भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
रेख के लिए पालिंमेण्ट की ओर से बनाया गया था। इससे पहले
के एक गवर्नर जनरल लॉर्ड कॉर्नवालिस और इंगलिस्तान के
प्रधान मन्त्री पिट से वेल्सली की गहरी मित्रता थी। इन दोनों की
मदद से सन् १७६३ से १७६८ तक वेल्सली इंगलिस्तान में बैठा
हुआ भारतीय इतिहास और भारत की उस समय की राजनैतिक
हालत का गौर से अध्ययन करता रहा। वेल्सली को भारत भेजने
से पहले प्रधान मन्त्री पिट ने उसे एक सप्ताह अपने पास रख
कर हिन्दोस्तान के अन्दर एक विशाल ब्रिटिश साम्राज्य क़ायम
करने की सम्भावना और उसके उपायों पर उसके साथ ख़ूब
बातचीत की। इस तरह शिक्षा पाकर वेल्सली ७ नवम्बर सन्
१७६७ को अपने देश से रवाना हुआ और मार्ग में दो महीने
अफ़रीका की आशा अन्तरीप में ठहर कर मई सन् १७६८ में
कलकत्ते पहुँचा।
अठारवीं सदी के अन्त में पच्छिम के देशों में क़ौमी आज़ादी
[हाशिया: यूरोप में क़ौमी आज़ादी की लहर] की एक ज़बरदस्त लहर चल रही थी। 'स्वतन्त्रता'
'समता' और 'मनुष्य मात्र के बन्धुत्व' की
आवाज़ें चारों ओर गूंज रही थीं। ४ जुलाई सन्
१७७६ को अमरीका ने अपने आपको इङ्गलिस्तान की दासता से
स्वतन्त्र कर देश में प्रजातन्त्र राज (रिपब्लिक) की स्थापना
की। ७ वर्ष के भयङ्कर रक्तपात के बाद ३० नवम्बर सन् १७८२ को
इंगलिस्तान ने लाचार होकर अमरीका की 'स्वाधीनता' को स्वीकार
किया। सन् १७८६.में फ्रांस की जगद् प्रसिद्ध राजक्रान्ति का
अंग्रेज़ों की साम्राज्य पिपासा ४२७
प्रारम्भ हुआ। सन् १७९२ में फ्रांस ने अपने स्वेच्छाचारी और
अन्यायी राजा सोलहवें लुई को गद्दी से उतार कर अपने यहाँ
प्रजातन्त्र राज (रिपब्लिक) क़ायम किया। २१ जनवरी सन्
१७९३ को सोलहवें लुई को फाँसी पर चढ़ा दिया गया। फ्रांस ही
से “स्वतन्त्रता, समता और बन्धुत्व” (Liberty, Equality
and Fraternity) इन तीन शब्दों की पुकार उठी और चन्द
साल के अन्दर ही ये शब्द सारे यूरोप में इस सिरे से उस सिरे
तक गूंजने लगे। फ्रांस की इस महान क्रान्ति के विषय में इतालिया
के आदर्श देशभक्त महात्मा जौज़फ़ मैज़िनी ने लिखा है—
“ढाई करोड़ मनुष्य केवल किसी शब्द, किसी थोथे वाक्य या छाया के
पीछे इस तरह एक दिल होकर खड़े नहीं हो सकते
[मैज़िनी के विचार] और न आधे यूरोप को अपनी आवाज़ से जगा सकते
हैं। फ्रांस की राज्य क्रान्ति ख़तम हो गई यानी उसका
ऊपरी जोश ख़रोश जाता रहा, उसका बाहरी रूप नष्ट हो गया, जिस तरह कि
हर चीज़ का बाहरी रूप अपना काम पूरा करके नष्ट हो जाता है, किन्तु उस
क्रान्ति का उसूल, उसके भीतर का सिद्धान्त जीवित है। वह सिद्धान्त अपने
उस समय के समस्त अस्थायी आच्छादनों यानी बाहरी रूपों से अलग होकर
अब सदा के लिए हमारे मानसिक आकाश में ध्रुव तारे की तरह चमक रहा
है; उसकी शुमार मानव जाति की विजयों में की जाती है।
“हर महान सिद्धान्त अमर है। फ्रांस की राजक्रान्ति ने मनुष्य मात्र के
अधिकार, स्वतन्त्रता और समता के भावों को फिर से मनुष्य की आत्मा के
अन्दर प्रज्वलित कर दिया, अब यह ज्वाला कभी किसी के बुझाए नहीं बुझ
४२८ भारत में अंगरेज़ी राज
सकती। उस क्रान्ति ने फ्रांस निवासियों के अन्दर इस बात की चेतावनी
जगा दी कि आइन्दा कभी कोई हमारी क़ौमी ज़िन्दगी को खण्डित नहीं कर
सकता; और सब क़ौमों के लोगों में यह ज्ञान पैदा कर दिया कि जनता के
एक मत हो जाने पर क़ौम की शक्ति कितनी ज़बरदस्त होती है, उनमें यह दृढ़
विश्वास पैदा कर दिया कि विजय अन्त में जनता ही की होगी और कोई
शक्ति उसे इस विजय से वञ्चित नहीं रख सकती । राजनैतिक क्षेत्र में इस
क्रान्ति ने मानव उन्नति के एक युग को पूरा करके और उसका सार लेकर
हमें दूसरे युग की सीमा तक पहुँचा दिया।
“ये ऐसे नतीजे हैं जो कभी नष्ट न होंगे; कोई सरकारी उल्लेख कोई
राजनैतिक सिद्धान्त या किसी स्वेच्छाचारी सरकार के अनन्य अधिकार इन
नतीजों को नहीं मिटा सकते।”*
फ्रांसीसी क़ौम प्रायः शुरू से उच्च आदर्शों की उपासक रही है।
- "Five and twenty millions of men do not rise up as, one man, nor
rouse one half of Europe at their call, for a mere word, an empty formula,
a shadow. The Revolution, that is to say the tumult and fury of the
Revolution—perished; the form perished, as all forms perish when their
task is accomplished, but the idea of the Revolution survived. That idea
freed from every temporary envelope or disguise, now reigns for ever, a
fixed star in the intellectual firmament; it is numbered among the conquests
of Humanity.
"Every great idea is immortal; the French Revolution rekindled the
sense of Right, of liberty, and of equality in the human soul, never henceforth
to be extinguished; it awakened France to the consciousness of the
inviolability of her national life; awakened in every people a perception of
the powers of collective will, and a conviction of ultimate victory, of which
none can deprive them. It summed up and concluded (in the political
sphere) one epoch of Humanity, and led us to the confines of the next.
अंगरेज़ों की साम्राज्य पिपासा ४२६
किन्तु अंगरेज़ों और फ्रांसीसियों के चरित्र में आरम्भ से ही बहुत
बड़ा अन्तर दिखाई देता रहा है। जब कि
[हाशिया: अंगरेज़ों और] फ्रांसीसी समस्त संसार को स्वतंत्रता, समता
[हाशिया: फ्रांसीसियों के] और बन्धुत्व का उपदेश दे रहे थे, ठीक उस
[हाशिया: चरित्र में अन्तर] समय उनके पड़ोसी अंगरेज़ इन सिद्धान्तों के
प्रचार को रोकने का भरसक प्रयत्न कर रहे थे। वजह यह थी कि
इंगलिस्तान के शासकों को साम्राज्य का और वहाँ के पूंजीपतियों
को दूसरे देशों से धन बटोरने का काफ़ी चसका पड़ चुका था।
इंगलिस्तान के साम्राज्य पिपासी शासकों और धन लोलुप पूंजी-
पतियों को इस बात का डर था कि यदि इस तरह के विचार संसार
में फैल गए तो हमारी अपनी इष्ट सिद्धि में बहुत बड़ी बाधा पड़ेगी।
जिस अंगरेज़ विद्वान एडमंड बर्क ने इंगलिस्तान की पार्लिमेण्ट के
सामने इस योग्यता के साथ वारन हेस्टिंग्स के पाप कृत्यों को
खोला था, उसी बर्क को अब वहाँ के शासकों ने १५०० पाउण्ड
सालाना की पेन्शन देकर उससे फ्रांस की राजक्रान्ति के ख़िलाफ़
एक ज़बरदस्त पुस्तक लिखवा दी, ताकि फ्रांस की आज़ादी का
रोग इंगलिस्तान में फैलने न पाए।
इंगलिस्तान का प्रधान मन्त्री पिट हद दर्जे का साम्राज्य लोलुप
था। फ्रांस और फ्रांसीसी विचारों का वह कट्टर शत्रु था। उसी
की इच्छानुसार भारत का प्रत्येक अंगरेज़ अफ़सर यहाँ के देशी
“ These are results which will not pass away : they defy every protocol,
constitutional theory, or veto of despotic power.”—Joseph Mazzini.
४३० भारत में अंगरेज़ी राज
दरबारों में फ़्रांसीसियों, उनके देश और उनके विचारों को बदनाम
करने की हर तरह कोशिश करता रहता था। वेल्सली को भी
फ़्रांसीसी क़ौम और फ़्रांसीसी विचारों से हद दर्जे का द्वेष था।
इसकी एक वजह यह भी बताई जाती है कि इंगलिस्तान में वेल्सली
ने एक फ़्रान्सीसी स्त्री अपने घर में रख रक्खी थी, जिससे वेल्सली
के कई बच्चे हुए। बच्चे होने के बाद वेल्सली ने उसके साथ
बाज़ाब्ता विवाह किया, किन्तु बाद में दोनों में कुछ अनबन हो गई
और उस स्त्री ने वेल्सली के साथ भारत आने से इनकार कर
दिया। जो हो, वेल्सली फ़्रांसीसियों से इतना डरता था कि भारत
आते ही उसने ४ मई सन् १७९८ को यहाँ के जंगी लाट सर
आल्फ्रेड क्लार्क को एक “प्राइवेट और गुप्त” पत्र द्वारा यह साफ़
साफ़ आदेश दिया कि—कलकत्ता, चट्टग्राम, चन्द्रनगर, चुंचड़ा
इत्यादि से और बाक़ी तमाम ब्रिटिश भारतीय इलाक़ों से एक एक
फ़्रांसीसी को और फ़्रांसीसियों से सम्बन्ध रखने वाले समस्त अन्य
यूरोप निवासियों तक को चुन चुनकर ज़बरदस्ती यूरोप भेज दिया
जाय। मार्किस वेल्सली प्रजा के अधिकारों का इतना पक्का विरोधी
था और उसके राजनैतिक विचार इतने अनुदार थे कि स्वयं अपने
देश इंगलिस्तान के अन्दर वह मामूली पार्लिमेण्ट के सुधारों तक
के ख़िलाफ़ था।
पिट के समय तक आयरलैंड की एक अलग पार्लिमेण्ट थी।
पिट ने इस उद्देश से कि आयरलैंड को इंगलिस्तान के राज्य में मिला
अंगरेज़ों की साम्राज्य पिपासा ४३१
लिया जाय और इंगलिस्तान की पार्लिमेण्ट के मातहत कर दिया
[आयरलैण्ड की स्वाधीनता का अपहरण] जाय, जान बूझ कर आयरलैंड में सशस्त्र विद्रोह
खड़ा कर दिया। प्रसिद्ध अंगरेज़ विद्वान डब्ल्यू०
टी० स्टेड ने उस समय के ऐतिहासिक लेखों
से साबित किया है कि आयरलैंड का सन् १७६८
का विद्रोह ब्रिटिश सरकार का उकसाया हुआ था और आयरलैंड
की स्वाधीनता छीनने के उद्देश से किया गया था। स्टेड यह भी
लिखता है कि जिन उपायों से इंगलिस्तान के शासकों ने आयरलैंड
की स्वाधीनता छीन कर उसे इंगलिस्तान की पार्लिमेण्ट के मातहत
किया, उनमें एक उपाय आयरलैंड की स्त्रियों के साथ "बेरोक टोक
बलात्कार" ("Free-rape") भी था। ये उपाय थे जिनके ज़रिये
'ब्रिटेन' का नाम 'ग्रेट ब्रिटेन' रक्खा गया।
मार्किस वेल्सली ने २ अक्टूबर सन् १८०० ई० को कलकत्ते से
[भारत में मार्किस वेल्सली का उद्देश] अपने एक मित्र के नाम पत्र लिखा जिसके नीचे
लिखे वाक्य से उसके और कम्पनी के दोनों के
भारतीय शासन के उद्देश का साफ़ पता चलता
है। इस पत्र में वेल्सली ने लिखा :—
“ × × × मैं बादशाहतों के ढेर लगा दूँगा और फ़तह पर फ़तह तथा
मालगुज़ारी पर मालगुज़ारी लाद दूँगा। मैं इतनी शान, इतना धन और
इतनी सत्ता इकट्ठी कर दूँगा कि एक बार मेरे महत्त्वाकांक्षी और धनलोलुप
मालिक भी 'त्राहि त्राहि' चिल्लाने लगेंगे। × × ×” ❀
- "I will heap Kingdoms upon Kingdoms, victory upon victory,
४३२ भारत में अंगरेज़ी राज
भारत आने से पहले दो महीने आशा अन्तरीप में रह कर
वेलसली ने भारत की अनेक देशी रियासतों की स्वाधीनता को नाश
करने की तरकीबें सोचीं। इस काम में उसे दो अंगरेज़ अफ़सरों से
बहुत बड़ी मदद मिली। एक सर डेविड बेयर्ड और दूसरा मेजर
कर्कपैट्रिक। सर डेविड बेयर्ड टीपू सुलतान के यहाँ क़ैद रह चुका
था। डेविड बेयर्ड का बयान है कि टीपू प्रायः अपने मनोरंजन के
लिए बेयर्ड को बन्दर की तरह कपड़े पहनवा कर एक ऊँचा बाँस
गड़वा कर उसे उस बाँस पर चढ़वाया उतरवाया करता था और
बन्दर की तरह नचवाया करता था। हम भी इस बयान को केवल
मनोरंजन के तौर पर दे रहे हैं। नहीं तो टीपू की इस तरह की
हरकतों का सबूत सिवा अंगरेज़ क़ैदियों के बयानों के और कहीं
नहीं मिलता, और इन बयानों पर बहुत अधिक विश्वास नहीं
किया जा सकता। मेजर कर्कपैट्रिक वारन हेस्टिंग्स और कॉर्न-
वालिस के समय का खुर्रांट नीतिज्ञ था। माधोजी सींधिया के
यहाँ नैपाल में और हैदराबाद में, तीन जगह वह कम्पनी के दूत
का काम कर चुका था। माधोजी सींधिया को नाना फड़नवीस से
लड़ाकर मराठों की सत्ता को नाश करने में, नैपाल के मागों और
सैन्यबल इत्यादि का गुप्त पता लगाने में और हैदराबाद की सेना
revenue upon revenue; I will accumulate glory and wealth and power, until
the ambition and avarice even of my masters shall cry mercy. . . . . "—
Marquess of Wellesley's letter to lady Anne Barnard, dated October 2nd,
1800.
अंग्रेज़ों की साम्राज्य पिपासा ४३३
से फ्रांसीसियों को निकलवाकर उनकी जगह अंग्रेज़ भरती कराने
में मेजर कर्कपैट्रिक का ख़ास हाथ था।
इन दोनों अंग्रेज़ों से वेल्सली को देशी रियासतों की स्थिति
का ठीक ठीक पता चल गया और अपनी तजवीज़ों को पक्का करने
में बहुत बड़ी मदद मिली। आशा अन्तरीप से वेल्सली ने प्रधान
मन्त्री पिट और भारत मन्त्री डण्डास के नाम जो पत्र इंगलिस्तान
भेजे, उनसे साफ़ ज़ाहिर हो जाता है कि इंगलिस्तान के शासकों
ने वेल्सली को क्या क्या हिदायतें दी थीं और भारत पहुँच कर
उसकी क्या तजवीज़ें थीं।
एक ख़ास तजवीज़ इस समय यह की गई कि भारतीय नरेशों
सबसीडीयरी के पास उस समय तक जहाँ जहाँ अपनी
एलाएन्स स्वतन्त्र सेनाएँ मौजूद थीं, उन सेनाओं को एक
एक कर किसी प्रकार बरखास्त करा दिया
जावे; उन नरेशों और उनकी रियासतों की रक्षा का भार कम्पनी
अपने ऊपर ले ले; और पुरानी रियासती सेनाओं की जगह कम्पनी
की सेनाएं, अंग्रेज़ अफ़सरों के अधीन, रियासतों के ख़र्च पर
उन रियासतों में क़ायम कर दी जावें। इस नई तजवीज़ का नाम
'सबसीडीयरी एलाएन्स' रक्खा गया। 'सबसीडी' का अर्थ
'आर्थिक सहायता' और 'एलाएन्स' का अर्थ 'मित्रता' है। मतलब
यह था कि हर देशी नरेश कम्पनी को निश्चित 'आर्थिक सहायता'
देकर कम्पनी की 'सैनिक मित्रता' लाभ कर सके। निस्सन्देह देशी
नरेशों को उनकी रियासतों के अन्दर उन्हीं के ख़र्च पर क़ैद करके
२८
४३४ भारत में अंग्रेज़ी राज
रखने का इससे सुन्दर उपाय न सोचा जा सकता था। इस 'सब्सिडी-
डीयरी एलायन्स' के विषय में एक यूरोपियन विद्वान लिखता है:—
“सब्सिडीयरी एलायन्स × × × सिवाय एक धोखे के और कुछ न थी।
उसका उद्देश इङ्गलिस्तान की जनता की आँखों में धूल डालना था × × ×।
“× × × ये देश ज़ाहिरा विजय नहीं किए जाते थे, वहाँ के नरेशों
को छत्र, चँवर आदिक राजत्व के समस्त चिन्हों सहित तख़्त पर रहने
दिया जाता था, किन्तु असली ताक़त उनके हाथों से लेकर एक पोलिटिकल
एजण्ट के हाथों में दे दी जाती थी × × ×।”*
इस तजवीज़ का उद्देश 'इंग्लिस्तान की जनता की आँखों में
धूल डालना' रहा हो या न रहा हो, इसमें सन्देह नहीं कि उस समय
के असंख्य भोले एशिया निवासियों की आँखों में धूल डालने के
लिए यह काफ़ी साबित हुई ।
जिन छलों द्वारा वेल्सली ने भारत में अपने सबसीडीयरी एला-
यन्स का जाल बिछाया, जिस प्रकार उसने भारत के मुसलमानों
और मराठों को वश में किया, निज़ाम और पेशवा को फाँस कर
उन्हें कम्पनी का क़ैदी बनाया, करनाटक के नवाब, तञ्जोर के राजा,
अवध के नवाब वज़ीर और सूरत और फ़र्रुख़ाबाद के नवाबों के
इलाक़े छीने और टीपू, सींधिया, होलकर और भोंसले को बरबाद
- "The Subsidiary system. . . . was nothing more than a delusion;
it was for the purpose of throwing dust into the eyes of the British public....
" . . . these countries were not ostensibly conquered; the sovereign
was allowed to remain on his throne, with all the trappings of royalty, but
substantial power was transferred from him to the person of a political
agent,"—Asiatic Quarterly Review for January 1887.
अंगरेज़ों की साम्राज्य पिपासा ४३५
किया, इन सब बातों का विस्तृत बयान अलग अलग अध्यायों में
किया जावेगा ।
इस अध्याय को समाप्त करने से पहले केवल एक बात हम
[ईसाई धर्म प्रचार] और बता देना चाहते हैं । वह यह कि मार्किस
वेल्सली के शुद्ध राजनैतिक उद्देश के अलावा
उसका एक उद्देश भारत में ईसाई धर्म का प्रचार करना भी था ।
वेल्सली ने भारत आते ही ईसाई धर्म के अनुसार अंगरेज़ी
इलाके के अन्दर रविवार की छुट्टी का मनाया जाना जारी किया ।
उस दिन समाचार पत्रों का छपना इक क़ानूनन् बन्द कर दिया ।
कलकत्ते के फ़ोर्ट विलियम में उसने एक कॉलेज की स्थापना की ।
इस कॉलेज का एक उद्देश विदेशी सरकार के लिए सरकारी नौकर
तैयार करना था । वेल्सली के जीवन चरित्र का रचयिता आर०
आर० पीयर्स साफ़ लिखता है कि यह कॉलेज भारतवासियों में
ईसाई धर्म को फैलाने का भी एक मुख्य साधन था । इस कॉलेज
के ज़रिये भारत की सात भिन्न भिन्न भाषाओं में इंजील का अनुवाद
करा कर उसका भारतवासियों में प्रचार कराया गया । मार्किस
वेल्सली न अपने व्यक्तिगत जीवन में चरित्रवान था और न
सार्वजनिक जीवन में अपने से पहले के किसी गबरनर जनरल से
अधिक ईमानदार था, फिर भी उसकी इस ईसाई धर्मनिष्ठा के
लिए अंगरेज़ इतिहास लेखक प्रायः उसकी प्रशंसा करते हैं । सच
यह है कि उसका ईसाई धर्म प्रचार भी राजनैतिक इष्ट सिद्धि का
एक साधन मात्र था ।
चौदवाँ अध्याय
वेल्सली और निज़ाम
आशा अन्तरोप से वेल्सली ने इंगलिस्तान के मन्त्री डण्डास
[हाशिया: इंगलिस्तान के] के नाम दो ख़ास पत्र लिखे, एक २३ फ़रवरी
[हाशिया: मन्त्री के नाम] सन् १७९८ को और दूसरा २८ फ़रवरी को ।
[हाशिया: वेल्सली के पत्र] इनमें से पहले पत्र में वेल्सली ने लिखा :—
“ × × × हमें सबसे बड़ा लाभ इस समय इस
बात में है कि देशी नरेश एक दूसरे के साथ अपनी दोस्ती या दुश्मनी का
फ़ैसला तक नहीं कर सकते ।”*
इस वाक्य में तीन ख़ास देशी शक्तियों की ओर इशारा था,
- “Bear in mind the state of the native powers in India at this moment;
and recollect that the greatest advantage which we now possess is the
present deranged condition of those interests.”—Marquess Wellesley to
Mr. Dundas 23rd February, 1798.
वेल्सली और निज़ाम ४३७
निज़ाम, मराठे और टीपू सुलतान। इनमें निज़ाम को आज तक
कभी भी अंगरेज़ों से लड़ने का साहस न हुआ था। मराठों के
विषय में वेल्सली ने अपने २८ फ़रवरी के पत्र में डणडास को
लिखा कि:—
“पेशवा का बल और प्रभाव इतनी तेज़ी के साथ घटता जा रहा है
कि मराठों पर हमला करने की न अभी ज़रूरत है और न ऐसा
करना उचित है।” टीपू के विषय में वेल्सली के २३ फ़रवरी के पत्र
से स्पष्ट है कि वह अफ़रीका ही में टीपू पर हमला करने का सङ्कल्प
कर चुका था। इस पत्र में वेल्सली ने यह भी लिखा कि—“टीपू
के विरुद्ध लड़ने के लिए हमें दूसरे भारतीय नरेशों की मदद की
ज़रूरत होगी, किन्तु निज़ाम की सेना पर विश्वास नहीं किया जा
सकता कि वह ऐसे मौक़े पर टीपू के विरुद्ध हमारा साथ देगी।”
बात यह थी कि निज़ाम के पास कम्पनी की सेना के अलावा अभी
तक एक अपनी स्वतन्त्र सेना भी मौजूद थी। फ्रांसीसी सेनापति
मौ० रेमाँ को सर जॉन शोर ने ज़बरदस्ती निज़ाम की इस सेना से
निकलवा दिया था, फिर भी अनेक योग्य फ्रांसीसी अफ़सर अभी
तक उस सेना में मौजूद थे। अंगरेज़ इतिहास लेखक स्वीकार
करते हैं कि इस पुरानी सेना और उसके फ्रांसीसी अफ़सरों ने सदा
बड़ी वफ़ादारी के साथ निज़ाम और उसके दरबार की सेवा की।
केवल छै वर्ष पहले यही सेना टीपू के विरुद्ध अंगरेज़ों का भी साथ
दे चुकी थी। किन्तु इस सेना की बाग अंगरेज़ों के हाथों में न थी,
इसलिए सब से पहला काम वेल्सली के लिए यह था कि निज़ाम
४३८ भारत में अंगरेज़ी राज
की इस सेना को तोड़ कर उसकी जगह कम्पनी की एक नई
सबसीडीयरी सेना निज़ाम के राज में क़ायम कर दे । दूसरे शब्दों
में वेल्सली ने सब से पहले निज़ाम को 'सबसीडीयरी सन्धि' के
जाल में फँसाने की तजवीज़ की ।
निज़ाम की हालत पहले ही काफ़ी गिरी हुई थी । कुर्दला की
पराजय ने उसे और भी कमज़ोर कर दिया था ।
[हाशिया:]
निज़ाम को
सब्सिडीयरी संधि
के जाल में फंसने
की तजवीज़
मालूम होता है, कुर्दला में अंगरेज़ों के निज़ाम
को मदद न देने और उसकी सबसीडीयरी सेना
तक को उससे दूर रखने का असली मतलब यह
था कि अंगरेज़ निज़ाम को जहाँ तक हो सके,
कमज़ोर कर देना चाहते थे । वेल्सली ने डरडास को लिखा :—
“मैं अभी लिख चुका हूँ कि x x x कुर्दला की सन्धि से और जिस
ढङ्ग से उस सन्धि का पालन कराया गया है, उससे निज़ाम की हालत
कितनी गिर गई है और कितनी कमज़ोर हो गई है । x x x
“इस समय मालूम होता है कि हैदराबाद का दरबार हमारे साथ अधिक
गहरा सम्बन्ध क़ायम करने के लिए बड़ी बड़ी कुर्बानियाँ करने को तैयार है ।
और यदि किसी दूसरे सबब से इस सम्बन्ध को अनुचित न समझा जावे;
तो बजाय इसके कि हम अपनी ओर से पत्र व्यवहार शुरू करें और निज़ाम
से कहें कि तुम अपनी सेना के किसी हिस्से को बरखास्त कर दो, यदि
निज़ाम हमसे प्रार्थना करे और हम उस पर बतौर एक अहसान के उसके साथ
इस तरह के सम्बन्ध को मंजूर करें तो शायद हमें बहुत अधिक लाभ हो
सकता है ।”
वेल्सली और निज़ाम ४३६
इस 'अधिक गहरे सम्बन्ध' से वेल्सली का मतलब सबूसीडीयरी
सन्धि से है।
निज़ाम को 'सबूसीडीयरी सन्धि' के जाल में फाँसने के लिए
[हैदराबाद के] हैदराबाद के दरबार में एक गुप्त षड्यन्त्र रचा
[दरबार में दो] गया। निज़ाम के कुछ दरबारियों को, जिनमें
[अंगरेज़ दूत] निज़ाम का वज़ीर अज़ीमुलउमरा भी था,रिश्वतें
देकर अपनी ओर फोड़ा गया, और निज़ाम
से यह सारा मामला अन्त समय तक छिपाकर रक्खा गया। इस
षड्यन्त्र में वेल्सली के दो मुख्य मदद्गार थे, एक मेजर कर्कपैट्रिक
का छोटा भाई कप्तान कर्कपैट्रिक, जो अपने बड़े भाई की जगह
हैदराबाद में रेज़िडेण्ट था, और दूसरा कप्तान कर्कपैट्रिक का
असिस्टेण्ट कप्तान मैलकम।
कप्तान कर्कपैट्रिक बहुत ही चलता पुर्ज़ा था। उसने अपना
रहन सहन, पहनाव सब हिन्दोस्तानी ढङ्ग का कर रक्खा था।
हैदराबाद में उसका नाम 'हशमतजङ्ग' पड़ा हुआ था। एक
मुसलमान दरबारी की लड़की के साथ उसने बाज़ाब्ता निकाह कर
लिया था। हैदराबाद ही में अनेक बार उस पर रिश्वतसितानी,
बदचलनी और हत्या तक के जुर्म लगाए गए। हिन्दोस्तानी
दरबारियों के साथ साज़िशें करने में वह सिद्धहस्त था और इस
अवसर पर वेल्सली को उसने बड़ा काम दिया।
दूसरा कप्तान मैलकम स्कॉटलैण्ड के निहायत ग़रीब माँ बाप
का लड़का था। १२ साल की आयु में भारत भेजे जाने के लिए
४४० भारत में अंगरेज़ी राज
वह कम्पनी के डाइरेक्टरों के सामने पेश हुआ। परीक्षा के तौर पर
एक डाइरेक्टर ने उससे पूछा—"क्यों छोटे आदमी, यदि हैदरअली
तुम्हें मिल जावे तो तुम क्या करोगे?" लड़के ने फ़ौरन उत्तर
दिया—"क्या करूँगा? मैं फ़ौरन अपनी तलवार खींचकर उसका
सर काट डालूँगा।" डाइरेक्टर ने कहा—"बहुत ठीक" और फिर
आज्ञा दी—"इसे पास किया गया।"
इस प्रकार पास होकर और सेना में भरती होकर अप्रैल सन्
१७८३ में १३ साल की आयु में मैलकम मद्रास पहुँचा। टीपू के
साथ अंगरेज़ों की पहली लड़ाई में वह शामिल था। धीरे धीरे
उसने फ़ारसी भाषा और देशी रियासतों की हालत का ख़ूब
अध्ययन किया। मार्किस वेल्सली मद्रास में मैलकम से मिलकर
बड़ा प्रसन्न हुआ। २० सितम्बर सन् १७९८ को उसने कप्तान मैलकम
को सेना से निकाल कर हैदराबाद के दरबार में कर्कपैट्रिक का
असिस्टैण्ट नियुक्त कर दिया। मैलकम कर्कपैट्रिक और वेल्सली
दोनों के लिए अत्यन्त उपयोगी साबित हुआ।
तजवीज़ यह थी कि अज़ीमुलउमरा बिना निज़ाम को ख़बर
[हाशिया: अज़ीमुलउमरा के साथ गुप्त साज़िश] किए रियासत की सेना को चुपचाप टुकड़े
टुकड़े करके बरख़ास्त कर दे और पेशतर इसके
कि निज़ाम को ख़बर हो, कम्पनी की नई
सबसीडीयरी सेना हैदराबाद पहुँच कर उसकी जगह ले ले। ८
जुलाई सन् १७९८ को वेल्सली ने कलकत्ते से कप्तान कर्कपैट्रिक के
नाम एक पत्र लिखा जिसके ऊपर "गुप्त" लिखा हुआ था। केवल
वेल्सली और निज़ाम ४४१
छै साल पहले निज़ाम और अंगरेज़ों के बीच मित्रता की सन्धि हो
चुकी थी। उस सन्धि को मिट्टी में मिलाकर अब गवर्नर जनरल ने
रेज़िडेण्ट को आज्ञा दी कि जिस तरह हो सके किसी गुप्त ढंग से
निज़ाम की रियासती सेना को, जिसमें फ्रांसीसी अफ़सर हैं,
बरख़ास्त करवा कर उसकी जगह कम्पनी की नई सबूसीडीयरी
सेना एक बार क़ायम कर दो। इस पत्र में कप्तान कर्कपैट्रिक को
आदेश दिया गया कि यह सारा काम चुपचाप ऊपर ही ऊपर वज़ीर
अज़ीमुलउमरा की मार्फ़त पूरा करा लिया जावे और निज़ाम को
इसका बिल्कुल पता न चलने पावे। वेल्सली ने लिखा—
"× × × अज़ीमुलउमरा पर खूब ज़ोर देना कि इसकी पूरी पूरी
अह्तियात रखना ज़रूरी है कि × × × तजवीज़ें खुलने न पावें; उसे यह
सुझा देना कि सेना को छोटे छोटे टुकड़ों में करके एक एक टुकड़े को अलग
अलग बरख़ास्त करना अधिक उचित होगा, ताकि अन्त में आसानी से सारी
सेना को ख़तम किया जा सके और सेना के अफ़सर या सिपाही वहाँ से जाकर
टीपू या सींधिया के यहाँ नौकरी न कर लें।
"जब अज़ीमुलउमरा निज़ाम के नाम पर इन सब बातों को करने के
लिए राज़ी हो जावे तब तुम मद्रास से कम्पनी की सेना बुलवा भेजना।"*
- “ . . . . . you will urge to Azimul Omra in the strongest terms,
the necessity of his taking every precaution to prevent the propositions
. . . . . from transpiring, and you will suggest to him the propriety of
dispersing the corps in small parties for the purpose of facilitating its final
reduction, and of preventing the officers and privates from passing into the
service of Tipoo or of Scindhia.
"Should Azimul Omra consent, in the name of the Nizam, to the
४४२ भारत में अंगरेज़ राज
जिस प्रकार हैदराबाद के पहले निज़ामुलमुल्क ने अपने स्वामी
दिल्ली सम्राट के साथ विश्वासघात करके मुग़ल साम्राज्य के
अधःपतन में सहायता दी थी, उसी प्रकार अब अज़ीमुलउमरा ने
अपने स्वामी निज़ाम के साथ विश्वासघात करके हैदराबाद की
स्वाधीनता का ख़ात्मा कराया ।
हिन्दोस्तानी नरेशों के मन्त्रियों को रिश्वतें देकर अपनी ओर
करने की कोशिश करना अंगरेज़ अफ़सरों के लिए उन दिनों एक
आम बात थी । मार्किस वेल्सली के सगे भाई आर्थर वेल्सली ने,
जो बाद में ड्यूक ऑफ़ वैलिंग्टन के नाम से प्रसिद्ध हुआ, २४
अगस्त सन् १८०३ को मेजर शा के नाम एक पत्र में लिखा था—
“करनल क्लोज़ के नाम मेरे पत्रों से आपने देखा होगा कि हर बात
की ठीक ठीक ख़बर रखने के लिए मैंने इस बात पर ज़ोर दिया है
कि करनल क्लोज़ पेशवा के मन्त्री को धन दे ।”
कप्तान कर्कपैट्रिक को पत्र लिखने के एक सप्ताह बाद १५ जुलाई
[हाशिया: वेल्सली की] सन् १७९८ को वेल्सली ने मद्रास के गवर्नर
[हाशिया: अधिक व्यापक] को लिखा कि आप हैदराबाद के लिए सेना
[हाशिया: तजवीज़] तैयार रखिए । इस पत्र में वेल्सली ने लिखा—
“मैं चाहता हूँ निज़ाम में कुछ योग्यता और बल
फिर से आजावे ।” निस्सन्देह वेल्सली अपने चिर मित्र निज़ाम से
proposed conditions, you will then require the march of the troops from
Fort St. George." - Governor-General's letter to Captain Kirk Patrick dated
8th July, 1798.
वेल्सली और निज़ाम ४४३
छिपा कर और उसके साथ दग़ा करके उसका बल बढ़ाना चाहता
था। सीधे शब्दों में इस वाक्य का मतलब था "निज़ाम की हुकूमत
का अन्त हो जावे।" और आगे चल कर वेल्सली लिखता है—
"मैं एक कहीं अधिक बड़ी तजवीज़ तमाम रियासतों के साथ इसी तरह
की सन्धियों करने की कर रहा हूँ, और इस समय की तजवीज़ केवल उस
बड़ी तजवीज़ का एक हिस्सा है। x x x मेरा ख़याल है कि जो फ़ौज
हैदराबाद भेजनी है, उसे जमा करने के लिए सब से अच्छी जगह गुगटूर
होगी x x x इस बात को गुप्त रखने की अत्यन्त कड़ी से कड़ी अह्तियात
की जावे। x x x जो जगह आप तय करें उसकी सूचना हैदराबाद के क़ायम
मुक़ाम रेज़िडेण्ट को दे देना आवश्यक होगा, ताकि वह कमाण्डिङ्ग अफ़सर
के साथ पत्र व्यवहार कर सके। x x x अपनी तमाम काररवाई आप पूना
और हैदराबाद के रेज़िडेण्टों को लिखते रहें, किन्तु केवल उनकी अपनी
सूचना के लिए, उन्हें लिख भेजें कि वे अपने यहाँ के दरबारों को इसकी
ख़बर न होने दें।"*
जनरल हैरिस के नाम १६ अगस्त के पत्र में वेल्सली ने लिखा—
" x x x मेरे १६ जुलाई के पत्र से आपको पता चल गया होगा कि
- "My object isto restore the Nizam to some degree of efficiency and
power. The measure forms part of a much more extensive plan for the
establishment of our alliances, . . . . the best position for assembling
the troops destined for Hyderabad, would be in the Guntur Circar . . .
the most strict attention to secrecy in the whole of this proceeding; . . .
you will communicate the whole proceeding to the Residents at Poona
and Hyderabad for their information only, and not to be imparted to their
respective Courts."—Marquess of Wellesly to General Harris, 15th
July, 1798.
४४४ भारत में अंगरेज़ी राज
यह तजवीज़ भारत में अंगरेज़ी राज का अस्तित्व क़ायम रखने के लिए कितनी
ज़रूरी है।"
इस पत्र में भी तजवीज़ को गुप्त रखने पर फिर खूब ज़ोर दिया
गया।
मार्किस वेल्सली के एक पत्र से मालूम होता है कि इतने पर
भी अज़ीमुलउमरा अन्त तक कुछ झिझकता रहा।
[मार्जिन: अज़ीमुलउमरा] सम्भव है उसकी आत्मा भीतर से उसे दिक़
[मार्जिन: की घबराहट] करती हो, या सम्भव है कोई और सबब रहा
हो। जो हो, उसने निज़ाम की सेना को बरख़ास्त करने में देर की।
अंगरेज़ों के लिए इस तरह के मामले में देर ख़तरनाक हो सकती
थी। इसलिए मैलकम और कर्कपैट्रिक ने दूसरी ओर से भी अपना
इन्तज़ाम कर लिया था। उन्होंने निज़ाम की सेना के अन्दर भी
अपने षड्यन्त्र का जाल पूर रक्खा था। कम्पनी की सेना बिना
निज़ाम की सेना के बरख़ास्त होने का इन्तज़ार किए मद्रास से
हैदराबाद के लिए चल पड़ी। कप्तान मैलकम की जीवनी का
रचयिता सर जॉन के लिखता है कि—"हमारे सौभाग्य से ऐन
मौक़े पर निज़ाम की पल्टनें अपने अफ़सरों के विरुद्ध बलवा कर
बैठीं। क्योंकि उनकी तनख़ाहें चढ़ गई थीं। उन्होंने अपने फ़्रांसीसी
सेनापति को क़ैद कर लिया।"* इत्यादि। जॉन के यह नहीं
बतलाता कि किन तरीक़ों से रेजिडेण्ट और उसके असिस्टेण्ट ने
निज़ाम की फ़ौजों को "ऐन मौक़े पर" बलवा करने के लिए तैयार
- Kaye's Life of Malcolm.
वेल्सली और निज़ाम ४४५
किया। इसी मौक़े पर कम्पनी की पलटनों ने भी अचानक हैदराबाद
को जा घेरा। वज़ीर अज़ीमुलउमरा से कहा गया कि आप फ़ौरन
निज़ाम की पलटनों को बरखास्त करके कम्पनी की पलटनों को
उनकी जगह दे दें। लिखा है कि कम्पनी की सेना को इतनी जल्दी
हैदराबाद में देख कर अज़ीमुलउमरा चकित रह गया और एक बार
उसने रियासत की सेना को बरखास्त करने से इनकार कर दिया।
जिस सेना और उसके अफ़सरों ने सदा इतनी वफ़ादारी के साथ
राज की सेवा की थी उसे बेक़सूर बरखास्त कर देना अज़ीमुलउमरा
के लिए भी इतना आसान न था। असहाय निज़ाम को चन्द घण्टे
पहले तक इस तमाम कार्रवाई का गुमान भी न था। किन्तु न
निज़ाम में इतनी हिम्मत थी और न उसके आदमियों में इतनी
वफ़ादारी। अन्त में चारों ओर से कम्पनी की पलटनों से घिर कर,
स्वयं अपने दरबार को विश्वासघातकों से छलनी छलनी देख कर
और अपनी ही सेना को अपने ख़िलाफ़ विद्रोही देखकर निज़ाम को
अंगरेज़ रेज़िडेंट की इच्छा पूरी करनी पड़ी।
१ सितम्बर सन् १७९८ को निज़ाम ने कम्पनी के साथ उस
कम्पनी और नए सन्धि पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए जिससे
निज़ाम में सबसी हैदराबाद दरबार की स्वाधीनता का सदा के
डीयरी सन्धि लिए ख़ात्मा हो गया। इस सन्धि पत्र का पहला
ही वाक्य सरासर झूठ है। उसमें लिखा है—
"चूंकि नवाब निज़ामुलमुल्क आसफ़जाह बहादुर ने मौजूदा दोस्ती के
महत्व को देखते हुए यह इच्छा प्रकट की है कि माननीय कम्पनी की जो