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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 17

( १६ ) बिहारीलालजीका-
प्यासे दुपहरजेठके, थके सबै जल शोधि ।
मरु घर पाय मतीरही, मारू कहतिपयोधि ॥
बिहारीलाल तत्कालभी प्रसंगानुसार दोहा निर्माण कर-
ते थे कोई चित्रकार एक वृक्षके नीचे अहि मयूर मृग बाघ
बनाकर लाया महाराज जयसिंहने बिहारीलालसे यह प्रसंग
पूँछा तब कविवरने कहा ।
दोहा-कहलाने एकतवसत, अहि मयूर मृगबाघ।
जगत तपोवनसोकियो, दीरघदाघनिदाघ॥
जब जयसाह इस संसारको त्यागगये तब इन कविवरका
चित्त शृंगाररसकी ओरसे खिंचगया और नीति उपदेश
आदिके दोहे निर्माणकर संवत् १७१९ में उन्होंने सतसई
पूर्ण करदी ।
अन्य कवीश्वरोंकी भांति बिहारीलालने अपने महाराजकी
लम्बी चौड़ी प्रशंसा न करके राधाकृष्णके गुणानुवादमें विशेष
कविता निर्माण की है, इसमें कुछभी सन्देह नहीं कि, अन्तके
जीवनके दिन उन्होंने भगवद्भजनमेंही व्यतीत किये इसके
प्रमाणके निम्नलिखित दोहे हैं ॥
दोहा-अपने २ मत लगे, वादि मचावत शोर ।
ज्यों त्यों सबको सेइबो, एकै नंदकिशोर॥