भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेल्सली और निज़ाम ४३७
निज़ाम, मराठे और टीपू सुलतान। इनमें निज़ाम को आज तक
कभी भी अंगरेज़ों से लड़ने का साहस न हुआ था। मराठों के
विषय में वेल्सली ने अपने २८ फ़रवरी के पत्र में डणडास को
लिखा कि:—
“पेशवा का बल और प्रभाव इतनी तेज़ी के साथ घटता जा रहा है
कि मराठों पर हमला करने की न अभी ज़रूरत है और न ऐसा
करना उचित है।” टीपू के विषय में वेल्सली के २३ फ़रवरी के पत्र
से स्पष्ट है कि वह अफ़रीका ही में टीपू पर हमला करने का सङ्कल्प
कर चुका था। इस पत्र में वेल्सली ने यह भी लिखा कि—“टीपू
के विरुद्ध लड़ने के लिए हमें दूसरे भारतीय नरेशों की मदद की
ज़रूरत होगी, किन्तु निज़ाम की सेना पर विश्वास नहीं किया जा
सकता कि वह ऐसे मौक़े पर टीपू के विरुद्ध हमारा साथ देगी।”
बात यह थी कि निज़ाम के पास कम्पनी की सेना के अलावा अभी
तक एक अपनी स्वतन्त्र सेना भी मौजूद थी। फ्रांसीसी सेनापति
मौ० रेमाँ को सर जॉन शोर ने ज़बरदस्ती निज़ाम की इस सेना से
निकलवा दिया था, फिर भी अनेक योग्य फ्रांसीसी अफ़सर अभी
तक उस सेना में मौजूद थे। अंगरेज़ इतिहास लेखक स्वीकार
करते हैं कि इस पुरानी सेना और उसके फ्रांसीसी अफ़सरों ने सदा
बड़ी वफ़ादारी के साथ निज़ाम और उसके दरबार की सेवा की।
केवल छै वर्ष पहले यही सेना टीपू के विरुद्ध अंगरेज़ों का भी साथ
दे चुकी थी। किन्तु इस सेना की बाग अंगरेज़ों के हाथों में न थी,
इसलिए सब से पहला काम वेल्सली के लिए यह था कि निज़ाम