सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 290 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 170

चतुर्थशतक ४. (११७)
कर मूँदरीकी आरसी, प्रतिबिम्बो पिय आय।
पीठ दिये निधरक लखै, इकटक दीठिलगाय ३४७
हाथकी अँगूठीकी आरसीमें प्रीतमका प्रतिबिम्ब आनकर
पड़ा उसको पीठ दिये निधड़क इकटक दृष्टि लगाये देख-
रही है। प्रहर्पणालंकार ॥ ३४७ ॥
ध्यान आनि ढिग प्राणपति, मुदित रहत दिनरात।
पल कम्पित पुलकत पलक, पलक पसीजत जात
प्राणपतिको ध्यानमें ही अपने निकट लाकर दिनरात
प्रसन्न रहती है पलमें पुलकायमान होती काँपती और पलमें
पसीजती है। स्मृति अलंकार ॥ ३४८ ॥
पियक ध्यान गही रही, रही वही ह्वै नारि।
आपआपही आरसी, लखिरीझतिरिझवारि ३४९॥
प्रीतमका ध्यान धर धरकर वह स्त्री आप ही आप हो-
कर रही और वह रिझवार आपही अपनी आरसी को देख
रीझने लगी। तद्गुणालंकार ॥ ३४९ ॥
लाल तिहारे रूपकी, कहो रीति यह कौन।
जासों लागे पलकदृग, लागत पलक पलौ न ३५०
हेलाल! कहोतो तुम्हारे रूपकी यह कौनसी रीति है जिस