलतिन चलति, हँसतिनझुकतिविचारि
लिखितचित्र पियलखिचितै, रही चित्रलों नारि॥
चित्त दुचिताईमें होरहा है न हलती है न चलती है न
हँसती है न विचारकर क्रोध करती है प्रीतमको चित्र लिख-
ता देख प्यारी स्वयं चित्रके समान होगई दुचितै मन इस
कारण है कि,मेरी मूर्ति लिखै हैं वा अन्यकी हलने चलनेकी
आहट होगी इसकारण नहीं हिलती अपनीही है यह निश्चय
न होनेसे हँसती नहीं, और दूसरीकी कदाचित् न हो यही
विचार क्रोध नहीं करती । संशयालंकार ॥ ३४६ ॥

चतुर्थशतक ४. (११७)
कर मूँदरीकी आरसी, प्रतिबिम्बो पिय आय।
पीठ दिये निधरक लखै, इकटक दीठिलगाय ३४७
हाथकी अँगूठीकी आरसीमें प्रीतमका प्रतिबिम्ब आनकर
पड़ा उसको पीठ दिये निधड़क इकटक दृष्टि लगाये देख-
रही है। प्रहर्पणालंकार ॥ ३४७ ॥
ध्यान आनि ढिग प्राणपति, मुदित रहत दिनरात।
पल कम्पित पुलकत पलक, पलक पसीजत जात
प्राणपतिको ध्यानमें ही अपने निकट लाकर दिनरात
प्रसन्न रहती है पलमें पुलकायमान होती काँपती और पलमें
पसीजती है। स्मृति अलंकार ॥ ३४८ ॥
पियक ध्यान गही रही, रही वही ह्वै नारि।
आपआपही आरसी, लखिरीझतिरिझवारि ३४९॥
प्रीतमका ध्यान धर धरकर वह स्त्री आप ही आप हो-
कर रही और वह रिझवार आपही अपनी आरसी को देख
रीझने लगी। तद्गुणालंकार ॥ ३४९ ॥
लाल तिहारे रूपकी, कहो रीति यह कौन।
जासों लागे पलकदृग, लागत पलक पलौ न ३५०
हेलाल! कहोतो तुम्हारे रूपकी यह कौनसी रीति है जिस

( ११८ ) सतसई-सटीक ।
जिससे एक पल नैन लगते हैं उसकी पलक फिर एक
पलको नहीं लगती । विरोधाभास ॥ ३५० ॥
अपनी गरज न बोलियत, कहा निहोरोतोहि ।
तू प्यारो मो जीयको, मोजी,प्यारो मोहि॥ ३५१ ॥
अपनी गरजसे बोलते हैं इसमें मरा क्या निहोरा है तुम मेरे
जीके प्यारेहो और तुम्हें मेरा जी प्याराहै। काव्य लिंग ३५१
तोही निरमोही लग्यो, मोही यहै सुभाय ।
अन आये आवै नहीं, आये आवत आय ३५२
तुम्हारा मन निर्मोही है, तुमसे मेरा मन लगगया है
मेरे मनका यह स्वभाव हुआ कि, तुम्हारे पास रहकर विना
तुम्हारे आये नहीं आता, और आनेसे आता है इससे
तुम आओ । यमक ॥ ३५२ ॥
छुटन न पैयत क्षणकवश, नेहनगर यह चाल ।
मारे फिर फिर मारियत,खूनी फिरत खुसाल ३५३
नेहनगरकी यह चाल है कि, इससे एक क्षणको छुटका-
रा नहीं होता, मरा हुआ फेर फेरकर मारा जाता है और
मारनेवाला प्रसन्न फिरताहै । असंगति ॥ ३५३॥
निरदय नेह नयो निरखि, भयो जगत भयभीति।
यह अबलों न कहूं सुनी, मरे मारियत भीति ३५४

कानन-वन । आनन-मुख । आन-सौगंध । यमक
Wait, between "रहती हैं" and "कानन-वन":
Is there a space? "रहती हैं कानन-वन । आनन-मुख । आन-सौगंध । यमक"

और वीप्सा ॥ ३५५ ॥

बहके सब जियकी कहत, ठौर कुठौर गिनै न ।
Wait, "कहत,ठौर" or "कहत, ठौर"? There is a small gap: "कहत,ठौर" or "कहत, ठौर".
"गिनै न ।"

छिन औरै छिन औरसे, भेछविछाके नैन ३५६
Wait, let's re-examine "भेछविछाके":
Look at the first character:
Is it 'भ' + 'े' = भे?
Wait, look at 'भ': it has a circle at top left, vertical line, loop... wait!
Could it be 'ए'?
"ए छविछाके नैन"?
WAIT!
Look at the character before 'छविछाके':
Is it 'ए'?
No, look at 'ए' in 'औरै' or 'ए' anywhere:
Wait, look at 'भ' in 'भयभीत' (L2): 'भ' has a loop at top left.
Now look at the letter in L12:
It has

( १२० ) सतसई-सटीक ।
हो हाथ पसीजते हैं इससे तुम उठजाओ तो महँदी सूखे ।
हेतु विकृति० ॥ ३५७ ॥
चितवनि रूखे दृगनिकी, हाँसी बिन मुसिकान ।
मान जनायो माननी, मानलियो पियजान ३५८
सूखे नेत्रोंकी चितवन और बिनमुसकानकी हांसीसेही
प्रीतमको माननीने मान बताया, और चतुर प्रीतमने जान-
लिया। लाटानुप्रास ॥ ३५८ ॥
पति ऋतु अवगुण गुणबढत, मान माँहको शीत।
जात कठिनहै अतिमृदौ,रमणीमननवनीत ३५९
पतिके अवगुणसे मान और ऋतुके गुणसे माहका शीत
बढता है रमणीका मन और मक्खन अति कोमलहैं तथापि
कठिन हो जाता है। दृष्टान्तरूपक ॥ ३५९ ॥
वाही निशितें ना मिटो, मान कलहको मूल ।
भले पधारे पाहुने, है गुडहरको फूल ॥ ३६० ॥
उसी रातसे क्लेशका मूल मान नहीं मिटा गुडहरके फूल
के समान हाकर पाहुने भले पधारे हैं आशय यह कि, रात-
को कहीं और रहकर सबेरेको रतिचिह्नसे युक्त माथेपर
महावर पलकों में पीकादि लगाकर प्रीतमआये इस कारण

चतुर्थशतक ४. ( १२१ )
गुडहरका फूल कहा है कि, जहां यह रहता है वहां क्लेश
रहता है। वाचकलुप्ता लोकोक्ति ॥ ३६० ॥
खरे अदब अठिलाहटी, उर उपजावत त्रास ॥
दुसहशंक विषकी करै, जैसे सोंठमिठास ॥ ३६१ ॥
प्यारीका सभ्यतासे इठलानाभी मेरे मनमें दुःख उपजाता
है जैसे सोंठका मिठास विषकी दुःसह शंका उत्पन्न करताहै
सोंठका मिठास विषयुक्त जानना। दृष्टान्त ॥ ३६१ ॥
दोऊ अधिकाई भरे, एक गो गहराय ॥
कौन मनावै को मनै, मानै मति ठहराय ॥ ३६२ ॥
दोनों पियप्यारे गर्वभरे एकही गाँकी बात करते हैं कौन
मनावै कौन मनै जब इनकी मति ठहरावेगी तब आपही मनेंगे
प्रणयके कलहको मान कहते हैं। काव्यलिंग ॥ ३६२ ॥
हाँसि हँसाय उर लाय उठि, कहिन रुखाहैं वैन।
जकित थकितसे ह्वैरहे, तकत तिरीछे नैन ॥ ३६३ ॥
हँसकर हँसाकर उसे हृदयसे लगाय उठ रूखे बचन
मत कहे इत जकड़े और थकेसे होकर मेरे तिरछे नेत्रोंको
प्रीतम देखते हैं। वृत्त्यनुप्रास ॥ ३६३ ॥
मान करत बरजत नहीं, उलट दिवावत माँह।
करै रिसौहीं जायगी, सहजहँसाहीं भौंह ॥ ३६४ ॥

( १२२ ) सतसई-सटीक ।
मान करतेमें बरजती नहीं और उलटी सौंह दिवाती है
क्या तुम यह स्वभावसे हँसौही भौंहें रिसभरी करेही जाओगी
मान दृढ करनेको सखीने यह वचन कहे । काकोक्ति छे-
कानुप्रास ॥ ३६४ ॥
जो चाहत चटक न घटै, मैलो होय न मित्त ।
रज राजस न छुवाइये, नेह चीकने चित्त ॥ ३६५॥
हे मित्र ! जो तुम चाहो कि, प्रेमकी चमक न घटै और मित्र
का मन अप्रसन्न न हो तो नेहसे चिकने हुए चित्तमें रजोगुणकी
धूरि मतछुवाओ आशय यह कि प्रीतमपर आज्ञाबल मतचला
ओ श्लेषालंकार ॥ ३६५ ॥
सोंहैंहूं चाह्यो नतैं, किती दिवाइ सौंह ॥
एहो क्यों बैठी किये, ऐंठी ग्वैंठी भौंह ॥ ३६६॥
तैने मानसे प्रीतमके सन्मुखभी न देखा, मैंने कितनी सौ-
गंधभी दिवाई, फिर अब क्यों टेढी गठीली भौंहकिये बैठी है।
वृत्यनुप्रास ॥ ३६६ ॥
खरी पातरी कानकी, कौन बहाऊवानि ॥
आककलीन रलीकरे, अली अली जियजानि ३६७
हे सखी ! तू कानकी बहुत हलकी है जो कोई बात कहै
उसे तू मान जाय है इस तेरी बान स्वभावमें बहाऊँ हे आली

चतुर्थशतक ४. ( १२३ )
तू अपने मनमें विचार करले कि, भौंरा आककी कलीसे
विहार नहीं करता है नायकको अन्यसे रति करनेवाला जान
प्यारीने मान किया इसपर सखीने समझाया । छेकानुप्रास
जमक ॥ ३६७ ॥
तो रस राच्यो आन वश, कहै कुटिल मति क्रूर॥
जीभ निबौरी क्यों लहै, बौरी चाख अँगूर ३६८॥
वह तो तेरे रसमेंही रँगरहे हैं उन्हें औरके वश किसी खोटे
मतिवाले क्रूरने कहा है यह सत्य मत जाने, हे बावरी ! जिसने
अंगूर खाये हैं इसकी जीभमें निबोली क्यों भावेगी । न्यासा-
लंकार ॥ ३६८ ॥
गहिरी गरब न कीजिये, समय सुहागहि पाय ॥
जीकी जीवन जेठलों, माह छांह सुहाय ३६९
हे मानिनी ! समय समय सुहाग पाकर बहुत मान मत
करो जेठ महीनेकी जीकी जीवनछाया माहमें अच्छी नहीं
लगती गहरी-वा गहली-मानिनी । दृष्टान्तालंकार ॥ ३६९॥
बहकि बड़ाई आपनी, कत राचत मतिभूल ।
बिनमधु मधुकरके हिये, गड़े न गुड़हरफूल ३७०
बहककर अपनी बड़ाईसे हे मतिभूल ! क्यों प्रसन्न होती
है तू सुन्दरी है परन्तु उसके विना भौंरेके हृदयमें गुड़-

( १२४ ) सतसई-सटीक ।
हरका फूल नहीं भाता ‘अथवा यह मतिकी भूल है जो
अपनी बड़ाईसे प्रसन्न होय है माननीके निकट सौत प्रसन्न
हो आकर बैठी थी उसपर सखीने कहा’ अथवा मूर्खोंमें अपनी
बड़ाईसे प्रसन्न होनेपर । अन्योक्ति ॥ ३७० ॥
अनियारे दीरघनयन, किती न तरुणिसमान ।
वह चितवनि औरेकछू, जिहिंवशहोतसुजान ३७१
नोकीले और दीर्घनेत्रोंकी कितनी एक स्त्री; समान होती
है परन्तु जिसके वश चतुर होते हैं वह चितवन कुछ औरही
है । भेदकातिशयोक्ति ॥ ३७१ ॥
हाहा वदन उघार दृग, सफल करै सब कोय ।
रोज सरोजनके परै, हँसी शशीकी होय॥३७२॥
रात्रिके समय दूतीने प्यारीसे कहा, हा कष्ट! अथवा हाहा
खाऊं तनक मुख तो उघार सबही कोई अपने नेत्र सफल करें
तेरे मुख उघाडनेसे कमलोंको शोक होगा और चन्द्रमाकी हँसी
होगी आशय यह है कि, तेरे मुखचंद्रसे कलंकित चंद्र हास्य
को प्राप्त होगा कमल कुँभिलायेंगे तेरा मान छूटनेसे मुख
उघडेगा तो यह सब वार्ता होंगी ॥ ३७२ ॥
कहालेहुगे खेलमें, तजौ अटपटी बात ।
नेक हँसौहीं है भई, भौंहैं सौहें खात ॥ ३७३ ॥

चतुर्थशतक ४. (१२५)
खेलमें क्या लोगे अपनी अटपटी बात छोडो मेरे शपथ
करते करते प्यारीकी भौंहें कुछ हँसौहीं हुई हैं आशय यह
कि, प्रीतम मनाने आये तो दूसरीकाही नाम निकल गया
इससे फिर प्यारी रूठी इसपर सखीने हँसीमें डालकर
कृष्णसे कहा ये चिढानेकी बातें छोडदो। हेतु ॥ ३७३ ॥
चलो चले छुटिजायगो, हठि रावरो सँकोच।
खरे बढाये होत अब, आये लोचन लोच ॥ ३७४॥
हे प्रीतम ! चलो तो आपके चलनेसे सब हठ छुटजायगी
तुम्हारे संकोचसे जो अति चढायेथे वे नेत्र अब नरमीपर आये
हैं अर्थात् इस समय कुछ क्रोध न्यून हुआ है चलनेका समय
है शीघ्र चलो ॥ ३७४ ॥
अनरसहूँ रस पाइये, रसिक रसीली पास ।
जैसे साँठेकी कठिन, गाँठें भरी मिठास ॥३७५॥
हे प्रीतमरसिक ! उस रसीलीके पास चलनेसे अनरसमें
भी रस पाओगे जैसे गन्नेकी गांठ कठिन है परन्तु मिठासमें भरी
है आशय यह कि, उसका मानभी देख प्रसन्न होगे। दृष्टान्ता-
लंकार ॥ ३७५ ॥
क्यौंहूँ मंत्र बात न लगे, थाके भेद उपाय ॥
हठ दृढ गढबैठी सुकवि, लीजे सुरंग लगाय॥ ३७६

( १२६ ) सतसई-सटीक ।
किसी प्रकारकी हमारी बलकी बात नहीं लगती, हम
भेद और उपायसे हारगईं, वह दृढ हठ किला ग्रहण कर बैठ-
गई है उसे सुरँग लगाय कर लीजे। भेद-साम दाम दण्ड भेद
यह चार हैं ॥ ३७६ ॥
सकत न तब ताते वचन, मो रसको रस खोय ।
क्षण क्षण औटे क्षीरलौं, खरो सवादल होय ३७७॥
शठ नायकका वचन अधीरा माननी नायकासे, तेरे तत्ते
वचन मेरे अनुरागके स्वादको नहीं दूर करसकते मेरा प्रेम
क्षण क्षणमें औटे दूधके समान अति स्वादिष्ट होता है अर्थात्
मानिनी उसको दुर्वचन कहती है और वह उसको सुन प्रसन्न
होताहै। उपमालंकार ॥ ३७७ ॥
सकुचि न रहिये श्याम सुनि, यह सतरोहे वैन ।
देत रचैाहे चित कहैं,नेह नचौहे नैन ॥ ३७८ ॥
हे श्याम ! यह सतरोहे क्रोधके वचन सुनकर संकोचित
होकर न रहिये, प्रेमसे रंगे नेत्रही कहेदेते हैं कि, चित्त प्रेमसे
रच रहा है ॥ ३७८ ॥
आये आप भली करी, मेटन मान मरोर ।
दूर करो यह देखि है,छला छिगुनियां छोर ३७९॥
आप मानकी मरोर मेटने को आये यह बहुत अच्छी करी

चतुर्थशतक ४. (१२७)
परन्तु यह जो किसी अन्य प्रियाका छल्ला अपने हाथकी कन
उँगलीके छोरमें पहर आये हो इसे दूर करो नहीं तो प्रिया
इसको देखेगी तुम्हारा होता तो उँगलीमें भर आता। विष-
मालङ्कार ॥ ३७९ ॥
सीरे जतननि शिशिरऋतु, सहि विरहिन तनु ताप।
बसनेको ग्रीषमदिनन, परो परोसिन पाप॥३८०॥
प्रोषितपतिकाकी दशा वर्णन, हे कृष्ण ! अगहन पूसके
दिनोंमें शीतल उपचारोंसे वियोगिनीके शरीर की अग्नि सहन
करली अब ग्रीष्म ज्येष्ठ आपाढके दिनोंमें परोसियोंको नि-
वास करनेको दुःख पड़ा है। अयुक्तालंकार, शिशिरऋतु
पूस माह ॥ ३८० ॥
आडे दै आले वसन, जाडेहूकी रात ।
साहस कैकै नेहवश, सखी सब ढिग जात॥३८१॥
जाडेकी भी रातमें बीचमें गीले कपडेकी आडकर प्रेमके
मारे बडा साहस करके सब सखी, उसके निकट जाती हैं
अर्थात् उसके तनुकी विरहाग्निसे जलीजाती हैं । अयुक्त्य-
लंकार ॥ ३८१ ॥
औंधाई सीसी सुलखि, विरहबरी विल्लात ।
बीचै सूख गुलाब गो, छींटो छुई न गात ॥३८२॥

( १२८ ) सतसई-सटीक ।
हे प्रीतम! एक सखीने जो उलट कर सीसी उसके शिरपर
डाली अर्थात् विरहसे विकल हो विद्धाते हुए सीसी लुढकाली
बीचमेंही गुलाब सूखगया उसके शरीरमें छींट भी न लगी ।
अयुक्तालंकार ॥ ३८२ ॥
जेहि निदाघ दोपहर रहै, भई माघकी रात ।
तेहि उशीरकी रावटी, खरी आवटी जात ३८३॥
जेठकी दुपहरी जिस खसकें बंगलेमें माघकी रात हुईरहै
उस खसके बंगलेमें वियोग अग्निके मारे वह अत्यन्त औटा
जाता है, एक विरह और दूसरी खसकी रावटी यह दोनों
उद्दीपन हैं । विभावना छेकानुप्रास ॥ ३८३ ॥
विकसित नववल्लीकुसुम, निकसत परिमल पाय ।
परसिय जारति विरह हिय, बरसिरहेकी बाय ३८४
यद्यपि खिलते हुए नई बेलके फूलोंको परसकर सुगंधित
हो निकलती है, और बरसेके पीछेकी शीतल पवनभी है
तथापि स्पर्श करते ही विरही जनोंके हृदयको जलाती है
बरसनेसे शीतल पुष्पोंमें लगनेसे सुगंध और बेलोंके पत्तोंमें
रुककर आनेसे मन्द है । हेतु अलंकार ॥ ३८४ ॥
विरहबरी लख जोगनन, कह्यो सो उहि कैबार ॥
अरी आव भज भीतरे, बरसत आज अँगार ३८५

चतुर्थशतक ४. ( १२९ )
विरहज्वरीने पटबीजनोंको देखकर कँवार यह बात सखी
से कही अरी आउ, भजिया आज अँगारे भीतरही बरसते हैं।
भ्रान्ति अलंकार ॥ ३८५ ॥
धुरवा होय न अलि उठे, धुआँ धरनि चहुँ कांद ।
जारत आवत जगतको, पावस प्रथम पयोद ३८६
हे सखी ! यह बादल नहीं है पृथ्वीके चारों ओर धुआँ
उठरहा है यह श्रावणका पहला मेघ जगतको जलाता आता
है । अपह्नुति ॥ ३८६॥
पावक झरतैं मेहझर, दाहक दुसह विशेषि ।
दहै देह वाके परश, याहि दृगनकी देखि ॥ ३८७॥
हे सखी ! अग्निकी झरसे मेघकी झर विशेषकर दुःखद
जलानेवाली है; उसके छूनेसे देह जलना है इसके तो नेत्रोंके
देखनेही जलता है। व्यतिरेक यमक ॥ ३८७ ॥
मार सुमार करी खरी, अरी मरीहि न मारि ।
सींचि गुलाब घरी घरी, अरी बरीहि न वारि ३८८
एक तो कामने तीक्ष्ण मार करके इसे अति व्याकुल
किया है दूसरे तू घड़ी घड़ी गुलाब छिड़ककर बलतीहुई
को मत बालि 'मरीहि न मारि' इस प्रकार मरी हुई को मत
मारि। वृत्यनुप्रास यमक ॥ ३८८ ॥

( १३० ) सतसई-सटीक ।
अरे परे न करै हियो, खरे जरेपर जार ।
लावत घोरि गुलाबसो, मलय मिलै घनसार ३८९
अरे इसे परे क्यों नहीं करता, अति जले हुए हृदयको
क्यों जलाता है जो गुलाबसे मिला चन्दन और कपूर घोल
कर लाता है आशय यह कि, एक तो मैं विरहसे जलूंहूं दूसरे
यह उद्दीपन पदार्थ औरभी दुःख देते हैं। विषमालंकार ३८९
कौन सुनै कासों कहौं, सुरत बिसारी नाह ।
बदा बदी जिय लेत है, ए बदरा बदराह ॥३९०॥
मेरा दुःख कौन सुनै मैं किससे कहूं प्रीतमने सुरत बिसार
दीहै, होड़ा होड़ी करके यह कुचाली बादल मेरा जी लेते हैं;
कारण यह कि, कुपथगामी निर्दयी होते हैं, यह निर्दयीही
मेरा जी लेते हैं । जमकालंकार ॥ ३९० ॥
फिर सुधि दै सुधि द्याइये, यह निरदई निरास
नई नई बहुरौं दई, दई उसास उसास ॥ ३९१ ।
फिर सुधि देकर इस निर्दयी निराशने प्रीतमकी या
दिलाई फिर इसने नई नई सांस उकासदीहैं। वीप्सा जमक
अलंकार ॥ ३९१ ॥
बन बाटन पिक बटपरा, तकि विरहिन मत मैन ।
कुहो कुहो कहि कहि उठत, करि करि राते नैन॥

चतुर्थशतक ४. ( १३१ )
कामदेवकी ओरका पिकरूपी बटमार वनके मार्ग में
विरहियोंको देखकर लाल आँख करके कुहो कुहो कह
उठता है । रूपकालंकार ॥ ३९२ ॥
दुसहविरह दारुणदशा, रही न और उपाय ।
जात जात जिय राखिये,पियकी बात सुनाय ३९३
दुसह विरहकी दारुण दशामें अब और उपाय नहीं रहा
प्रीतमकी बात सुनाकर जाते जाते जियको राखिये । पर्या-
योक्ति ॥ ३९३ ॥
कहे जु वचन वियोगिनी,विरहविकल अकुलाय।
कियेनको अँसुआंसहित, सोवत बोल सुनाय ॥
उस वियोगिनीने जो विरहसे व्याकुलहो चिल्लाकर वचन
कहे हैं उनको सोनेको जातेमें सुनाकर किसको आंसूंसहित
नहीं किया अर्थात् उसके शयन समय उसके दुःखकी कथा-
को सुनकर सब रोने लगते हैं ॥ ३९४ ॥
सोरठा-मैं लखि नारीज्ञान,करराख्यो निर्धार यह
वहई रोगनिदान, वहै वैद्य औषधि वहै ॥३९५॥
मैंने उसकी नाड़ी देखकर ज्ञानसे यह निश्चय कररखा है
वही इसके रोगका निदान ( आदि कारण ) वही वैद्य और
वही औषधि है अर्थात् वह मिलै तो रोग जाय। हेतु॥३९५॥

( १३२ ) सतसई-सटीक ।
विरहसुखाई देह, नेह कियो अति डहडहो ।
जैसे बरसे मेह, जरै जवासा जर जमै ॥३९६॥
वियोगने देह सुखारक्खी है प्रीतिने डहाडहा कररक्खाहै
जिस प्रकार मेघ बरसनेसे जवासा सूखताहै परन्तु उसकी जड़
डहडही होतीहै । दृष्टान्त ॥ ३९६ ॥
दो०-कहाभयो जो बीछुरे,मों मन तो मन साथ।
उडीजात कितहू गुडी,तऊ उडायक हाथ ३९७॥
क्या हुआ जो इस समय हम बिछड़तेहैं मेरा मन तो तुम्हारे
साथहै कनकैया किधरकोही उड़ै परन्तु उड़ानेवालेकेही
हाथमें रहतीहै । दृष्टान्तालंकार ॥ ३९७ ॥
विरहविथा जल परसबिन,बसियत मो जियताल।
कछु जानत जलथमनविधि, दुर्योधनलों लाल ॥
विरहकी विथाके जलको स्पर्श किये बिना मेरे जीरूपी
सरोवरमें आप निवास करते हो हेलाल ! क्या आप दुर्योधन
के समान कुछ जलथंभनविधि जानतेहो जिससे मेरे मन-
रूपी सरोवरकी विरहविथा तुमको नहीं व्यापती । पूर्णो-
पमा ॥ ३९८ ॥
सोरठा।
पावसकठिन जु पीर, अबला क्योंकर सहिसकै।
तऊ धरत न धीर,रक्तबीजसम अवतरै ॥३९९॥

चतुर्थशतक ४. (१३३)
वर्षाऋतुकी कठिन पीड़ाको अबला किसप्रकार सहन
करसकती है इसमें तो उनकाभी धीर नहीं रहता जिनका रक्त
और बीज समान ( नपुंसक ) है स्त्रीका रज थोड़ा
पुरुषका वीर्य अधिक होनेसे पुरुषवीर्य न्यूनहोनेसे कन्या
समान होनेसे नपुंसक होताहै। दृष्टान्त ॥ ३९९ ॥
बिजुरा जनु मेह, आन यहां विरहा घरे ।
आठों यामअछेह, दृग जु बरत बरसत रहत४००
बिजलीके साथमें मेघ लाकर मानों विरहने यहाँ रख
दियाहै जो निरन्तर आठों पहर नेत्र बलते और बरसते रहते
हैं। वस्तूत्प्रेक्षालंकार ॥४००॥
इति श्रीकविवर बिहारीलालकी सतसईमें भाषाटीकासहित
चतुर्थ शतक पूर्ण हुआ ॥४॥
सोरठा ।
कौडा आंसुबूंद, करि सांकर बरुनी सजत ।
कीने वदनहि मूंद, दृग मलंग डोर रहत॥४०१॥
आंसुओंकी बूंद बड़ी कौड़ी किये जलमदिन बरनियोंकी
शृंखलामें कसकर मुख बंदकर नेत्ररूपी नटवाजी डोर पर
रहते अर्थात् लटकतेहैं बड़ी आंखको कौड़ीसी आंख और बड़े