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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

जीवनचरित्र । ( १५ )
के निमित्त झगड़ा किया, इससमय प्रजाको बड़ी कठिनाई
पड़ी थी कदाचित् इसीसमय कविवरने यह दोहा कहाहै ।
दोहा-दुसह दुराज प्रजानको, क्योंनबाढ़ै दुखद्वंद ।
अधिक अँधेरोजगकरै,मिलिमावसरविचंद॥
फिर राज्यकी पलटसे गुणगाहक न रहनेके कारण कवि-
वरने वहां रहना उचित न जाना कदाचित् ऐसेही प्रसंगपर
नीचे लिखा काव्य कियाहो ।
दोहा-चलेजाहु ह्यां को करत,हाथिनकोव्यवहार।
नहिं जानत ह्यां वसत हैं,धोबी और कुम्हार
जिन दिन देखे वे कुसुम, गई सुबीत बहार ।
अब अलि रहीगुलाबकी,निपटकटीलीडार
कहते हैं कि, यही विचार कविवर वहांसे कृष्णकविको
साथले मारवाड़की ओर चलेगये, उससमय दरबारमें इनके
दोहोंका अर्थ होता था,विद्वानोंने कई२ प्रकारसे अर्थ किये थे
विहारीलालने देखा कि,अपना परिचय अब देना ठीक नहीं
कारण कि, इससे अधिक और अर्थ अब हम क्या करेंगे,
मारवाड़के विषयमें उन्होंने कहा है ।
दोहा-विषमवृपादिकीकृपा,जियैमतारनिशोधि
अमितअपारअगाधजल, मागोमूँढ़ पयोधि

( १६ ) बिहारीलालजीका-
प्यासे दुपहरजेठके, थके सबै जल शोधि ।
मरु घर पाय मतीरही, मारू कहतिपयोधि ॥
बिहारीलाल तत्कालभी प्रसंगानुसार दोहा निर्माण कर-
ते थे कोई चित्रकार एक वृक्षके नीचे अहि मयूर मृग बाघ
बनाकर लाया महाराज जयसिंहने बिहारीलालसे यह प्रसंग
पूँछा तब कविवरने कहा ।
दोहा-कहलाने एकतवसत, अहि मयूर मृगबाघ।
जगत तपोवनसोकियो, दीरघदाघनिदाघ॥
जब जयसाह इस संसारको त्यागगये तब इन कविवरका
चित्त शृंगाररसकी ओरसे खिंचगया और नीति उपदेश
आदिके दोहे निर्माणकर संवत् १७१९ में उन्होंने सतसई
पूर्ण करदी ।
अन्य कवीश्वरोंकी भांति बिहारीलालने अपने महाराजकी
लम्बी चौड़ी प्रशंसा न करके राधाकृष्णके गुणानुवादमें विशेष
कविता निर्माण की है, इसमें कुछभी सन्देह नहीं कि, अन्तके
जीवनके दिन उन्होंने भगवद्भजनमेंही व्यतीत किये इसके
प्रमाणके निम्नलिखित दोहे हैं ॥
दोहा-अपने २ मत लगे, वादि मचावत शोर ।
ज्यों त्यों सबको सेइबो, एकै नंदकिशोर॥

जीवनचरित्र । ( १७ )
मोहिं तुम्हें बाढी बहस, को जीते यदुराज।
अपने २ विरदकी, दुहूँ निबाहन लाज ॥
आगे कितने समयतक कविवर इस संसारमें रहे सो
विदित नहीं होता सतसई क्रमानुसार नहीं लिखीगई यह
फुटकर दोहे भिन्न समयमें भिन्न २ विषयक कथन हुए हैं
पीछे जब ग्रन्थ दुर्लभसा होने लगा तब रसिकजनोंने अपनी
इच्छानुसार इसको शृंखलाबद्ध किया और किसी किसीने
टीकेभी निर्माण किये यद्यपि इसपर बीस पच्चीस टीका हुई हैं
परन्तु प्राचीन टीकाओंमें सूरतमिश्रकी टीका सराही-
जाती है ।
यद्यपि कविवरका पूर्ण वृत्तान्त अलभ्य हे परन्तु इसके
न मिलनेसे कोई विशेष क्षति नहीं है उनका एक दोहाभी
जबतक भूमण्डलमें रहेगा तबतक उनका गौरव और
कीर्त्ति संसारमें विद्यमान रहेगी इसकारण अधिक विस्तार न
करके इतनेहीमें कविकी जीवनी पूर्ण करते हैं ।
पण्डित-ज्वालाप्रसादमिश्र.

साहित्यपरिचय ।
सतसईमें साहित्यविषयक जो वर्णन आयाहै उसको
संक्षेपसे वर्णन करतेहैं साहित्यदर्पणमें ' वाक्यरसात्मकंका-
व्यम्' और काव्यप्रकाशमें'तददोषौ शब्दार्थौ सगुणवनलंकृ-
तिः पुनः क्वापीति' और रसरहस्यके कवि कहतेहैं ।
जगते अद्भुत सुखसदन, शब्दरु अर्थ कवित्त ।
यह लक्षण मैंने कियो, समुझि ग्रन्थ बहु चित्त ॥
इसमें जगतसे अद्भुत सुख लोकोत्तर चमत्कारकाही
नाम काव्य कथन हुआहै, इससेभी यह विदित होताहै कि,
इसके बिना सुखकी प्राप्ति नहीं इसकारण जिस कवितामें
रस सुख लोकोत्तर चमत्कारहै वही काव्य कहाताहै, का-
व्यके अनेक भेदहैं तथा उसकी शक्ति अभिधालक्षणा व्यं-
जनादिका विस्तार साहित्यग्रन्थोंमें विस्तारके साथ लिखा-
है, यहां केवल प्रयोजनीय विषयको वर्णन करतेहैं, जिसके
होनेसे काव्य कहलाताहै वह रस क्या है ? ।
मिलि विभाव अनुभाव अरु, संचारी सुअनृप ।
व्यंग्य कियो थिरभाव जो, मोई रस सुख भूप ॥
अपना सामर्थ्यवान मनोविकार उसके कारण उसके
कार्य और सहकारी मनोविकार यह क्रमसे स्थायीभाव

साहित्यपरिचय। ( १९ )
विभाव अनुभाव संचारीभाव कहाते हैं इनके योगसे पुष्टहुए
स्थायीभावको रस कहते हैं।
नाटक देखने काव्य पढ़नेसे जो एक विलक्षण सुख आ-
नंद प्राप्त होताहै उसीका नाम रसहै, चमत्कार कहनेका आ-
शय यह कि, वारंवार अनुभव करनेसे सुखहीकी प्राप्तिहो इस
प्रकारका विलक्षण आनंद कविकी रचनाचातुरीसे प्रगट
होताहै सहृदय पुरुषही इसके अनुभव करनेमें समर्थ हैं
अन्य नहीं ऊपर कही सब सामग्री जिस श्लोकमें व जिस
कवित्तमें होती है वही सरस कहाताहै।
कविजनोंके हृदयमें जो मनोविकार उठतेहैं तथा जो
प्रकृतिका अनुभव उनको यथार्थरूपसे होगयाहै उसका
यथायोग्य वर्णन करके दूसरोंके हृदयमें उसकी पूर्णता
दिखासकतेहैं।
इसीप्रकार हर्ष शोक भय त्रास आदि मनोविकारभी
कारण कार्य और सहकारी प्रसंगके अनुसार जानने योग्य
हैं अर्थात् कविजन अपने काव्यमें जिन २ मनके विकारोंका
वर्णन करतेहैं, उन सबके कारण कार्य और उनके सहकारी
अपर मनोविकार इन सबका काव्यमें यदि सविस्तर
और यथायोग्य उद्भावन करें तो ऐसे काव्यके पढ़ने वा ना-
टकके देखनेसे दूसरोंकेभी अन्तःकरणमें वही मनोविकार
जागृत होतेहैं और यह स्पष्ट जानपडताहै कि, हम उनका

wait, ह has ि which goes over to the left!

  • The vertical line before ह is the left stem of the ि (i-matra) of हिं!

  • YES! In Devanagari, the short 'i' matra ि has a vertical line that stands BEFORE the consonant!

  • So प + ा = पा.

  • Then व.

  • Then the vertical line of ि belonging to ह!

  • So the letters are: प ा व ि ह ं = पावहिं!

  • Brilliant! It is NOT पावाहिं, it is पावहिं!

  • Let's double check: प + ा (पा), व, then ि on ह with anusvara (हिं). Exactly: पावहिं!

  • Now check कवित्तम,:

    • Is there an e-matra on म?
    • Look at म: above म, there is a comma after it, but above म there is no slant. But wait, could it be कवित्तमें where the slant broke off? Or कवित्तम?
    • Wait, look above म:

साहित्यपरिचय (२१)
संचारीभाव तेतीसहैं निर्वेद,ग्लानि,शंका,असूया,मद,श्रम,
आलस्य,दीनता,चिन्ता,मोह,स्मृति,धृति,लाज,वेग,चपलता,
जड़ता, हर्ष, गर्व, विषाद, नींद, अमर्ष, औत्सुक्य,
अपस्मार, सोना, बोध, उग्रता, मरण, बुद्धि, व्याधि, अव-
हित्थ, त्रास, उन्मादता, तर्क, विलास यह तेतीस संचारी
नौरसके साथ रहतेहैं ।
स्थायीभाव ।
सब भावनि सरदार है, टारिसक नाह कोय ।
सो थिरभाव बखानिये, रस स्वरूप जो होय ॥
इनके नौ भेद ।
रस सुहास अरु शोक पुनि, कहत क्रोध उत्साह ।
भय अरु ग्लानी आचरज,थिरभावनु कविनाह॥
शांतरसका निर्वेद भी स्थायी होता है ॥
रसोंके भेद ।
पहलो रस शृंगार पुनि, हास्यरु करुण बखानि ।
रौद्रो वीर भयानकौ, अरु वीभत्सहि जानि ॥
अद्भुतसों मिलि आठ यह, रस नाटकमें होत ।
शांतिसहित नौ कथितमें,कविकुल कहत उदोत॥
शृंगारमें कामका उद्भेद होताहै उत्तम प्रकृति में नवीन
अनुरागिणी नायिका आलम्बन है दक्षिणादि नायक आलंब-

( २२ ) साहित्यपरिचय ।
नहैं चन्द्र चन्दन कोकिलादिके शब्द इसके उद्दीपनहैं भ्रूवि-
क्षेप कटाक्षादि अनुभाव आलस्य जुगुप्सा व्यभिचारीहैं रति-
स्थायीभाव श्यामवर्ण विष्णु देवताहै ॥ १ ॥
विकृताकार वाणी चेष्टा आदिसे हास्यरस उत्पन्न होताहै
हास्यस्थायीभाव श्वेतवर्ण प्रमथ देवता, जिस वाणी वा चेष्टा
को देखकर मनुष्य हँसै वह, आलम्बन और उसकी चेष्टा
उद्दीपन है अक्षिसंकोच स्मेरतादिक अनुभाव, निद्रा आलस्य
अवहित्थादि व्यभिचारी हैं ।
इष्टका नाश अनिष्टकी प्राप्ति करुणरस है यह कपोतवर्ण
यम देवता वाला है इसमें शोकस्थायी भाव, शोच्य आलम्बन
दाहादिकावस्था उद्दीपन हैं, देवनिंदा, भूपात, क्रन्दन यह
अनुभाव हैं, तथा विवर्ण, उच्छ्वासनिश्वास, स्तम्भ, प्रलयन,
निर्वेद, मोह, अपस्मार, व्याधि, ग्लानि, स्मृति, भ्रम,
विषाद, जड़ता, उन्माद, चिन्ता आदिक व्यभिचारी हैं ।
रौद्रमें क्रोध स्थायीभाव, रक्तवर्ण रुद्र देवता शत्रु आल-
म्बन, उसकी चेष्टा उद्दीपन है, मुष्टिप्रहारपतन विकृति
अवदारण संग्राम संभ्रममें इसकी उद्दीपना होती है, भ्रूभंग,
होंट काटना, संभ, ठोंकना, तर्जन, अपनी बड़ाई, आयुध विक्षेप
अनुभाव हैं आक्षेप, क्रूर, संदंशन, उग्रता, वेग, रोमांच स्वेद,
वेपथु, मद, मोह, आमर्ष, व्यभिचारीभाव हैं ।

साहित्यपरिचय। ( २३)
उत्तम प्रकृतिवाला वीररस है उत्साह स्थायीभाव है महेन्द्र
देवता हेमवर्ण विजेतादिक आलम्बन विभाव हैं, सहाय
अन्वेषणादि अनुभाव हैं धृति, मति, गर्व, स्मृति, तर्क, रोमाञ्च
संचारीभाव हैं।
भयानक रसमें भय स्थायीभाव काल देवता, स्त्री नीच
प्रकृति कृष्णवर्ण है, जिससे भय उपजे वह इसमें आलम्बन
है, घोरतर उसकी चेष्टा उद्दीपन है, विवर्ण गद्गद्स्वरभाषण,
प्रलय, स्वेद, रोमाञ्च, कम्प, दिशाओंका देखना, अनुभाव,
जुगुप्सा, वेग, सम्मोह, त्रास, ग्लानि, दीनता, शंख, अपस्मार,
संभ्रान्ति, मृत्युआदि इसमें व्यभिचारी हैं।
वीभत्सरसमें जुगुप्सा ( निन्दा ) स्थायिभावसे रहती है
नीलवर्ण महाकाल इसका देवता है दुर्गंध मांसभेद इसका
आलम्बन है, कृमिपातादि उद्दीपन है, निष्ठीवन नेत्रसंकोच-
नादि अनुभाव, मोह, अपस्मार, आवेग, व्याधि, मरणादिक
संचारीभाव हैं।
अद्भुतरसमें विस्मय स्थायीभाव गंधर्व देवता पीतवर्ण
अलौकिक वस्तु आलम्बन, उसके गुणोंकी महिमा उद्दीपन
है, स्तंभ, स्वेद, रोमांच, गद्गद्,स्वर, संभ्रम, नेत्रविकासादि
अनुभाव, और वितर्क, आवेग, संभ्रान्ति, हर्षादिक इसके
व्यभिचारी हैं।

( २४ ) साहित्यपरिचय ।
शान्तरसमें शम स्थायिभाव, उत्तम प्रकृति, कुन्द और
चन्द्रमाके समानवर्ण श्रीनारायण देवता, अनित्यता वस्तुकी
निस्सारता वा परमात्माका स्वरूप इसका आलम्बन
है, पुण्याश्रमक्षेत्र तीर्थ महापुरुषोंका संग उद्दीपन है,
और रोमांचादि अनुभाव तथा निर्वेद हर्ष स्मरण अतिभूत
दयादिक संचारी हैं ।
कोई दशवाँ वत्सल रस कहते हैं, वत्सलता स्नेह स्थायि-
भाव पुत्रादि आलम्बन, उसकी चेष्टा विद्या शौर्य्यादि उद्दीपन,
आलिंगन, स्पर्श, चुम्बन, पुलकादि आनंद अनुभाव,
अनिष्टकी आशंका, हर्ष, गर्व, संचारीभावहैं कमलके गर्भके
समान वर्ण लोकमाता ये देवता हैं ।
इसके आगे काव्यकी ध्वनि व्यंजना लक्षणका विस्तार
होताहै परन्तु हम सतसईमात्रका विषय संक्षेपसें दिखाते हैं
इनके आलम्बन नायकादि हैं उनको कहते हैं त्यागी, कृती,
कुलीन, लक्ष्मीसम्पन्न रूप यौवनसे युक्त उत्साहवान्, चतुर,
अनुरक्त, शीलवान, नेता यह नायकके लक्षण हैं, धीरोदात्त,
धीरोद्धत, धीरललित, धीरप्रशान्त नायकके यह चार भेद हैं
अपनी बड़ाई न करनेवाले क्षमावान् गंभीर महाबली दृढ-
प्रतिज्ञ धीरोदात्त हैं यथा राम युधिष्ठिरादि ।
मायावी चपल अहंकारदंभसे युक्त अपनी बड़ाई करने-
वाला धीरोद्धत है, यथा भीमसेनादि निश्चिन्त मृदुकलामें

साहित्यपरिचय । ( २५ )
तत्पर धीर ललित है. जैसे रत्नावलीमें वत्सराजादि, सामा-
न्य गुणोंसे युक्त देव द्विजपूजक धीरप्रशान्त होता है इन
प्रत्येकके साथ दक्षिण धृष्ट अनुकूल शठ लगानेसे नायकके
सोलह भेद होते हैं, अनेक स्त्रियोंमें समान अनुराग रखने-
वाला दक्षिणनायक है, और अपराध करनेपरभी निश्शंक
तर्जनसेभी लज्जित न होनेवाला दोष देखनेपरभी मिथ्या-
वादी धृष्टनायक है, एकही स्त्रीमें निरत रहनेवाला अनुकूल
है और बाहरसे प्रेम दिखाकर भीतरसे शून्य और विपरीत
आचरण करै वह शठनायक है यह सब उत्तम मध्यम अध-
म लगानेसे ४८ प्रकारके होते हैं नायिकाओंके भी तीन
भेद हैं, अपनी स्त्री दूसरेकी स्त्री साधारण स्त्री विनय आर्ज-
वादि गुणसे युक्त गृहकर्ममें तत्पर पतिव्रता स्वीया है यह
मुग्धा मध्या प्रगल्भा तीन प्रकारकी है, नवयौवनवाली, गति
में वाम, मानमें मृदु, अधिक लज्जावती मुग्धा कहाती है,
विचित्र सुरतवाली कामसे पूर्ण प्रगल्भ वचनवाली, कुछ
लज्जावती मध्यमा हे कामसे अन्धी अतितरुण समस्त
रतिकी ज्ञाता भावमें उन्नत नायककी आक्रमण करनेवाली
प्रगल्भा कहाती है ।
यही प्रत्येक धीरा, अधीरा, धीराधीग इन भेदोंसे छः
प्रकारकी होती हैं इनमें कुछ हँसकर वक्र उक्तिसे कहनेवा-
ली तथा क्रोधसे जलानेवाली, मध्याधीग जाननी, धीराधीग

( २६ ) साहित्यपरिचय ।
रुदन करती है, और अधीरा कठोर वचन कहती है यह
सबमें लगालेना, प्रगल्भा यदि धीरा होती है तो क्रोध छिपा-
कर बहुत आदर दिखाती है, सुरतमें उदासीन होती है, पर-
कीया दो प्रकारकी हैं प्रौढा और कन्या, यात्रादिमें निरत
लाजहीन कुलटा प्रौढा कहाती है, नवयौवना शीलवान्
लज्जायुक्त कन्या होती है, सामान्यस्त्रीमें धीरा कलाओंमें
प्रगल्भा वेश्या होती हैं यह किसीमें अनुराग नहीं करतीं,
इनकी दृष्टिमें गुणी निर्गुणी कोई नहीं, केवल धनमात्रके
लोभसे बनावटी गाढा प्रेम दिखाती हैं, अंगीकार करके भी
क्षीणधन पुरुष यह घरसे निकाल देती हैं तस्कर षण्डक
मूर्ख जिनको सेतमेत सुखसे धन मिलगया है वही इनके
प्रिय होते हैं "कैसा वीभत्स व्यापार है, माता पिता कष्ट
पाऔ कुछ चिन्ता नहीं, स्त्री महाशोकसागरमें मग्नहो कुछ
चिन्ता नहीं, पिता गरमी जाड़ा वर्षातमें वस्त्र अन्नका कष्ट भोगै
कुछ चिन्ता नहीं, वृद्धावस्थामें हम क्या करेंगे कुछ चिन्ता
नहीं लोक हमारा हास्य करते हैं कुछ चिन्ता नहीं जाय-
दात गिरवी हुई कुछ चिन्ता नहीं जातिसे पतित होंगे धर्म
जायगा कुछ चिन्ता नहीं, वेश्याके यहाँ सर्वस्व चलाजाता है
कुछ चिन्ता नहीं, परंतु यदि अपने कुटुम्बके निमित्त दो
पैसेका खर्च आजाय तो पैरके तलेसे भूमि निकल जाती है
बहुत क्या वारांगनाकी आत्मामें 'जी' ही यही होगा और

साहित्यपरिचय। ( २७ )
कुटुम्बी हितकारीजनोंके उत्तरके 'नहीं' यही दो अक्षर
होते हैं परंतु "सबै दिन नाहिं बरोबर जात" अंतमें क्षीणधन
होनेसे निकाले जाते और पछताते हैं यह रक्तहों वा विरक्त हों
इनमें प्रीति दुर्लभ है।
कोई इनमें कामके वशीभूत होनेसे अनुरागिणी भी
होती है।
अन्य स्त्रियोंके स्वाधीनभर्तृका, खण्डिता, अभिसारिका,
कलहान्तरिता, विप्रलब्धा, प्रोषितभर्तृका, वासकसज्जा, विर-
होत्कंठिता यह भेद हैं।
जो अपने स्वामीके सदा प्रेममें आधीन रहै यह स्वाधीन-
भर्तृका, अन्य स्त्रीसे रति करके उसके चिह्नोंसे युक्त पति
जिसके पास आवै वह खण्डिता, जो वेष छिपाकर संकेतमें
नायकके पास जाय वह अभिसारिका, क्षेत्र बावडीके
निकट भग्नदेवालय दूतीके घर वन स्मशान नदी आदिका
तट यह अंधकारके समय इनके अभिसारके स्थान हैं।
जो क्रोधसे बुरे वचन कहकर प्राणनाथको बाहर करदे पीछे
पछतावै वह कलहान्तरिता है, जिसका प्रीतम संकेत करके
मिलनेको न आवै वह विप्रलब्धा । जिसका पति कार्यवश
परदेश गया हो उसकी कामार्त्त स्त्री प्रोषितभर्तृका कहातीहै,
जो स्वामीका संगम जान कर शृंगार कर सेज प्रस्तुत करती
है वह वासकसज्जा, आनेका निश्चय करके प्रारब्धमें जिस-

( २८ ) साहित्यपरिचय ।
का पति न आवै वह विरहोत्कंठिता कहातीहै इनमें
मध्यम अधम लगाकर ३८४ सेभी अधिक नायकाभेद होते
हैं सो विस्तारभयसे नहीं लिखे, इनके शरीरमें
कारण अट्ठाईस विकार होते हैं और भावसे लेकर धैर्यतक
दशपुरुषोंमें होते हैं तथाहि-
भाव-निर्विकारात्मक चित्तमें पहला विकार ( विभाव
अनेत्रादिके विकारसे सम्भोगकी इच्छा प्रगट करनी, थोडा
संलक्ष्यका विकार हाव है। खेलादिके अत्यन्त प्रगट विकारका
नाम हेलाहै । रूप यौवनके लालित्यका नाम शोभाहै।कामकी
अधिकाईके प्रकाशका नाम कान्ति कान्तिकी अधिकाईदीप्ति।
सब अवस्था में रमणीयताका नाम माधुर्य है। भय न माननेका
नाम प्रागल्भ्यहै । विनयका नाम औदार्य्यहै । अपनी श्लाघा
करके चंचलता त्यागकर स्थिर मनोवृत्ति रखना धैर्यहै।
अलंकार धारणपूर्वक प्रीतियुक्त प्रेमभरे वचन
प्रियकी अनुकृतिका नाम लीलाहै । इष्टके देखने

साहित्यपरिचय । ( २९ )

किल किंचित् है। प्रीतमकी कथादिमें भाव रखकर कानआदिके
खुजाते जानेका नाम मोहायित है । प्रीतमके केश स्तन
अधरादिके स्पर्श करनेसे जो सम्भ्रमसे हाथ पैरका विधू-
नन है उसको कुट्टमित कहते हैं। जो पतिके आगमनादिके
हर्षमें शीघ्रताके कारण अन्यस्थानमें अन्यभूषणोंका धारण
करनाहै उसको विभ्रम कहते हैं।सुकुमारतासे अंगोंके विन्या-
सको ललित कहते हैं। सौभाग्य यौवनके मदसे उत्पन्न हुआ
विकार मदहै । वचन कहनेके समय लाजसे जो न कहाजाय
वह विकृतहै। प्रियके वियोगसे कामावेशकी चेष्टासे उत्पन्न
व्यापार तपनहै। जो जानकर भी अज्ञानके समान प्रियासे
वस्तु आदिके निमित्त प्रश्न है उसका नाम मौग्ध्यहै। प्रीत-
मके समीप भूषणोंकी अर्धरचना, निरर्थक चारों ओर
देखना कुछ मंद मंद गोपनीय विषयको कहना विक्षेप ह।
रम्यवस्तुके देखनेकी चंचलताका नाम कुतूहल है ।
यौवनके उद्भेदसे वृथाहास्यका नाम हसित है । प्रीतमके
आगे थोडे कारणसेभी भयसे संभ्रमका नाम चकितहै। विहा-
रमें प्रीतमके साथ क्रीडाका नाम केलि है। यह अट्ठाईस
विकार स्त्रीजनोंको होते हैं, भावसे लेकर धैर्यपर्यन्त दश
पुरुषोंको होते हैं। मुग्धा कन्या केवल देखती है, बहुत
पूछनेसे कुछ कहतीहै। लेख दर्शन चेष्टा तथा दूतीके मुखसे
स्त्रियोंके भाव प्रगट होते हैं कलाकौशल उत्साहसे युक्त

( ३० ) साहित्यपरिचय ।
भक्तिमान् तत्त्वज्ञाता स्मृतिवान् मधुरभाषी बहुत वाचालता-
युक्त दूती होनी चाहिये उत्तम मध्यम अधमके भेदसे यहभी
कई भेदवाली हैं।
सत्त्वसे उत्पन्नहुए विकार सात्त्विक कहाते हैं, भय वा
हर्षसे चेष्टाका स्तंभ होजाना, पसीना आजाना, रुएँ खड़े
होजाना, स्वरभंग होजाना, कंपित होना, विवर्णता हो जानी,
विषाद वा मदसे । क्रोध दुःख वा हर्षसे नेत्रोंमें जल आजा-
ना, सुख दुःखकी चेष्टाका ज्ञान न रहना प्रलयहै, यह भाव
प्रेममें उदय होते हैं। कई कारणोंसे ग्लानि मानकर अपनी
अमाननाका नाम निर्वेद है। व्यभिचारी होनेसे इनकेभी तैंती-
स भेद होते हैं।
रसके धर्म काव्यमें माधुर्य्य ओज प्रसाद यह तीन प्रका-
रके हैं, सुनतेही चित्त द्रवीभूत होकर आह्लादको प्राप्तहो इसका
नाम माधुर्य्य है । मनके विस्ताररूप विकासका नाम ओज है,
वीर बीभत्स रौद्र रसमें इसकी अधिकता है।

साहित्यपरिचय। (३१)
दोहा-प्रथम शब्द याते कहें, प्रथम शब्दके साज ॥
बहुरि अर्थके जानिये, अलंकार कविराज ॥ १ ॥
उक्तिभेदते होत हैं, अलंकार यह जानि ॥
वक्र उक्ति याते कही, द्वैविधि प्रथम बखानि॥ २ ॥
कहै बात औरै कछू, अर्थ करै कछु और ॥
वक्रउक्ति ताको कहें, श्लेष शुद्ध द्वै ठौर ॥ ३ ॥
वर्ण एकसे फिर जहाँ, अनुप्रास है सोय ॥
छेकविदग्धा वृत्ति करि, सो पुनिद्वै विधि होय ॥ ४ ॥
जहाँ बहुतसे वर्ण एकवार फिर आवैं वह विदग्धा अनु-
प्रासहै। अनेक व्यंजनका एकधा स्वरूपसे वा वारंवार अने-
क प्रकार क्रमसे एक व्यंजनका बारवार समभावसे जो वर्तना
है उसको वृत्यनुप्रास कहते हैं।
दोहा-फिरै अर्थ पदयुत जहाँ, अर्थभेद नहिं कोय ।
सो लाटानुप्रास पुनि, भावभेदते होय ॥ १ ॥
एक शब्द बहु शब्दको, एकरु भिन्न समास ।
परने वचन समासहू, पांच भांति सुप्रकाश ॥ २ ॥
यमकलक्षण ।
दोहा-अर्थ होय भिन्न जहाँ, शब्द एक अनुहार ।
यमक कहत तासों सबे, भेद अनन्त विचार ॥ १ ॥

( ३२ ) साहित्यपरिचय ।
श्लेषलक्षण ।
दोहा-कह जेहि अर्थ अनेकको, रहै एकही रूप ।
शब्द तहां सुश्लेष हैं, आठ भांति सुअनूप ॥ २ ॥
वर्ण वचन अरु लिंग पुनि, कहि विभक्ति पदकान्ति ।
भाषा अरु प्रत्यय प्रकृति, वरन आठ यहि भांति॥३॥
चित्रलक्षण ।
दोहा-लिखिवेहीकी चतुराई, उपजैं भेद अनेक ।
जहां सुचित्र कवित्त है, बहुविधि बन्धु विवेक ॥ १ ॥
अर्थालंकार ।
दोहा-उपमा औ उपमेय हैं, अलंकारके प्रान ।
तात इनको प्रथमही, कहियत रूप वखान ॥ १ ॥
होय बड़ाई सम किये, जाकूं सो उपमानि ॥
जाको वर्णन कीजिये, सो उपमेय बखानि ॥ २ ॥
शब्द अर्थ समना कहें, दोउनकी जेहि ठौर ॥
नहिं कल्पितउपमान जेहि, सो उपमा शिरमौर ॥३॥
शब्द सबैदौ पाइयै, समना श्रौती सोय ॥
अर्थ विचारै आर्थी, उपमाद्वै विधि होय ॥ ४ ॥
समना पद उपमेय पुनि, धर्म और उपमान ॥
चारो जुरैं सो पूरना, लोपहु ता जान ॥ ५ ॥

साहित्यपरिचय। ( ३३ )
जिमि जैसो मानोरु सों, भाषा श्रौती जान।
सम समान उपमा तुला, जोग आरथी आन ॥ ६ ॥
औरै जे समता कहैं, प्रगटति श्रौती हेत।
जे समझावैं अर्थसो, ते आरथी निकेत ॥ ७ ॥
लुप्ता।
दोहा–उपमा औ उपमेय पुनि, वाचकधर्म बखान।
एक दोय अरु तीन पुनि, लोपैलुप्ता जान ॥ १ ॥
प्रतिवस्तूपमा।
दोहा–समतासूचक पद जहाँ, रहै एक द्वै भांति ॥
सो है प्रतिवस्तूपमा, पदसमूहकी कांति ॥ १ ॥
जहँ लघुता उपमानकी, सो प्रतीप ह्वै भेव ॥
प्रथम निरादर कीजिये, पुनि कीजे उपमेव ॥ २ ॥
संशयमें जो सांचसी, तेहि विधिको उपमान ॥
अधिक होय उपमेयते, सो उत्प्रेक्षा जान ॥ ३ ॥
उपमा अरु उपमेयको, भेद परै नहिं जानि ॥
समता व्यंग्यरहै जहां, रूपक ताहि बखानि ॥ ४ ॥
जँहँ देखत उपमानको, सुधि आवै उपमेय ॥
ताही सों सुमिरण कहत, जे कवि जानत भेय ॥ ५ ॥
करि निषेध उपमेयको, जहँ थापै उपमान ॥
बहुविधि वाचक भेदते, ताहि उपह्नुति जान ॥ ६ ॥
३

( ३४ ) साहित्यपरिचय।
जहँ संबंध बने न तब, उपमामें विश्राम ॥
हेतु क्रिया कारि दोप है, निदर्शना सुखधाम ॥ ७ ॥
अति अभेद जिय राखि जहँ, नहिं कहिये उपमेय ॥
उपमानि कहिये जहाँ, अतिशयोक्ति सो भेव ॥ ८ ॥
उपमानरु उपमेय पुनि, साधारण जेहि ठाउँ ॥
वाचक सब प्रतिबिम्बहै, सो दृष्टान्ता नाउँ ॥ ९ ॥
अगले २ योग जहँ, प्रथम अधिक गुण होय ॥
मालादीपक कहत हैं, ताहि सब कविलोग ॥ १० ॥
दीपकहींसों भेव यह, नियत एकहीं होय ॥
उपमानि उपमेयको, तुल्य योग्यता सोय ॥ ११ ॥
जहाँ अधिक उपमानते, कहियत है उपमेय ॥
सो व्यतिरेक बखानिये, ऊँच नीच गुण भेय ॥ १२ ॥
इनके चौबीस भेद होते हैं.
दोहा—कथ्यो न कछु कहि बरनि, अधिकाईके हेत।
कह्यो कि कहिब भेद द्वै, आक्षेप कहि देत ॥ १ ॥