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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 706

अंग्रेज़ों की साम्राज्य पिपासा ४२७
प्रारम्भ हुआ। सन् १७९२ में फ्रांस ने अपने स्वेच्छाचारी और
अन्यायी राजा सोलहवें लुई को गद्दी से उतार कर अपने यहाँ
प्रजातन्त्र राज (रिपब्लिक) क़ायम किया। २१ जनवरी सन्
१७९३ को सोलहवें लुई को फाँसी पर चढ़ा दिया गया। फ्रांस ही
से “स्वतन्त्रता, समता और बन्धुत्व” (Liberty, Equality
and Fraternity) इन तीन शब्दों की पुकार उठी और चन्द
साल के अन्दर ही ये शब्द सारे यूरोप में इस सिरे से उस सिरे
तक गूंजने लगे। फ्रांस की इस महान क्रान्ति के विषय में इतालिया
के आदर्श देशभक्त महात्मा जौज़फ़ मैज़िनी ने लिखा है—
“ढाई करोड़ मनुष्य केवल किसी शब्द, किसी थोथे वाक्य या छाया के
पीछे इस तरह एक दिल होकर खड़े नहीं हो सकते
[मैज़िनी के विचार] और न आधे यूरोप को अपनी आवाज़ से जगा सकते
हैं। फ्रांस की राज्य क्रान्ति ख़तम हो गई यानी उसका
ऊपरी जोश ख़रोश जाता रहा, उसका बाहरी रूप नष्ट हो गया, जिस तरह कि
हर चीज़ का बाहरी रूप अपना काम पूरा करके नष्ट हो जाता है, किन्तु उस
क्रान्ति का उसूल, उसके भीतर का सिद्धान्त जीवित है। वह सिद्धान्त अपने
उस समय के समस्त अस्थायी आच्छादनों यानी बाहरी रूपों से अलग होकर
अब सदा के लिए हमारे मानसिक आकाश में ध्रुव तारे की तरह चमक रहा
है; उसकी शुमार मानव जाति की विजयों में की जाती है।
“हर महान सिद्धान्त अमर है। फ्रांस की राजक्रान्ति ने मनुष्य मात्र के
अधिकार, स्वतन्त्रता और समता के भावों को फिर से मनुष्य की आत्मा के
अन्दर प्रज्वलित कर दिया, अब यह ज्वाला कभी किसी के बुझाए नहीं बुझ