भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 708, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ेंअंगरेज़ों की साम्राज्य पिपासा ४२६
किन्तु अंगरेज़ों और फ्रांसीसियों के चरित्र में आरम्भ से ही बहुत
बड़ा अन्तर दिखाई देता रहा है। जब कि
[हाशिया: अंगरेज़ों और] फ्रांसीसी समस्त संसार को स्वतंत्रता, समता
[हाशिया: फ्रांसीसियों के] और बन्धुत्व का उपदेश दे रहे थे, ठीक उस
[हाशिया: चरित्र में अन्तर] समय उनके पड़ोसी अंगरेज़ इन सिद्धान्तों के
प्रचार को रोकने का भरसक प्रयत्न कर रहे थे। वजह यह थी कि
इंगलिस्तान के शासकों को साम्राज्य का और वहाँ के पूंजीपतियों
को दूसरे देशों से धन बटोरने का काफ़ी चसका पड़ चुका था।
इंगलिस्तान के साम्राज्य पिपासी शासकों और धन लोलुप पूंजी-
पतियों को इस बात का डर था कि यदि इस तरह के विचार संसार
में फैल गए तो हमारी अपनी इष्ट सिद्धि में बहुत बड़ी बाधा पड़ेगी।
जिस अंगरेज़ विद्वान एडमंड बर्क ने इंगलिस्तान की पार्लिमेण्ट के
सामने इस योग्यता के साथ वारन हेस्टिंग्स के पाप कृत्यों को
खोला था, उसी बर्क को अब वहाँ के शासकों ने १५०० पाउण्ड
सालाना की पेन्शन देकर उससे फ्रांस की राजक्रान्ति के ख़िलाफ़
एक ज़बरदस्त पुस्तक लिखवा दी, ताकि फ्रांस की आज़ादी का
रोग इंगलिस्तान में फैलने न पाए।
इंगलिस्तान का प्रधान मन्त्री पिट हद दर्जे का साम्राज्य लोलुप
था। फ्रांस और फ्रांसीसी विचारों का वह कट्टर शत्रु था। उसी
की इच्छानुसार भारत का प्रत्येक अंगरेज़ अफ़सर यहाँ के देशी
“ These are results which will not pass away : they defy every protocol,
constitutional theory, or veto of despotic power.”—Joseph Mazzini.