बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
पृष्ठ 16, कुल 290 में से
संदर्भ में पढ़ेंजीवनचरित्र । ( १५ )
के निमित्त झगड़ा किया, इससमय प्रजाको बड़ी कठिनाई
पड़ी थी कदाचित् इसीसमय कविवरने यह दोहा कहाहै ।
दोहा-दुसह दुराज प्रजानको, क्योंनबाढ़ै दुखद्वंद ।
अधिक अँधेरोजगकरै,मिलिमावसरविचंद॥
फिर राज्यकी पलटसे गुणगाहक न रहनेके कारण कवि-
वरने वहां रहना उचित न जाना कदाचित् ऐसेही प्रसंगपर
नीचे लिखा काव्य कियाहो ।
दोहा-चलेजाहु ह्यां को करत,हाथिनकोव्यवहार।
नहिं जानत ह्यां वसत हैं,धोबी और कुम्हार
जिन दिन देखे वे कुसुम, गई सुबीत बहार ।
अब अलि रहीगुलाबकी,निपटकटीलीडार
कहते हैं कि, यही विचार कविवर वहांसे कृष्णकविको
साथले मारवाड़की ओर चलेगये, उससमय दरबारमें इनके
दोहोंका अर्थ होता था,विद्वानोंने कई२ प्रकारसे अर्थ किये थे
विहारीलालने देखा कि,अपना परिचय अब देना ठीक नहीं
कारण कि, इससे अधिक और अर्थ अब हम क्या करेंगे,
मारवाड़के विषयमें उन्होंने कहा है ।
दोहा-विषमवृपादिकीकृपा,जियैमतारनिशोधि
अमितअपारअगाधजल, मागोमूँढ़ पयोधि