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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

पृष्ठ 19, कुल 290 में से

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पृष्ठ 19

साहित्यपरिचय ।
सतसईमें साहित्यविषयक जो वर्णन आयाहै उसको
संक्षेपसे वर्णन करतेहैं साहित्यदर्पणमें ' वाक्यरसात्मकंका-
व्यम्' और काव्यप्रकाशमें'तददोषौ शब्दार्थौ सगुणवनलंकृ-
तिः पुनः क्वापीति' और रसरहस्यके कवि कहतेहैं ।
जगते अद्भुत सुखसदन, शब्दरु अर्थ कवित्त ।
यह लक्षण मैंने कियो, समुझि ग्रन्थ बहु चित्त ॥
इसमें जगतसे अद्भुत सुख लोकोत्तर चमत्कारकाही
नाम काव्य कथन हुआहै, इससेभी यह विदित होताहै कि,
इसके बिना सुखकी प्राप्ति नहीं इसकारण जिस कवितामें
रस सुख लोकोत्तर चमत्कारहै वही काव्य कहाताहै, का-
व्यके अनेक भेदहैं तथा उसकी शक्ति अभिधालक्षणा व्यं-
जनादिका विस्तार साहित्यग्रन्थोंमें विस्तारके साथ लिखा-
है, यहां केवल प्रयोजनीय विषयको वर्णन करतेहैं, जिसके
होनेसे काव्य कहलाताहै वह रस क्या है ? ।
मिलि विभाव अनुभाव अरु, संचारी सुअनृप ।
व्यंग्य कियो थिरभाव जो, मोई रस सुख भूप ॥
अपना सामर्थ्यवान मनोविकार उसके कारण उसके
कार्य और सहकारी मनोविकार यह क्रमसे स्थायीभाव