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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 20

साहित्यपरिचय। ( १९ )
विभाव अनुभाव संचारीभाव कहाते हैं इनके योगसे पुष्टहुए
स्थायीभावको रस कहते हैं।
नाटक देखने काव्य पढ़नेसे जो एक विलक्षण सुख आ-
नंद प्राप्त होताहै उसीका नाम रसहै, चमत्कार कहनेका आ-
शय यह कि, वारंवार अनुभव करनेसे सुखहीकी प्राप्तिहो इस
प्रकारका विलक्षण आनंद कविकी रचनाचातुरीसे प्रगट
होताहै सहृदय पुरुषही इसके अनुभव करनेमें समर्थ हैं
अन्य नहीं ऊपर कही सब सामग्री जिस श्लोकमें व जिस
कवित्तमें होती है वही सरस कहाताहै।
कविजनोंके हृदयमें जो मनोविकार उठतेहैं तथा जो
प्रकृतिका अनुभव उनको यथार्थरूपसे होगयाहै उसका
यथायोग्य वर्णन करके दूसरोंके हृदयमें उसकी पूर्णता
दिखासकतेहैं।
इसीप्रकार हर्ष शोक भय त्रास आदि मनोविकारभी
कारण कार्य और सहकारी प्रसंगके अनुसार जानने योग्य
हैं अर्थात् कविजन अपने काव्यमें जिन २ मनके विकारोंका
वर्णन करतेहैं, उन सबके कारण कार्य और उनके सहकारी
अपर मनोविकार इन सबका काव्यमें यदि सविस्तर
और यथायोग्य उद्भावन करें तो ऐसे काव्यके पढ़ने वा ना-
टकके देखनेसे दूसरोंकेभी अन्तःकरणमें वही मनोविकार
जागृत होतेहैं और यह स्पष्ट जानपडताहै कि, हम उनका