बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ११८ ) सतसई-सटीक ।
जिससे एक पल नैन लगते हैं उसकी पलक फिर एक
पलको नहीं लगती । विरोधाभास ॥ ३५० ॥
अपनी गरज न बोलियत, कहा निहोरोतोहि ।
तू प्यारो मो जीयको, मोजी,प्यारो मोहि॥ ३५१ ॥
अपनी गरजसे बोलते हैं इसमें मरा क्या निहोरा है तुम मेरे
जीके प्यारेहो और तुम्हें मेरा जी प्याराहै। काव्य लिंग ३५१
तोही निरमोही लग्यो, मोही यहै सुभाय ।
अन आये आवै नहीं, आये आवत आय ३५२
तुम्हारा मन निर्मोही है, तुमसे मेरा मन लगगया है
मेरे मनका यह स्वभाव हुआ कि, तुम्हारे पास रहकर विना
तुम्हारे आये नहीं आता, और आनेसे आता है इससे
तुम आओ । यमक ॥ ३५२ ॥
छुटन न पैयत क्षणकवश, नेहनगर यह चाल ।
मारे फिर फिर मारियत,खूनी फिरत खुसाल ३५३
नेहनगरकी यह चाल है कि, इससे एक क्षणको छुटका-
रा नहीं होता, मरा हुआ फेर फेरकर मारा जाता है और
मारनेवाला प्रसन्न फिरताहै । असंगति ॥ ३५३॥
निरदय नेह नयो निरखि, भयो जगत भयभीति।
यह अबलों न कहूं सुनी, मरे मारियत भीति ३५४